मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की भोपाल यात्रा पर उन्हें घेरने के लिए तीन प्रश्न किए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ये सवाल राहुल गांधी पर कटाक्ष करने के उद्देश्य से पूछे थे लेकिन खुद ही अपने पुराने बयानों के कारण घिर गए। सोशल साइट्स पर सीएम डॉ. मोहन यादव से ही उनके पुराने बयानों को लेकर सवाल पूछे जाने लगे।
24 फरवरी को मीडिया से चर्चा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हमारे प्रदेश आ रहे हैं। मैं उनका स्वागत करता हूं, लेकिन किसान चौपाल लगा रहे राहुल गांधी से मैं पूछना चाहता हूं कि वे बताएं रबी और खरीफ की फसल क्या होती है? मुख्यमंत्री ने दूसरा सवाल दलहन को लेकर पूछा, दलहन में क्या-क्या फसलें आती हैं। राहुल गांधी से किया गया तीसरा सवाल तिलहन से जुड़ा हुआ था कि तिलहन में कौन-कौन सी फसलें होती हैं, उन्हें कैसे बढ़ावा दें? मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राहुल गांधी अपने सुझाव भी बताएं और दूध उत्पादन में उनके मन में क्या विचार है ये भी बताएं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सवाल पूछने के अंदाज पर कांग्रेस का जवाब जब आना होगा तब आएगा लेकिन सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल होने पर कुछ पाठकों ने प्रतिप्रश्न कर दिए। जैसे, एक खबरिया चैनल पर मुख्यमंत्री के बयान वाली खबर के प्रसारित होने पर एक पाठक ने लिखा, ‘‘मीडिया वाले से निवेदन है कि मोहन यादव जी से यूं पूछे कि गुड का बीज कहां मिलता है और 50 क्विंटल प्रति बीघा वाला गेहूं का बीज कहां मिलता है? केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मंत्रालय द्वारा किसान कल्याण योजना के तहत हर चार महीने में 2000 रुपए किसानों के खाते में ट्रांसफर होते हैं। 4 महीने में कितने दिन होते हैं? दूसरों पर उंगली उठाना सरल है लेकिन तीन उंगलियां अपने गिरेबान की तरफ भी इशारा करती है। अपन कौन से दूध के धुले हैं? दिव्यांग पेंशन 1500 रुपए करने का वादा किया था सरकार ने। क्या आज तक पूरा किया है? वादा 1500 का जबकि पूरे देश में एक मात्र मध्य प्रदेश हैं जहां दिव्यांगों को मात्र 600 रुपए प्रति महीना मिलता है। अन्य प्रदेशों में 2 से 5 हजार तक दिया जा रहा है।
नेताओं की जुबान अक्सर फिसल जाती है। इसके अलावा सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी भी बयानों को कांट-झांट कर अपनी सुविधा से विवादास्पद बना कर नेताओं को घेरती हैं और उनकी बुद्धि पर सवाल उठाती है। ऐसे में कई बार नेताओं के बयान फंदे की तरह साबित होते हैं जो मौका आने पर खुद के गले में कस जाते हैं। ऐसा ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ भी हुआ कि वे सवाल तो राहुल गांधी से कर रहे थे लेकिन खुद सवालों से घिर गए।
कैलाश विजयवर्गीय खुद उलझ गए या उलझा दिए गए?
मध्यप्रदेश के राजनीतिक जगत में बीते कुछ दिनों से यह चर्चा गरम है कि भाजपा के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को आखिर हुआ क्या है? अपने तरीकों से संगठन के बड़े-बड़े काम चुटकियों में करने वाले कैलाश विजयवर्गीय के सितारे ऐसे गर्दिश में गए कि वे हर बार आ बैल मुझे मार वाली स्थिति में फंस जाते हैं। इंदौर में भागीरथपुरा मामले में मीडिया से चर्चा के दौरान उनके बिगड़़े बोल राष्ट्रीय फलक तक पहुंच गए। उनका व्यवहार ऐसा मुद्दा बना कि वे हाशिए पर चले गए। या कहा जा सकता है कि हाशिए पर धकेल दिए गए।
इसके बाद विधानसभा में बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के लिए ऐसा बोल गए कि सदन के नेता मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को माफी मांगनी पड़ी। खुद कैलाश विजयवर्गीय ने इस मामले पर खुद को शर्मसार पाया। भागीरथपुरा मामले पर जब विपक्ष कांग्रेस सरकार को घेर रहा था तब भागीरथुपरा में दूषित पानी से मौत के आंकड़े पर गफलत हो गई। विपक्ष ले लगाया कि सरकार अलग-अलग आंकड़ें बता रही है।
सदन में गलत बयानी पर घिरे मंत्री कैलाश विजयवर्गीय विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के कक्ष में चर्चा के दौरान अफसरों पर खूब बरसे। वे इस बात से नाराज थे कि अफसरों ने जवाब बनाते समय आंकड़ें समान क्यों नहीं रखे। मंत्री को नाराज देख विभाग के एसीएस संजय दुबे को बुलाया गया। आईएएस संजय दुबे ने कहा कि अफसरों ने जवाब गलत नहीं बनाए हैं। मंत्री ही नोट को समझ नहीं पाए। इस पर कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि विधानसभा में बहस चल रही थी तब अफसरों ने उन्हें जानकारी क्यों नहीं दी। इसके बाद शहरों के मास्टर प्लान पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को विपक्ष ने घेरा। चर्चा का जवाब देते हुए मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि अधिकारियों ने बैठकर मेट्रो की प्लानिंग कर ली, जन प्रतिनिधियों से चर्चा ही नहीं की और एकदम शहर को थोप दिया।
सभी जानते हैं कि अफसरों के साथ कैलाश विजयवर्गीय का कई बिंदुओं पर विवाद और असहमतियां होती रही हैं। कैलाश विजयवर्गीय जननेता हैं और उन्होंने अफसरों को हमेशा किनारे रखा है। वे अपने फैसले खुद लेते हैं और अफसरशाही को खुद के फैसलों पर हावी नहीं होने देते हैं। लेकिन समझ नहीं आ रहा है कि इस बार वे स्वयं विवादों में उलझ रहे हैं या राजनीतिक रूप से जाल में उनके पैर फंस कर लड़खड़ा रहे हैं? यह आम जिज्ञासा है कि कैलाश विजयवर्गीय किसी खास राजनीतिक चालों में तो नहीं उलझ रहे हैं?
