भोपाल में रहवासी इलाकों में संचालित हो रहे लगभग 62 हजार 500 व्यवसाय अवैध साबित हो रहे हैं। इन पर बंद होने का  खतरा मंडरा रहा है। नगर निगम द्वारा अब तक 7 हजार से अधिक दुकानदारों और परिसरों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं तथा कुछ मामलों में सख्त अल्टीमेटम देकर तालेबंदी शुरू कर दी गई है। व्यापारी परेशान हैं। उनका तर्क कि वे टैक्स भर रहे हैं, व्यवसाय की अनुमति है फिर उनकी दुकान-संस्थान अवैध कैसे? जबकि दोष मास्टर प्लान नहीं आने का है। 

भोपाल-इंदौर जैसे शहरों की विकास योजनाएं तो रोज बन रही है लेकिन 2005 से अब तक इन शहरों का मास्टर प्लान ही नहीं बन सका है। मास्टर प्लान जारी नहीं हो पाने को लेकर अक्सर नेता और अफसर निशाने पर रहते हैं। अब जब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद दुकानें बंद होने की कगार पर आ गई हैं तो अफसरों ने भी अपनी पक्ष रखा है। 

पूर्व मुख्य सचिव अनुराग जैन ने अफसरों के एक व्हाटस अप ग्रुप में मास्टर प्लान जारी न करवा पाना अपनी विफलता बताया है। उन्होंने दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के वाइस चेयरमैन रहते हुए दिल्ली मास्टर प्लान-2041 से मिले अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि उसी आधार पर भोपाल और इंदौर के मास्टर प्लान तैयार करने पर काम किया गया था। मगर प्लान जारी नहीं हो सका। 

बीते दिनों हुए इस संवाद में अन्य आईएएस अफसरों ने सरकार की कार्य प्रणाली पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ऐसे कैसे संभव हो गया कि भोपाल इंदौर जैसे शहरों के विकास की बुनियाद राजनीति की भेंट चढ़ गई? एक अन्य पूर्व मुख्य सचिव अवनी वैश्य ने लिखा कि पिछले 20 वर्षों में विशेषज्ञों से राय लेकर मास्टर प्लान करीब एक दर्जन बार तैयार हो चुका है, लेकिन हर बार राजनीतिक नेतृत्व ने उसे खारिज कर दिया। प्रदेश एक ऐसा 'सॉफ्ट स्टेट' बन गया है, जो ऐसे फैसले लेने में असमर्थ है जिनसे मुट्ठीभर लोगों भी तकलीफ हो सकती है। रिटायर्ड आईएएस केएम आचार्य ने कहा कि भोपाल कभी रहने योग्य शहर माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे शहर दूसरी दिशा में जा रहा है।

जाहिर है, मास्टर प्लान बनाने में शामिल रहे अफसरों न प्लान जारी न होने और उससे बिगड़े हालात पर चुप्पी तोड़ी है और उनका आक्रोश उस राजनीतिक सिस्टम से जिसके सुस्त चाल के लिए अफसरों को ही दोषी करार दिया जाता है।  

निलंबित होते ही सीएसपी नेहा के पुराने मामले ताजा

ग्लैमर की दुनिया से पुलिस जैसी जवाबदेह नौकरी में आई सीएसपी  नेहा पच्चीसिया कुछ ही माह में दूसरी शिकायत के बाद निलंबित हो चुकी हैं। लम्बन के बाद सोशल मीडिया पर उनके पुराने मामले ताजा हो गए हैं। कटनी  में पदस्थ रही पुलिस अधिकारी नेहा पच्चीसिया पर पद का दुरुपयोग कर हत्या के आरोपी को जमानत दिलवाने, बदले में जबरन कीमती जमीन हड़पने, धोखाधड़ी करने और अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगे हैं।

इससे पहले एक ट्रांसपोर्ट व्यवसायी ने आरोप लगाया था कि उनकी  गाड़ियों को छोड़कर रेत और डोलोमाइट के परिवहन को हरी झंडी देने के बदले में 30 हजार की रिश्वत मांगी गई। इसमें से 25 हजार नकद ले भी लिए गए थे। व्यवसायी ने साक्ष्यों के साथ शिकायत की। इसके बाद एसपी ने सीएसपी नेहा पच्चीसिया से तीन थानों का प्रभार वापस ले लिया था और ड्राइवर को निलंबित कर दिया था। हालांकि, बाद में ट्रांसपोर्टर ने शिकायत वापस ले ली थी इसके बाद एक बेहद सनसनीखेज आरोप सामने आया। यह आरोप  डिफॉल्ट बेल पर जेल से बाहर आए हत्या के आरोपी आकाश लोधी ने लगाया। 

