आपको आईएएस आयुष जाखड़ याद हैं आपको? शिवपुरी के करैरा में एसडीओपी रहते हुए आयुष जाखड़ ने बीजेपी के विधायक प्रीतम लोधी के बेटे दिनेश लोधी के बेटे पर कार्रवाई की थी। दिनेश लोधी ने पांच लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी थी। उन्हें इलाज के लिए भेजने की जगह वह जिम चला गया था। साथ ही लोगों को यह कहकर धमका रहा था कि हॉर्न बजा रहे थे, फिर भी सड़क पर बाइक क्यों लहरा रहे थे। करैरा में दिनेश लोधी का इतना आतंक है कि घटना के बाद पुलिस ने एफआईआर में उसका नाम भी नहीं लिखा था। जब मीडिया में खबर चली तो जाकर दिनेश लोधी का नाम एफआईआर में दर्ज हुआ है।

करैरा एसडीओपी आयुष जाखड़ ने दिनेश लोधी को थाने में बुलाकर फटकारा था। आईपीएस आयुष जाखड़ की इस कार्रवाई पर दिनेश के पिता विधायक प्रीतम लोधी ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी। विधायक ने अधिकारी से 15 दिन में स्पष्टीकरण मांगते हुए जवाब नहीं मिलने पर बंगला गोबर से भरवाने तक की धमकी दी थी। इस घटनाक्रम के बाद आईपीएस एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से कार्रवाई की मांग की थी।

इस घटना के बाद विधायक प्रीतम लोधी के तेवर ठंडे नहीं हुए बल्कि वे नए-नए मामलों में बयानों और कार्यों के कारण चर्चा और विवाद में बने हुए हैं। इस बीच आईपीएस आयुष जाखड़ का तबादला हो गया है। उन्हें और उनकी पत्नी आईपीएस अधिकारी अनु बेनिवाल को भी जबलपुर एडिशनल एसपी बना कर भेजा गया है। आईपीएस अनु बेनिवाल उस समय सुर्खियों में आई थीं, जब थाना प्रभारी रहते हुए उनका एक वकील से विवाद हो गया था। इसके बादबार एसोसिएशन ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। 

इन दोनों अफसरों के तबादलों ने नए राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। सरकार इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता रही है लेकिन बात तो यह है कि राजनीतिक लड़ाई में फायदा विधायक का ही हुआ हैं। कहा जा रहा है कि बीजेपी ने अपने विधायक प्रीतम लोधी के आपत्तिजनक व्यवहार पर लगाम तो लगाई नहीं सरकार ने अफसरों का तबादला कर दिया। अंतत: उस अफसर को जाना ही पड़ा जिसने बीजेपी विधायक से पंगा लिया था। यह बात और है कि दोनों आईपीएस के लिए यह सुविधा होगी कि पति-पत्नी एक साथ एक ही जगह पर काम करेंगे। 

बहुत कुछ कहता है लोकायुक्त दफ्तर में भ्रष्टाचार का स्टिंग

प्रदेश में भ्रष्टाचारियों और घूसखोर अधिकारियों पर कार्रवाई करने के लिए स्थापित विशेष पुलिस स्थापना (लोकायुक्त) इन दिनों स्वयं गंभीर सवालों के घेरे में है। दैनिक भास्कर डिजिटल ने एक स्टिंग ऑपरेशन कर लोकायुक्त में भ्रष्टाचार की पोल खोल दी है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बनाए गए संगठन में ही भ्रष्टाचार व्याप्त होने की आशंकाएं तो बरसों से व्यक्त की जा रही थीं लेकिन अब तो खुल कर मामले सामने आने लगे हैं। काम के बदले पैसे की मांग करने के स्टिंग ऑपरेशन के बाद लोकायुक्त डीजी योगेश देशमुख ने हेड कॉन्स्टेबल यशवंत सिंह ठाकुर और ड्राइवर अमित विश्वकर्मा को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। दो डीएसपी और तीन हेड कॉन्स्टेबल पर भी कार्रवाई हुई है। इससे पहले शुक्रवार सुबह भोपाल, सागर और रीवा संभाग के 3 एसपी हटाए गए थे। भोपाल संभाग से हटाकर एसपी दुर्गेश कुमार राठौर को सागर भेजा गया है। 

लोकायुक्त का गठन सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के लिए किया गया था। इस स्टिंग ऑपरेशन में ड्राइवर से लेकर डीएसपी स्तर तक के अधिकारियों के नाम चर्चाओं में आने के बाद संगठन की साख पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। सवाल यह है कि क्या अनियमितताओं और प्रकरणों को कमजोर करने का खेल केवल निचले अथवा मध्य स्तर के अधिकारियों तक सीमित था या फिर इसके तार उच्च पदस्थ अधिकारियों तक भी जुड़े हुए है? 

