बीजेपी में यूं तो सारी नियुक्तियां जोरशोर से की जाती है। इन नियुक्तियों का प्रचार भी खूब होता है और पदग्रहण कार्यक्रम भी खूब शोर-रैली के साथ बड़े पैमाने पर होता है लेकिन इन दिनों एक नियुक्ति चर्चा में हैं। खासबात यह है कि नियुक्ति को चार दिन हो गए है लेकिन उसे लेकर कहीं शोर नहीं है बल्कि कयास है कि यह नियुक्ति प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की ताकत को विभाजित करने के लिए की गई है। यानी, मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री के बाद अब एक नया चौथा सत्ता केंद्र बन सकता है।
बीजेपी ने चुपचाप अध्यक्ष व्यवस्था नामक पद का गठन कर वर्तमान उपाध्यक्ष और पूर्व क्षेत्रीय संगठन मंत्री शैलेंद्र बरुआ को नियुक्ति दे दी है। ग्वालियर निवासी शैलेंद्र बरुआ संघ से बीजेपी में भेजे गए थे और उनकी आमद के बाद ही क्षेत्रीय संगठन मंत्री का पद गठित किया गया था। तब तर्क दिया गया था कि प्रदेश में एक संगठन महामंत्री होने के साथ ही क्षेत्रीय संगठन मंत्री होने से संगठन अधिक मजबूत होगा और सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा। इसबार भी पार्टी ने तर्क किया है कि प्रदेश अध्यक्ष के कामकाज में काफी विस्तार हो गया है। इसलिए उनकी सहायता के लिए कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष रहे शैलेंद्र बरुआ को अध्यक्ष व्यवस्था का प्रभार दिया गया है। वे प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष हैं।
हालांकि कुछ दिनों पहले संघ ने संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा को हटा दिया था। संघ ने अब तक तय नहीं किया है कि हितानंद शर्मा की जगह नया संगठन महामंत्री कौन होगा। आमतौर पर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री और मुख्यमंत्री सत्ता केंद्र होते हैं। कार्यकारी अध्यक्ष की तरह का अध्यक्ष व्यवस्था का पद पहली बार बनाया गया है। कहने को यह पद प्रदेश अध्यक्ष की सहायता के सहायता के लिए बनाया गया है। अध्यक्ष के समानांतर एक और पद होने से संगठन में नया सत्ता केंद्र बनना तय है। इसी कारण इसे प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल पर एक और पाबंदी की तरह माना जा रहा है।
माफी मांगते मोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री
मोहन सरकार में अपने बयानों से संकट खड़ा करने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है। कैबिनेट मंत्री विजय शाह द्वारा भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए गए बयान के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। मई 2025 में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मंत्री विजय शाह ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उल्लेख करते हुए कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे। कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद किसी तरह अपना पद बचाने की जुगत कर रहे मंत्री विजय शाह अब तक चार बार माफी मांग चुके हैं। मगर सर्वोच्च न्यायालय किसी भी तरह रहम देने को तैयार नहीं है।
यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि विजय शाह ने रतलाम में प्रभारी मंत्री के नाते बैठक में लाड़ली बहना को लेकर एक बयान दे दिया था। ऐसा ही बयान राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने सीहोर में कार्यक्रम में दिया। सीहोर पहुंचे राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा कार्यक्रम में महिलाओं की कम उपस्थिति देखकर भड़क गए थे। उन्होंने कह दिया कि क्षेत्र में 894 लाड़ली बहनाओं को योजना में हर माह 1500 रुपए दिए जा रहे हैं। इसके बाद भी सरकारी कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति कम नजर आ रही है। सीईओ से बात कर एक दिन सभी लाड़ली बहनों को बुलाऊंगा। यदि उस दिन भी वे कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुईं तो रिपोर्ट भिजवाकर योजना से नाम कटवा दूंगा।
इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। कांग्रेस ने इसे महिलाओं का अपमान बताया, जबकि बीजेपी ने भी बात संभालने की कोशिश की। बाद में मंत्री करण सिंह वर्मा ने अपने बयान पर खेद जताया। इनके पहले इंदर सिंह परमार ने आगर मालवा में बिरसा मुंडा जयंती पर कहा था, ‘‘अंग्रेजों ने देश के कई लोगों को समाज सुधारक बनाकर पेश किया, जिनमें राजा राममोहन राय भी शामिल थे। वह अंग्रेजों के दलाल के रूप में कार्यरत रहे। धर्मांतरण की जो प्रक्रिया उन्होंने बढ़ाई, उसे बिरसा मुंडा ने रोकने का कार्य किया और समाज को बचाया।‘‘ इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई तो उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने वीडियो जारी कर कहा, ‘‘ गलती से समाज सुधारक राजा राममोहन राय के बारे में मेरे मुंह से कुछ गलत निकल गया, जिसके लिए दुख है। इसका मैं प्रायश्चित करता हूं। राजा राममोहन राय का व्यक्तिगत रूप से मैं सम्मान करता हूं।‘‘
ब्राह्मण राजनीति के कुंड में गोपाल भार्गव की डुबकी
इन दिनों उत्तरप्रदेश के साथ मध्यप्रदेश में ब्राह्मण राजनीति गरमा रही है। पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव ने लंबे समय बाद बयान दे कर इस बहती गंगा में हाथ धो लिए हैं। मध्य प्रदेश में बीजेपी के कद्दावर नेता और सबसे वरिष्ठ विधायक गोपाल भार्गव ने सागर में एक कार्यक्रम में कहा, ‘‘आज देशभर में ‘तमाम संगठनों का का एक ही लक्ष्य रह गया है ब्राह्मणों को मारो, उन्हें दबाओ और उन्हें हाशिए पर ले जाओ। ब्राह्मण समाज आज सभी की आंखों में खटक रहा है। अब समय आ गया है, जब ब्राह्मण समाज को एकजुट होने की जरूरत है। देश में जो परिस्थितियां चल रही हैं, वे हमारे समाज के लिए कतई अनुकूल नहीं हैं। सबका एक ही लक्ष्य है, एक ही टारगेट है, ब्राह्मण को डाउन कर दो, इससे बदला ले लो। इसे मारो। मैं कहना चाहता हूं, जब हम एक होंगे, संगठन में शक्ति होगी तो कोई भी हमें झुका नहीं सकता। हम एक होंगे तो राजनीतिक पार्टियां हमारे सामने झुकेंगी, अन्यथा हमें उनके आगे झुकना होगा।‘‘
ब्राह्मण समाज को लेकर दिया गया गोपाल भार्गव का यह बयान केवल यूजीसी के नए नियमों तक सीमित नहीं है बल्कि इसे हाशिए पर धकेल दिए गए ब्राह्मण नेताओं के लिए शक्ति जुटाने का उपक्रम भी समझा जाना चाहिए। ब्राह्मण वोट लंबे समय से बीजेपी से जुड़े हैं और यह एक तरह से बीजेपी के स्थायी मतदाता बन गए है। इस जुड़ाव के कारण बीजेपी में ब्राह्मण नेता दरकिनार कर दिए गए है। पूर्व मंत्री और अटलजी के भांजे अनूप मिश्रा, पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और स्वयं गोपाल भार्गव जैसे सबसे ज्यादा चुनाव जितने वाले नेताओं को पार्टी ने किनारे कर दिया है। ऐसे में गोपाल भार्गव के बयान से बीजेपी में ब्राह्मण नेताओं के अस्तित्व पर सवाल खड़े हो गए हैं।
कोई कांग्रेसी चुनाव नहीं लड़ेगा तो अध्यक्ष उतर जाएंगे मैदान में
कांग्रेस में 2028 के विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच टिकट पाने की मारामारी शुरू हो गई है। कांग्रेस चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के पास कई सिफारिशी कॉल पहुंच रहे हैं। ऐसे में उन्होंने एक दिलचस्प बयान दिया है। भविष्य की रणनीति पर बात करते हुए उन्होंने कहा है कि इन दिनों हर कोई यह कहता फिर रहा है कि उसका टिकट पक्का है, लेकिन पार्टी में टिकट का फैसला केवल संगठन और चुनावी गणित के आधार पर होगा। चुनावी टिकट केवल उसी नेता को मिलेगा, जिसमें जीत दर्ज करने की वास्तविक क्षमता होगी।
उन्होंने कहा कि यदि कोई सीट ऐसी होती है जहां से कोई उम्मीदवार चुनाव लड़ने को तैयार नहीं होगा, तो वह खुद उस सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगे। टिकट को लेकर दिया गया उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इसे कांग्रेस के भीतर अनुशासन और सख्त चयन प्रक्रिया के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।