गाय पर राजनीति मगर सदन में चुप्पी
बीजेपी और सहयोगी संगठन गाय को लेकर भरपूर राजनीति करते हैं मगर जब सदन में कांग्रेस विधायक आतिफ अकील गो वंश को लेकर अशासकीय संकल्प ले कर आते हैं तो बीजेपी सरकार की गो वंश को लेकर चिंता चुप्पी में बदल गई। विधायक आतिफ अकील ने गाय को राष्ट्र पशु घोषित करने की मांग करते हुए अशासकीय संकल्प प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यदि गाय की मृत्यु हो जाती है तो उसका अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक किया जाना चाहिए। अपने संकल्प में कांग्रेस विधायक आतिफ अकील ने चमड़े के व्यापार को बंद करने की भी मांग की।
बीजेपी ने इस प्रस्ताव को पारित करने की जगह प्रयत्न किया कि विधायक आतिफ अकील इसे वापस ले लें। भोपाल के हुजूर क्षेत्र से बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने इसे पब्लिसिटी स्टंट करार देते हुए कहा कि मोहन सरकार गौ माता का सम्मान करती है और उसकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होकर काम कर कर रही है।
विधायक आतिफ अकील का तर्क था कि उनके पिता विधायक आरिफ अकील ने 2017 में भी ये प्रस्ताव रखा था। तब भी बीजेपी सरकार ने इस पर मतदान क्यों नहीं करवाया था? गौरतलब है कि भोपाल में 26 टन गो मांस पकड़े जाने के बाद खुलासा हुआ है कि नगर निगम के स्लॉटर हाउस में गोकशी हो रही है और गोमांस बाहर भेजा रहा था। कांग्रेस विधायक आतिफ अकील का प्रस्ताव पारित नहीं हुआ लेकिन इस मुद्दे पर सरकार को कटघेर में खड़ा कर दिया। उजागर हुआ कि गो वंश को लेकर राजनीति अलग है और सरकार की आर्थिकी अलग।
जिस सभा में मुख्यमंत्री शक्ति बता रहे थे, उसी में अपमान
रविवार को महू में विधायक उषा ठाकुर की अगुआई में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 85 करोड़ के विकास कार्यों का लोकार्पण व भूमिपूजन किया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस कार्यक्रम में चुनाव के पहले परिसीमन होने की बात करते हुए कहा कि यह समय महिलाओं का है और आने वाले समय में महिला शक्ति अधिक ताकत से सदन में होगी।
जब मुख्यमंत्री बोल रहे थे तब मंच पर विधायक उषा ठाकुर के साथ केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर और राज्यसभा सदस्य कविता पाटीदार भी मौजूद थी। इस कार्यक्रम में जैसे ही डिजिटल शिलालेख सामने आया वैसे ही राज्यसभा सदस्य कविता पाटीदार का चेहरा उतर गया। असल में शिलालेख पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव, केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर, विधायक उषा ठाकुर सहित जिले के एक दर्जन से अधिक नेताओं के नाम थे लेकिन गृह क्षेत्र होने के बावजूद सांसद कविता पाटीदार का नाम नहीं होने था। यह किसी भी जन प्रतिनिधि के लिए नागवार होता है कि उसके क्षेत्र में ही समर्थकों के सामने उसका अपमान हो जाए। शिलालेख पर नाम होने से नाराज राज्यसभा सदस्य कविता पाटीदार ने सत्ता और संगठन तक शिकायत पहुंचा दी है।
असल में राज्यसभा सांसद का नाम छूटने को कोई चूक या मानवीय त्रुटि नहीं माना जा रहा है। इसके पीछे की वजह राजनीतिक है। दोनों नेत्रियों के बीच में विधानसभा चुनाव के पहले से अदावत है। इंदौर से विधायक रही उषा ठाकुर को इंदौर की स्थानीय राजनीति के चलते महू सीट पर भेजा जा रहा था तो महू में भाजपा का एक धड़ा उषा ठाकुर को टिकट देने का विरोध कर रहा था। इन विरोधियों में कविता पाटीदार से जुड़ा हुआ था। कविता पाटीदार महू में अपने पिता भेरूलाल पाटीदार की राजनीतिक विरासत को संभाल रही हैं। वे महू में अपनी राजनीति पकड़ बनाए रखना चाहती हैं।
विधायक उषा ठाकुर के लिए भी महू में अपनी पकड़ को मजबूत बनाए रखना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है। दोनों नेत्रियों ने इस वर्चस्व को बनाए रखने के लिए हर राजनीतिक दांव-पेंच अपनाए है। फिर चाहे वह मंडल व जिला पदाधिकारियों की नियुक्ति का मामला हो या स्थानीय राजनीति में समर्थकों को आगे बढ़ाने का संघर्ष। ऐसे में जब विधायक उषा ठाकुर के नेतृत्व में हुए कार्यक्रम में राज्यसभा सदस्य कविता पाटीदार का नाम छूटा तो इसकी वजह सामान्य गलती नहीं बल्कि राजनीतिक ही अधिक मानी जाएगी।