उज्जैन से विधायक डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इंदौर की राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं। प्रशासनिक इकाई के रूप में वे इंदौर के प्रभारी मंत्री हैं। इस नाते वे भोपाल के बाद सबसे ज्यादा समय इंदौर में गुजारते हैं। उनकी इस सक्रियता से ताई और भाई यानी पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन और नगरीय विकास और प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के इर्दगिर्द रहने वाली स्थानीय राजनीति में नया कोण खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एकलव्य गौड़ सहित युवा नेताओं को ताकत देकर इंदौर के वरिष्ठ नेताओं को किनारे करने का काम किया है। अब 1 फरवरी को इंदौर गए सीएम डॉ. मोहन यादव का एक कदम फिर कैलाश विजयवर्गीय विरोधियों को ताकत दे गया।
पूर्व मंत्री और विधायक उषा ठाकुर इंदौर यात्रा के दौरान सीएम डॉ. मोहन यादव को अपने घर ले गईं। यह कार्यक्रम अचानक तय हुआ था। इतना ही नहीं सीएम डॉ. मोहन यादव के विधायक उषा ठाकुर के साथ घर में प्रवेश करते ही दरवाजे बंद करवा दिए गए। अंदर केवल मंत्री तुलसीराम सिलावट ही थे। अन्य विधायक मालिनी गौड़, रमेश मेंदोला, गोलू शुक्ला, बीजेपी नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा, गौरव रणदेव सहित बीजेपी के अन्य नेता बाहर ही खड़े रहे।
आमतौर पर ऐसा ही होता है कि जब कोई बड़ा नेता किसी नेता के घर जाता है तो उस नेता के समर्थकों को ही आसपास रहने का मौका मिलता है बाकि स्थानीय नेताओं को दूर कर दिया जाता है। उषा ठाकुर के घर भी ऐसा ही हुआ। बाकि नेताओं का दूर रहना सामान्य बात थी। लेकिन इंदौर की राजनीति में यह एक दांव की तरह माना गया। इसका कारण कैलाश विजयवर्गीय और उषा ठाकुर की आपसी राजनीति है। दोनों नेताओं को एक दूसरे का धुर विरोधी माना जाता है। ऐसे समय में जब कैलाश विजयवर्गीय संकट से घिरे हैं, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का उनकी विरोधी नेता उषा ठाकुर के घर के जाना, सीधे-सीधे कैलाश विजयवर्गीय के विरोधियों को ताकत देना माना गया। यानी, कैलाश विजयवर्गीय को हाशिए पर धकेलने के इरादे और पुख्ता हुए।
हितानंद शर्मा हटे तो आ गया आनंद
आखिरकार, लंबे समय से बीजेपी प्रदेश संगठन महामंत्री का दायित्व संभाल रहे हितानंद शर्मा को आरएसएस में वापस बुला लिया गया है। बीजेपी में उन्हें हटाने के लिए लॉबिंग की जा रही थी। हितानंद शर्मा ने बीजेपी की नियुक्तियों में दखल देना शुरू किया था तथा प्रदेश की राजनीति में अपने समर्थकों का एक धड़ा तैयार किया था। बीजेपी के कई नेता मानते हैं कि मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री के बीच सहमति नहीं बनने के कारण ही निगम मंडलों के पदाधिकारी सहित एल्डेरमेन की घोषणा नहीं हो पा रही है। इस देरी का ठिकरा संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा की असहमति पर फोड़ा गया। इसलिए, जब संघ की इंदौर बैठक में ही बुला कर उन्हें हटाने की जानकारी दी गई तो पार्टी ने खुशी की लहर दौड़ गई। यह खुशी इंदौर तक सीमित नहीं रही बल्कि भोपाल तक पहुंची।
यही कारण है कि जब केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया गया तो प्रदेश बीजेपी कार्यालय में स्थानीय नेताओं का जमावड़ा हुआ। साथ बैठ कर बजट को देखने का यह कार्यक्रम हितानंद शर्मा को हटाए जाने की खुशी का कार्यक्रम बनता दिखाई दिया। मीडियाकर्मियों ने पाया कि यह जश्न बजट के लिए कम, हितानंद शर्मा की संघ में वापसी पर ज्यादा था।
