मध्य प्रदेश में सड़कों और खेतों में घूम रहे लाखों आवारा पशुओं की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है। केंद्र सरकार ने राज्य के उस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है जिसके तहत आवारा मवेशियों के कान में 12 अंकों वाला लाल या केसरिया रंग का पहचान टैग लगाया जाएगा। इसके साथ ही सरकार ने विधानसभा में भरोसा दिलाया है कि नई नीति, गौशालाओं के विस्तार और सख्त कार्रवाई के जरिए अगले दो सालों में सड़कों पर आवारा मवेशी दिखाई नहीं देंगे।
अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के अनुसार, अब तक सभी पशुओं को पीले रंग के टैग लगाए जाते थे। जिसकी वजह से पालतू और आवारा पशुओं के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता था। इसी समस्या को देखते हुए रंग बदलने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया था जिसे मंजूरी मिल गई है। नए सिस्टम के तहत नगर निगम या मवेशी पकड़ने वाली टीमें बिना स्कैन किए ही दूर से पहचान सकेंगी कि कौन सा पशु लावारिस है और कौन किसी डेयरी या घर का है। यह व्यवस्था भारत पशुधन परियोजना के तहत लागू की जा रही है जिसमें हर मवेशी का एक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाएगा।
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राज्य में आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या अब सड़क सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन चुकी है। विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो सालों में मवेशियों की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की जान जा चुकी है। इसका मतलब है कि औसतन हर तीसरे दिन एक व्यक्ति सड़क पर आवारा पशु की वजह से अपनी जान गंवा रहा है।
इस मुद्दे को विधानसभा में कांग्रेस विधायक अजय सिंह और कैलाश कुशवाहा ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की लापरवाही के कारण आवारा पशुओं की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है और किसान तथा आम लोग इससे भारी परेशानी झेल रहे हैं। किसानों को खासकर खरीफ सीजन में रात भर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है क्योंकि आवारा मवेशी फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालांकि, सरकार ने फिलहाल फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं होने की बात कही है और विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है।
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पशुपालन और डेयरी मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि आवारा पशुओं का प्रबंधन ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और शहरी क्षेत्रों में नगरीय प्रशासन विभाग की जिम्मेदारी है। उन्होंने जानकारी दी कि साल 2025 में शहरी निकायों ने करीब 78,153 आवारा पशुओं को पकड़ा और उनके मालिकों पर कुल 25 लाख 58 हजार 753 रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
राज्य में फिलहाल 3,040 गौशालाएं हैं। इनमें मुख्यमंत्री गौ सेवा योजना के तहत बड़ी संख्या में पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है। लगभग 4.80 लाख आवारा पशुओं को गौशालाओं में रखा गया है। इनमें से 2,325 गौशालाएं गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाई जा रही हैं। जबकि, 703 ग्रामीण क्षेत्रों में और 12 शहरी निकायों द्वारा संचालित की जा रही हैं।
सरकार ने हाल ही में मध्य प्रदेश में आत्मनिर्भर गाय आश्रय स्थलों की स्थापना राज्य नीति-2025 को भी मंजूरी दी है। इस नीति का उद्देश्य बड़े और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर गौ आश्रय केंद्र बनाना है। इसके तहत कम से कम 5,000 मवेशियों की क्षमता वाले कामधेनु निवास स्थापित किए जाएंगे। इसके लिए करीब 130 एकड़ राजस्व भूमि उपलब्ध कराई जाएगी जिसमें से 5 एकड़ जमीन व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल की जा सकेगी ताकि गौशालाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
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सरकार ने गौशालाओं में रखे पशुओं के रखरखाव के लिए मिलने वाली सहायता राशि भी बढ़ा दी है। पहले जहां प्रति पशु प्रतिदिन 20 रुपये दिए जाते थे वहीं अब यह राशि बढ़ाकर 40 रुपये कर दी गई है। मंत्री लखन पटेल ने विधानसभा में विश्वास जताते हुए कहा कि जब नई गौशालाएं तैयार हो जाएंगी और व्यवस्थाएं पूरी तरह लागू हो जाएंगी तब आवारा पशुओं की समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि अगले दो सालों में सड़कों पर बेसहारा मवेशी दिखाई नहीं देंगे।
वहीं, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने भी इस मुद्दे पर कहा कि गौशालाओं को व्यावसायिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है ताकि गौ सेवा के साथ-साथ उनका बेहतर प्रबंधन भी हो सके। उन्होंने याद दिलाया कि देश का पहला गौ अभ्यारण्य शाजापुर में बनाया गया था लेकिन इस क्षेत्र में अभी और काम करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार आवारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान सरकार और सभी संबंधित पक्षों के संयुक्त प्रयासों से ही संभव है।
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