नीमच। मध्यप्रदेश के नीमच जिले के मनासा कस्बे में गुलियन बेरी सिंड्रोम (GBS) का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तक इस बीमारी से दो बच्चों की मौत हो चुकी है। जबकि, कुल 17 लोग संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। इनमें अधिकांश मरीज नाबालिग हैं जिससे हालात और अधिक चिंताजनक हो गए हैं। स्वास्थ्य विभाग ने पूरे कस्बे को अलर्ट जोन घोषित कर दिया है और सभी 15 वार्डों में निगरानी तेज कर दी गई है।

ताजा जानकारी के अनुसार, शुक्रवार रात चार नए मामले सामने आने के बाद संक्रमितों की संख्या में अचानक इजाफा हुआ। संक्रमित मरीजों में 4 से 17 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों और किशोरों की संख्या सबसे अधिक है। कुल 17 मरीजों में से 15 नाबालिग हैं जबकि केवल दो 18 वर्ष के ऊपर के लोग इस बीमारी से प्रभावित पाए गए हैं। अब तक 6 से 7 मरीजों में इस बीमारी की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है। वहीं, 9 से 10 अन्य संदिग्ध मरीजों पर लगातार कड़ी निगरानी रखी जा रही है।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं लोक स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा मंत्री राजेंद्र शुक्ल शनिवार को मनासा पहुंचे। उन्होंने स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की और स्पष्ट निर्देश दिए कि घर-घर सर्वे, स्क्रीनिंग और इलाज की व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उपमुख्यमंत्री ने मनासा के वार्ड नंबर 15 में इस बीमारी से जान गंवाने वाले बच्चे सोनू के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी और मौके पर चल रहे स्क्रीनिंग अभियान का निरीक्षण भी किया।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, भोपाल और उज्जैन से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीमें मनासा में लगातार डटी हुई हैं। ये टीम मरीजों की जांच, सैंपल कलेक्शन, स्क्रीनिंग और निगरानी का काम कर रही हैं। जिला अस्पताल के सीएमएचओ डॉ. आरके खाघौत ने बताया कि अब तक 6 से 7 मरीजों में गुलियन बेरी सिंड्रोम की पुष्टि हो चुकी है। जबकि, बाकी संदिग्ध मामलों पर मेडिकल निगरानी जारी है। बीमारी के संभावित कारणों और संक्रमण के स्रोत का पता लगाने के लिए सभी जरूरी जांच की जा रही है।

इससे पहले उज्जैन डिविजनल कमिश्नर भी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं और मरीजों व उनके परिजनों से बातचीत कर हालात का जायजा लिया था। स्वास्थ्य विभाग की टीम कस्बे के सभी 15 वार्डों में घर-घर जाकर सर्वे और स्क्रीनिंग कर रही हैं ताकि समय रहते नए मरीजों की पहचान कर इलाज शुरू किया जा सके।