राजनीतिक आकलन है कि हितानंद शर्मा की विदाई से सीएम डॉ. मोहन यादव और अधिक मजबूत हो गए हैं। सीएम के अलावा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी हितानंद शर्मा की पॉवर अंब्रेला से बाहर आ गए है। अब संभव है कि बीजेपी में राजनीतिक और गैर राजनीतिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में गति आ जाएगी।
कांग्रेस की एकजुटता, विरोध कारगर बनाने की जुगत
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण हुई मौत के बाद जनता से जुड़ने के लिए कांग्रेस ने प्रदेश भर में आंदोलन की शृंखला शुरू की थी। लेकिन इसे जनता का वैसा मुद्दा नहीं बनाया जा सका जैसी अपेक्षा थी। अब जबकि भागीरथपुरा में बीमार हुआ लोगों में से 32 वीं मौत हो चुकी है, प्रदेश कांग्रेस 3 फरवरी को फिर इंदौर में आंदोलन कर रही है।
इस बड़े मुद्दे पर जनता की सीमित प्रतिक्रिया पर कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने चिंता जताई है। 3 फरवरी को विरोध प्रदर्शन के लिए आह्वान करते हुए जीतू पटवारी ने एक वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में जनता द्वारा तीखा विरोध न होने पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की फिक्र साफ दिखाई-सुनाई देती है। जीतू पटवारी ने अपने वीडियो में कहा है कि इंदौर के जो नागरिक भागीरथपुरा के दर्द से जुड़ाव नहीं दिखा रहे हैं वे यह न समझें कि खतरा उनसे दूर है। इस तरह का खतरा कल सभी के भविष्य को बिगाड़ सकता है।
जनता से आह्वान अलग बात है लेकिन जन आंदोलन के सहारे कांग्रेस की सक्रियता तथा एकजुटता बनाए रखने का जतन दूसरी बात है। ऐसी ही अन्य मुद्दों पर कांग्रेस नेताओं का मैदान में उतरना बीजेपी सरकार के प्रति आक्रोश को सार्थक विरोध में बदल पाएगा। अन्यथा, सारे विरोध प्रदर्शन कर्मकांड बन कर रह जाएंगे।
ये यूजीसी क्या बला है भाईसाहब?
बीजेपी नेताओं को इनदिनों एक खास समस्या ने परेशान कर रखा है। यह समस्या है, यूजीसी यानी उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियम। इन नियमों को सवर्ण समाज विरोधी बताया जा रहा है और धीरे-धीरे सवर्ण समाज की नाराजगी तीखे आक्रोश में बदल रही है। सवर्ण समाज के विभिन्न संगठन ने नेताओं के समझ विरोध जताने के साथ ही सड़क पर उतर कर नाराजगी जतानी शुरू कर दी है।
शिवपुरी और नरवर में बीजेपी के बजट लाइव प्रसारण कार्यक्रम के दौरान हंगामा हो गया। करैरा में यूजीसी कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने हंगामा मचाते हुए कुर्सियां तोड़ दी और नारेबाजी की। इस दौरान यहां पर अफरा-तफरी का माहौल निर्मित हो गया। इसके साथ ही नरवर में विरोध के दौरान एक दुकानदार के साथ मारपीट कर दी, जिससे यहां पर माहौल गरमाया गया और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।
यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। पीएम मोदी ने यूजीसी को रोक दिया है, जैसी खबरें भी बीजेपी नेताओं को राहत नहीं दे पा रही है। विरोध प्रदर्शन तीखा होता जा रहा है। बीजेपी पहले आरक्षण जैसे मामले को साधने में जुटी थी अब यूजीसी के रूप में नया बवाल शुरू हो गया है। नेताओं को इससे बचाव का रास्ता नहीं मिल रहा है। परेशान यह कि सवर्णों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी ने बड़ी मुश्किल से अन्य वर्गों को साधा है। अब यह जातीय समीकरण खतरे में पड़ रहे हैं। स्थानीय नेता संकट से निकलने का रास्ता पूछ रहे हैं, वे हैरान है कि यह बीजेपी के बड़े नेता इस पर मौन क्यों हैं और पार्टी इसे मैनेज क्यों नहीं कर पा रही है?