भारत के युवा ग्रैंडमास्टर रमेशबाबू प्रज्ञानंद ने दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित शतरंज प्रतियोगिताओं में से एक नॉर्वे चेस का खिताब जीतकर भारतीय शतरंज को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। तमिलनाडु के 20 वर्षीय खिलाड़ी ने टूर्नामेंट के अंतिम राउंड में जर्मनी के विन्सेंट केमर को हराकर 3 अंक हासिल किए और कुल 18 अंकों के साथ चैंपियन बने। यह प्रतियोगिता 25 मई से 5 जून तक नॉर्वे में आयोजित हुई थी।
फाइनल राउंड से पहले प्रज्ञानंद 15 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर थे और फिलिपिनो-अमेरिकी ग्रैंडमास्टर वेस्ले सो से आधा अंक पीछे चल रहे थे। हालांकि, अंतिम दौर में वेस्ले सो और एलिरेज फिरोजा के बीच मुकाबला ड्रॉ रहने से सो के 17 अंक ही हो सके। दूसरी ओर प्रज्ञानंद ने अपनी जीत के साथ बढ़त बना ली और खिताब अपने नाम कर लिया।
खिताबी जीत के बाद नॉर्वे चेस से बातचीत में प्रज्ञानंद ने कहा कि जैसे-जैसे जीत करीब आती गई उनका तनाव भी बढ़ता गया। उन्होंने स्वीकार किया कि वह अभी भी उसी मानसिक स्थिति में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि टूर्नामेंट के दौरान चार क्लासिकल मुकाबलों में जीत हासिल करना उनके लिए खिताब जीतने जितना ही महत्वपूर्ण रहा।
इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में दुनिया के केवल छह पुरुष और छह महिला खिलाड़ी शामिल हुए थे। प्रज्ञानंद का सबसे चर्चित प्रदर्शन तब रहा जब उन्होंने विश्व नंबर-1 और मेजबान देश के स्टार खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन को दो बार मात दी। खास बात यह रही कि उन्होंने कार्लसन को एक बार सफेद और एक बार काले मोहरों से खेलते हुए हराया। जिसने शतरंज जगत का ध्यान उनकी ओर खींच लिया।
प्रज्ञानंद के कोच वैभव सूरी ने इस सफलता को बेहद खास बताया। उन्होंने कहा कि कार्लसन जैसे खिलाड़ी को हराना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि है क्योंकि वह लंबे समय से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में शामिल हैं। सूरी के मुताबिक, टीम ने किसी विशेष खिलाड़ी के लिए अलग रणनीति बनाने के बजाय अपने खेल और तैयारी की प्रक्रिया पर भरोसा रखा तथा प्रत्येक मुकाबले के तकनीकी पहलुओं पर गहराई से काम किया।
टूर्नामेंट में प्रज्ञानंद की शुरुआत मिश्रित रही थी। पहले राउंड में वेस्ले सो के खिलाफ ड्रॉ से उन्हें 1.5 अंक मिले थे। जबकि, दूसरे दौर में उन्हें अलीरेजा फिरोजा के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। तीसरे राउंड में उन्होंने मैग्नस कार्लसन को हराकर शानदार वापसी की। चौथे राउंड में विंसेंट कीमर के खिलाफ ड्रॉ के बाद पांचवें और छठे दौर में उन्हें क्रमशः डी गुकेश और वेस्ले सो से हार मिली।
हालांकि, इसके बाद प्रज्ञानंद ने टूर्नामेंट का रुख ही बदल दिया। उन्होंने लगातार चार मुकाबले जीतकर खिताब की दौड़ में जोरदार वापसी की। सातवें राउंड में अलीरेजा फिरोजा, आठवें में मैग्नस कार्लसन, नौवें में डी गुकेश और अंतिम दौर में विंसेंट कीमर को हराकर उन्होंने लगातार चार जीत दर्ज कीं। पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने पांच मैच जीते, दो मुकाबले ड्रॉ खेले और कुल 18 अंक हासिल किए।
कोच वैभव सूरी ने बताया कि इतने लंबे और दबाव भरे टूर्नामेंट के दौरान केवल तकनीकी तैयारी ही नहीं बल्कि मानसिक संतुलन बनाए रखना भी अहम था। वह अक्सर प्रज्ञानंद के साथ टहलने निकलते थे और शतरंज से इतर विषयों पर बातचीत करते थे। राजनीति से लेकर अन्य खेलों तक हल्की-फुल्की चर्चाएं खिलाड़ी पर दबाव कम करने में मदद करती थीं।
दिलचस्प बात यह रही कि प्रज्ञानंद टूर्नामेंट के दौरान आईपीएल पर भी नजर बनाए हुए थे। खासकर युवा क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी को लेकर वह अपने कोच वैभव सूरी के नाम से मजाक करते रहते थे। कोच के अनुसार, इस तरह की शरारतों और हल्के माहौल ने प्रज्ञानंद को तनाव से दूर रखा।
दुनिया के सबसे कम उम्र में इंटरनेशनल मास्टर बनने का रिकॉर्ड अपने नाम रखने वाले रमेशबाबू प्रज्ञानंद ने अब नॉर्वे चेस का प्रतिष्ठित खिताब जीतकर एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय शतरंज विश्व मंच पर लगातार मजबूत होता जा रहा है। उनकी यह सफलता भारतीय खिलाड़ियों की नई पीढ़ी के बढ़ते दबदबे का भी बड़ा संकेत मानी जा रही है।