लोकायुक्त जैसी संस्था पर जनता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। भ्रष्टाचार पर अंकुश और संस्थागत पारदर्शिता बना रखने के लिए सूचना का अधिकार कानून लाया गया था मगर मध्य प्रदेश सरकार ने अगस्त 2011 में एक अधिसूचना जारी कर लोकायुक्त के विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) और राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) को आरटीआई के दायरे से बाहर कर दिया था। सरकार का तर्क था कि शिकायतकर्ताओं और गवाहों की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है। इस निर्णय की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि आखिर किस कानूनी आधार पर मप्र लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार कानून से छूट दी गई है। कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकारें सिर्फ सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 24(4) के तहत उन्हीं संस्था या संगठनों को छूट दे सकती हैं जो खुफिया और सुरक्षा संगठन (इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेश) है। मप्र का लोकायुक्त संगठन के जिम्मे ऐसा कौन सा काम है जो धारा 24 (4) के दायरे में आता है? जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुलकर की पीठ ने सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर दिया है।
कोर्ट का फैसला आना शेष है लेकिन इस बीच भ्रष्टाचार पर यह स्टिंग सामने आ गया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि यह स्टिंग तो एक नमूना है, पड़ताल की जाए तो लोकायुक्त की साख गिराने वाले ऐसे कई मामले सामने आ सकते हैं। 

रेरा में अध्यक्ष बनने के लिए 16 आईएएस में रेस 

रेरा यानी रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अथॉरिटी को जल्द अध्यक्ष मिल जाएगा। अप्रैल से खाली पड़े इस पद के लिए एक, दो नहीं पूरे डेढ़ दर्जन रिटायर्ड आईएएस में दौड़ है। सरकार ने रेरा चेयरमैन पद पर नियुक्ति के लिए 16 आईएएस अधिकारियों की सूची तैयार कर ली है। इन अफसरों में बीते तीन सालों में रिटायर हुए सभी प्रमुख आईएएस अधिकारी शामिल हैं। इन आईएएस में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैस, अजय तिर्की, कल्पना श्रीवास्तव, राजीव रंजन, अश्विनी कुमार टाय, संजय बंधोपाध्याय, पंकज राग, मलय श्रीवास्तव, एसएन मिश्रा, अजीत केसरी, विनोद कुमार, जेएन कंसोटिया और स्मिता भारद्वाज के नाम शामिल हैं। यह सूची हाईकोर्ट रजिस्ट्रार को भेज दी गई है। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली समिति सरकार द्वाराम भेजे गए पैनल से नए रेरा चेयरमैन का चयन करेगी।

हाईकोर्ट ने रेरा अध्यक्ष और ट्रिब्यूनल में पद खाली होने पर सुनवाई करते हुए सरकार द्वारा चयन प्रक्रिया में देरी पर नाराजगी जताई थी। रेरा में अध्यक्ष न होने के कारण प्रदेश में कंस्ट्रक्शन के कई मामले अनुमति के इंतजार में अटके हुए हैं। इस कारण केवल बिल्डर्स हर परेशान नहीं है बल्कि आम जनता की शिकायतों पर भी कार्रवाई नहीं हो पा रही है। हाईकोर्ट में इस मामले पर 23 जून को अगली सुनवाई होनी है। उम्मीद है कि इस सुनवाई के पहले रेरा को नया अध्यक्ष मिल जाएगा। यानी, जल्द ही एक रिटायर्ड आईएएस का पुनर्वास होने वाला है। 

रील से बीमार या प्रसिद्धि का खुमार

प्रदेश में कई अफसर रील बना कर सोशल मीडिया पर मशहूर हो रहे हैं। ऐसे ही शहडोल में एक हेड कांस्टेबल हैं जो सोशल मीडिया पर खूब फेमस हैं। अपनी रील्स और वीडियो के कारण चर्चाओं में रहने वाले यातायात विभाग के हेड कांस्टेबल विवेकानंद तिवारी को पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव ने निलंबित कर दिया है। इस आदेश में कहा गया कि हेड कांस्टेबल विवेकानंद तिवारी करीब 15 दिनों से बिना किसी पूर्व सूचना के ड्यूटी से अनुपस्थित थे। इसी दौरान वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम सहित अन्य माध्यमों पर लगातार वीडियो और रील्स बनाकर अपलोड करते दिखाई दिए। विभागीय जांच में यह बात सामने आई कि आरक्षक शासकीय कार्य से दूरी बनाकर निजी प्रचार और व्यक्तिगत लाभ के उद्देश्य से सोशल मीडिया गतिविधियों में सक्रिय थे।

एसपी के इस आदेश के बाद हेड कांस्टेबल विवेकानंद तिवारी ने सोशल मीडिया पर मेडिकल दस्तावेज शेयर करते हुए कहा है कि वे पिछले कई महीनों से मानसिक तनाव, अवसाद, घबराहट और अनिद्रा जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे। डॉक्टर्स ने उन्हें आराम की सलाह दी थी। उन्होंने इसकी जानकारी विभागीय व्हाट्सएप समूह में भी दी गई थी। बीमारी के दौरान सोशल मीडिया पर अधिकांश वीडियो उनकी टीम और परिजनों द्वारा अपलोड किए गए साझा किए गए थे। 

संभव है कि हेड कांस्टेबल वाकई मानसिक समस्याओं के कारण ड्यूटी से गायब हो क्योंकि रील बनाने का शौक मानिसक बीमारी बनता जा रहा है। फिलहाल, इस मामले पर बहस छिड़ गई है कि यातायात जागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए शहडोल का नाम राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने वाले हेड कांस्टेबल पर कार्रवाई उचित नहीं है। जबकि एक तर्क यह है कि सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाना अलग बात है और विभागीय अनुशासन का पालन करना अलग बात है।