भोपाल। सिगरेट और बीड़ी का धुआं केवल फेफड़ों या होंठों तक सीमित नुकसान नहीं पहुंचा रहा बल्कि यह कानों और लार ग्रंथियों पर भी गहरा असर डाल रहा है। राजधानी भोपाल स्थित एम्स अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा की गई एक महत्वपूर्ण रिसर्च में खुलासा हुआ है कि धूम्रपान करने वाले लोगों में सुनने की क्षमता कम हो रही है। साथ ही इसकी वजह से मुंह से जुड़ी संक्रमण संबंधी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। इस अध्ययन को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने मान्यता दी है और इसे इस तरह का पहला अध्ययन बताया गया है। 

यह अध्ययन प्रॉस्पेक्टिव क्रॉस-सेक्शनल डिजाइन में दो महीने तक चलाया गया था। जिसमें कुल 100 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। इनमें 50 धूम्रपान करने वाले और 50 धूम्रपान न करने वाले लोग शामिल थे। सभी शामिल लोग 18 से 55 साल के बीच के थे ताकि उम्र के साथ होने वाली बीमारियों का प्रभाव कम रहे। प्रतिभागियों का चयन ओपीडी में आने वाले मरीजों में से किया गया था। रिसर्च के दौरान सभी की विस्तृत केस हिस्ट्री दर्ज की गई जिसमें उनकी उम्र, धूम्रपान की आदत, अवधि और अन्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी शामिल थी।

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अध्ययन में दो प्रमुख बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया गया था जिसमें लार के प्रवाह की दर और सुनने की क्षमता शामिल थी। सुनने की जांच ऑडियोमेट्री टेस्ट के माध्यम से की गई जबकि लार के प्रवाह की जांच मानक क्लिनिकल प्रक्रियाओं से किया गया। रिसर्च के परिणाम में पाया गया कि धूम्रपान न करने वाले 50 लोगों में से 45 की सुनने की क्षमता पूरी तरह सामान्य रही थी। जबकि, धूम्रपान करने वालों में 50 में से 20 लोगों में किसी न किसी स्तर की सुनने की समस्या पाई गई। यानी हर दस में से चार स्मोकर्स को सुनने में दिक्कत थी। अधिकांश मामलों में यह समस्या हल्के स्तर की थी लेकिन कुछ लोगों में मध्यम से गंभीर स्तर तक सुनने की कमी दर्ज की गई है। 46 से 55 वर्ष आयु वर्ग के स्मोकर्स में यह समस्या अधिक स्पष्ट रूप से सामने आई है।

ऑडियोमेट्री परीक्षण से यह भी स्पष्ट हुआ कि धूम्रपान करने वालों में हल्के से मध्यम स्तर तक बहरापन विकसित हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, सिगरेट में मौजूद निकोटिन और अन्य विषैले तत्व कान की भीतरी संरचना, विशेष रूप से कोक्लिया तक रक्त प्रवाह को कम कर देते हैं। इससे वहां ऑक्सीजन और पोषण की आपूर्ति बाधित होती है, जो धीरे-धीरे श्रवण क्षमता को नुकसान पहुंचाती है। शुरुआती स्तर पर यह असर मामूली प्रतीत होता है, लेकिन लंबे समय में यह स्थायी बहरापन का रूप ले सकता है।

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रिसर्च में यह भी पाया गया कि धूम्रपान करने वालों में लार का उत्पादन नॉन स्मोकर्स की तुलना में कम था। लार की कमी के कारण मुंह में सूखापन, दांतों में सड़न, मसूड़ों की बीमारी और ओरल इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि सिगरेट में मौजूद रसायन लार ग्रंथियों की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं। इसकी वजह से मुंह की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ जाती है। विशेष रूप से वे लोग जो प्रतिदिन 20 से 30 सिगरेट या बीड़ी का सेवन करते हैं उनमें लार का स्तर अत्यधिक कम पाया गया है।

हालांकि, अध्ययन में यह संकेत मिला कि अधिक सिगरेट पीने वालों में सुनने की समस्या अपेक्षाकृत ज्यादा दिखी है लेकिन आंकड़ों के आधार पर रोजाना पी जाने वाली सिगरेट की संख्या में कमी के बीच सीधा और मजबूत संबंध स्थापित नहीं हो सका। वहीं, जो लोग लंबे समय से धूम्रपान कर रहे थे उनमें समस्या का स्तर इसके मुकाबले ज्यादा था।

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यह शोध ICMR के शॉर्ट टर्म स्टूडेंटशिप (STS) कार्यक्रम के अंतर्गत किया गया था। अध्ययन में खुशी मेघानी, डॉ. शैला सिडाम (कॉरेस्पॉन्डिंग ऑथर), डॉ. आशीष पाखरे, अनन्यान संपत, डॉ. अंजन के. साहू और डॉ. अपर्णा जी. चव्हाण शामिल थे। यह पूरा अध्ययन एम्स भोपाल के ईएनटी, साइकियाट्री और मेडिकल कॉलेज विभागों से जुड़े विशेषज्ञों की संयुक्त पहल का परिणाम है।