नई दिल्ली। देश में स्कूली शिक्षा को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। राज्यसभा में पेश सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच सालों में देशभर में 18727 सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं। जबकि, इसी दौरान निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इस बदलाव को लेकर विपक्ष ने सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के भविष्य और गरीब वर्ग के बच्चों की पढ़ाई पर गंभीर चिंता जताई है।
सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने राज्यसभा में सरकारी स्कूलों की घटती संख्या को लेकर सवाल उठाए और इसे शिक्षा प्रणाली के लिए चिंताजनक बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि सरकारी शिक्षा ढांचा धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। जबकि, निजी शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। उनके अनुसार सरकारी स्कूल लंबे समय से सस्ती और सुलभ शिक्षा की रीढ़ रहे हैं खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में।
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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020-21 में देश में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या 10,32,049 थी। जो 2024-25 तक घटकर 10,13,322 रह गई है। यह लगातार गिरावट सार्वजनिक शिक्षा नेटवर्क के सिकुड़ने का संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि कम नामांकन वाले स्कूलों का विलय, युक्तिकरण नीतियां और जनसंख्या में बदलाव इस गिरावट के पीछे के कारण बताए जा रहे हैं।
दूसरी ओर निजी स्कूलों का विस्तार तेजी से हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2023-24 में देश में ऐसे स्कूलों की संख्या 3,31,108 थी जो 2024-25 में बढ़कर 3,39,583 हो गई हैं। यानी एक ही साल में 8,475 नए निजी स्कूल खुल गए हैं। यह रुझान दिखाता है कि अभिभावकों के बीच निजी शिक्षा संस्थानों की मांग लगातार बढ़ रही है।
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पिछले पांच सालों के आंकड़ों दो देखें तो सरकारी स्कूलों की संख्या में लगातार गिरावट का ट्रेंड दिखाई देता है। साल 2021-22 में इनकी संख्या 10,22,386 थी जो 2022-23 में घटकर 10,16,010 हो गई है। हालांकि, 2023-24 में मामूली बढ़ोतरी के साथ यह संख्या 10,17,660 तक पहुंच गई थी लेकिन अगले ही साल फिर गिरकर 10,13,322 रह गई। वहीं, निजी स्कूलों के मामले में उतार-चढ़ाव के बाद हाल के सालों में तेज वृद्धि देखने को मिली है।
राज्यवार स्थिति भी शिक्षा व्यवस्था में असमान बदलाव को दर्शाती है। उत्तर प्रदेश में सरकारी और निजी दोनों प्रकार के स्कूलों की संख्या सबसे अधिक है। यहां निजी स्कूलों की संख्या 2024-25 में बढ़कर 1,04,508 हो गई है। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारी स्कूलों की संख्या में लगातार कमी दर्ज की गई है। इसे सार्वजनिक शिक्षा ढांचे के कमजोर होने का संकेत माना जा रहा है। वहीं, कर्नाटक और महाराष्ट्र में निजी स्कूलों की संख्या में उतार-चढ़ाव के बावजूद स्थिरता बनी हुई है। पश्चिम बंगाल में हाल के सालों में सरकारी और निजी दोनों स्कूलों की संख्या में गिरावट देखी गई है।
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शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों के बंद होने का सबसे ज्यादा असर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों पर पड़ सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां ये संस्थान अक्सर बच्चों के लिए शिक्षा का एकमात्र साधन होते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार भी मुफ्त या रियायती शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर रहते हैं। इन स्कूलों के माध्यम से विद्यार्थियों को मिड डे मील, मुफ्त किताबें और बुनियादी सुविधाएं भी मिलती हैं। जिससे इनका बंद होना सामाजिक समानता और शिक्षा तक पहुंच दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
विपक्षी दलों का कहना है कि निजी स्कूलों का तेजी से विस्तार शिक्षा के क्षेत्र में असमानता बढ़ा सकता है। उनका आरोप है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय निजी संस्थानों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। जिसकी वजह से गरीब और मिडिल क्लास परिवार के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करना कठिन हो सकता है।
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