आकाश लोधी और उसके परिवार ने सीएसपी नेहा पच्चीसिया पर जेल से बाहर निकालने के बदले 75 लाख मांगने और डरा-धमकाकर करीब 82.86 लाख की सरकारी गाइडलाइन मूल्य वाली जमीन 18.20 लाख में अपने करीबियों के नाम रजिस्ट्री करवाने का आरोप लगाया। जांच अधिकारी एएसपी अनु बेनीवाल ने आरोपों को सही पाया। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सीएसपी नेहा पच्चीसिया को निलंबित कर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इस कार्रवाई के बाद गुना में दो पत्रकारों के साथ की गई कार्रवाई के अलावा अन्य विवादास्पद मामले चर्चा में आ गए हैं। कोरोना महामारी के समय गुना में आवाज उठाने पर पत्रकारों के खिलाफ एक नाटकीय ढंग से एक शिकायत हुई थी। शिकायत की जांच नेहा पच्चीसिया को मिल गई। पत्रकार दबाव में नहीं आए इसी के बाद नेहा पच्चीसिया का भी तबादला हो गया था।  कटनी में भी ट्रांसपोर्टर शिकायत के बाद जरूर पलट गया लेकिन दूसरी शिकायत बहुत गंभीर श्रेणी की थी। यहां प्रभाव काम नहीं आया।

आईएएस से अभद्रता, एबीवीपी पर आरोप बिगाड़ा आंदोलन

प्राथमिक शिक्षक परीक्षा-2025 वर्ग-3 के लगभग 900 चयनित अभ्यर्थी पिछले 17 दिनों से अपनी मांगों को लेकर लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) के सामने धरने पर बैठे हैं। गुरुवार दोपहर जब निर्दलीय छात्र नेता अमन सिंह चौहान और करीब 25-30 एबीवीपी कार्यकर्ता परिसर पहुंचे, तो श्रेय लेने की होड़ हो गई। डीपीआई के अधिकारियों-कर्मचारियों ने कहा कि गुरुवार शाम छह बजे के करीब प्रदर्शन कर रहे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ता आयुक्त अभिषेक सिंह के कक्ष में घुस गए। आरोप है कि कार्यकर्ताओं ने आयुक्त के साथ धक्का-मुक्की और अभद्रता की। 

पुलिस के पहुंचने के बाद मामला शांत हुआ। बाद में आयुक्त अभिषेक सिंह ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को माफ कर दिया है। वे उन पर कार्रवाई की अनुशंसा नही करेंगे। लेकिन इस विवाद के दौरान आईएएस तथा डीपीआईवी के आयुक्त अभिषेक सिंह द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए निजी बाउंसर बुलाने के वीडियो वायरल हो गए। इससे सवाल उठे कि क्यों सरकारी दफ्तर में आईएएस ने निजी बाउंसर क्यों बुलवाए? यह कार्य पुलिस को सौंपना जाना था। वे मामले को अपने स्तर पर क्यों निपटना चाहते थे? 

इस पूरे मामले पर प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे शांति से प्रदर्शन कर रहे थे। एबीवीपी कार्यकर्ताओं के आने के बाद बात बिगड़ी। मगर कर्मचारी संगठन मांग कर रहे हैं कि दोषियों पर कार्रवाई हो। उनका कहना है कि सरकारी दफ्तर में आईएएस से अभद्रता ठीक नहीं कही जा सकती है। इससे शासकीय कार्य प्रभावित हुआ है और अधिकारियों-कर्मचारियों में भय एवं असुरक्षा का माहौल बना। 

जो खुद भोगा वह अब दूसरों के साथ कर रही हैं आईएएस नेहा माराव्या 

आपको आईएएस नेहा मारव्या याद होंगी? 2011 बैच की आईएएस अधिकारी नेहा मारव्या अफसरों से विवादों और फिर 14 साल तक कलेक्टरी न मिलने को लेकर चर्चा में रही हैं। जनवरी 2025 में उन्होंने कलेक्टर न बन पाने को लेकर सोशल मीडिया पर सार्वजनिक पीड़ा व्यक्त की थी, इसके बाद उन्हें डिंडौरी कलेक्टर बनाया गया। डिंडोरी में कलेक्टर रहते हुए उनका कर्मचारियों से विवाद हुआ। कर्मचारियों ने उन पर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे। ऐसी स्थिति में 10 माह बाद ही उनका तबादला कर दिया गया था। 

इनदिनों वे जनजातीय क्षेत्रीय विकास परियोजना की संचालक हैं। इस दफ्तर में भी  अधिकारी-कर्मचारी आईएएस नेहा माराव्या के खिलाफ सड़क पर उतर आए हैं। उनका आरोप है कि संचालक नेहा मराव्या उनके साथ बदसलूकी करती हैं। कर्मचारियों का इंक्रीमेंट रोकने, बार-बार नोटिस देने और सस्पेंड करने की धमकी देती हैं। परियोजना के अपर आयुक्त भी आईएएस के खिलाफ खुलकर सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि 13 अगस्त को भी एक मीटिंग में एक विषय पर चर्चा के दौरान संचालक नेहा मारव्या 2 अपर संचालक स्तर की दो महिला अधिकारियों पर बुरी तरह से भड़क गई और उन्होंने दोनों को मीटिंग से बाहर कर दिया। इस तरह का व्यवहार आम हो गया है।

कर्मचारी व अधिकारियों ने इस मामले को लेकर मुख्य सचिव से मुलाकात करने का समय मांगा है। राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी आईएएस के व्यवहार को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखा है।