भोपाल। राज्यसभा सांसद एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर मध्य प्रदेश में बासमती चावल का उत्पादन करने वाले किसानों के साथ हो रहे अन्याय पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि पिछले कई वर्षों से मध्य प्रदेश के किसानों की यह मांग रही है कि प्रदेश के 14 जिलों में उत्पादित बासमती चावल को भौगोलिक संकेतक (जी.आई.) टैग दिया जाए, लेकिन केन्द्र सरकार की उदासीनता के कारण प्रदेश के किसान अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त करने से वंचित हो रहे हैं।



दिग्विजय सिंह ने अपने पत्र में कहा कि यह अत्यंत आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस विषय पर तीन माह पूर्व पत्र लिखने के बाद भी केन्द्र और राज्य सरकार ने किसानों के हित में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने बताया कि संसद के शीतकालीन सत्र में भी उन्होंने इस मुद्दे को उठाया था और मध्यप्रदेश के बासमती उत्पादक किसानों को जी.आई. टैग नहीं मिलने से हो रही आर्थिक क्षति और अन्याय की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया था।



उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल से लेकर मालवा और महाकौशल क्षेत्र तक लगभग 14 जिलों- श्योपुर, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, गुना, विदिशा, रायसेन, सीहोर, हरदा, होशंगाबाद, नरसिंहपुर और जबलपुर में हजारों किसान वर्षों से उच्च गुणवत्ता वाले सुगंधित बासमती चावल का उत्पादन कर रहे हैं। बावजूद इसके, जी.आई. टैग नहीं मिलने के कारण किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।





दिग्विजय सिंह ने कहा कि मध्यप्रदेश के किसान पिछले दो दशकों से इन जिलों के बासमती चावल को जी.आई. टैग देने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने मध्यप्रदेश के बासमती चावल को जी.आई. टैग प्रदान किया था, लेकिन वर्ष 2016 में वर्तमान केन्द्र सरकार ने इसे वापस ले लिया। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के बासमती चावल को जी.आई. टैग प्राप्त है, जबकि मध्यप्रदेश के किसानों को इस अधिकार से वंचित रखा गया है।



उन्होंने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों के मिल मालिकों और व्यापारिक लॉबी के दबाव के कारण मध्यप्रदेश के किसानों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। प्रदेश में उत्पादित बासमती चावल को औने-पौने दाम में खरीदकर उसे अन्य राज्यों के जी.आई. टैग के नाम पर विदेशों में निर्यात किया जा रहा है, जिससे कंपनियां और व्यापारी भारी मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि किसान अपने ही उत्पाद का उचित लाभ नहीं पा रहे।



दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा कि वर्तमान केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, जो लंबे समय तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं, उनके अपने क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में किसान बासमती चावल का उत्पादन करते हैं। इसके बावजूद अभी तक इस मु‌द्दे पर किसानों को न्याय नहीं मिल पाया है।



उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश में बासमती चावल की खेती की परंपरा 100 वर्ष से अधिक पुरानी है और अंग्रेजी शासनकाल के गजेटियरों में भी इसका उल्लेख मिलता है। प्रदेश की जलवायु और मिट्टी की गुणवत्ता के कारण यहां उत्पादित बासमती चावल की सुगंध और गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी है। अमेरिका, कनाडा, यूरोप और मध्य-पूर्व के देशों में इसकी भारी मांग है।



दिग्विजय सिंह ने कहा कि जहां भारत में मध्यप्रदेश के किसानों को जी.आई. टैग से वंचित रखा जा रहा है, वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अपने बासमती चावल के जी.आई. टैग वाले जिलों की संख्या 14 से बढ़ाकर 48 कर दी है और वर्ष 2030 तक 21 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात बाजार को लक्ष्य बनाकर काम कर रहा है। यदि भारत ने समय रहते अपने किसानों के हित में निर्णय नहीं लिया तो अंतरराष्ट्रीय बासमती बाजार में भारत की स्थिति कमजोर हो सकती है।



उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि एपीडा (APEDA) में बैठे उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए जो मध्यप्रदेश के किसानों के हितों के विरुद्ध काम कर रहे हैं। साथ ही मध्यप्रदेश के 14 जिलों में उत्पादित बासमती चावल को तत्काल जी.आई. टैग प्रदान किया जाए ताकि किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके।



दिग्विजय सिंह ने कहा कि जी.आई. टैग मिलने से न केवल प्रदेश के लाखों किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि मध्यप्रदेश के बासमती चावल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी और इससे देश को विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केन्द्र और राज्य सरकार ने इस मु‌द्दे पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया तो वे मध्यप्रदेश के किसानों के साथ मिलकर संसद से लेकर सड़क तक और खेतों से लेकर खलिहानों तक व्यापक आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।