नई दिल्ली। संसद के मॉनसून सत्र के दूसरे दिन केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को लेकर दूसरा विवादित जवाब दिया है। केंद्र सरकार ने कहा है कि मार्च में कोरोना महामारी के मद्देनजर लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान फर्जी खबरों के कारण बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने पलायन किया। इसके पहले सरकार ने सोमवार को कहा था कि प्रवासी मजदूरों की मौत का आंकड़ा हमारे पास नहीं है ऐसे में उनके परिजनों को मुआवजा देने का सवाल ही नहीं उठता।

मंगलवार (15 सितंबर) को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद माला रॉय के लिखित सवाल के जवाब में यह बात कही है। माला रॉय ने अपने एक अतारांकित प्रश्न में पूछा था कि 25 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन लागू करने के पहले प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए थे? इसके अलावे उन्होंने पूछा था कि क्या कारण रही जिसके वजह से इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों ने पलायन किया जिस दौरान उनकी जानें भी गई।

टीएमसी सांसद के इस प्रश्न के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद रॉय ने जवाब में लिखा है कि देशभर में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों का पलायन लॉकडाउन की अवधि को लेकर दिखाई गई फर्जी खबरों के कारण हुई। प्रवासी मजदूर भोजन, पानी और आश्रय व स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चिंतित थे। उन्होंने कहा, 'हालांकि केंद्र सरकार आम जरूरत की सभी चीजें की निर्बाध आपूर्ति को लेकर सचेत थी और इसके पूरे प्रयास किए गए कि किसी भी नागरिक को भोजन, पानी व स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी आधारभूत जरूरतों की पूर्ति की जाए। 

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बता दें कि इसके पहले सोमवार को केंद्र सरकार से विपक्ष ने यह पूछा था कि लॉकडाउन के दौरान कितने मजदूरों ने पलायन किया और इस दौरान कितनों की जानें गई इसके डिटेल्स क्या हैं? सरकार ने उनके आश्रितों के मुआवजे के लिए क्या किया? इसके जवाब में केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने यह कहा था कि इसपर कोई आंकड़ा मेनटेन नहीं किया गया है ऐसे में मुआवजे का सवाल नहीं उठता। केंद्र सरकार के इस जवाब के बाद विपक्षी दलों ने सरकार की चौतरफा आलोचना की थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार के इस बयान पर निशाना साधते हुए पूछा था कि क्या सरकार ने गिना नहीं तो मौतें नहीं हुई?