भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार एक ओर कर्ज के बोझ तले दबती जा रही है, वहीं प्रचार-प्रसार और विज्ञापनों पर होने वाले खर्च में कोई कमी नहीं दिख रही है। राज्य सरकार की कुल देनदारी पांच लाख करोड़ रुपये को पार कर चुकी है। सरकार की आय का एक बड़ा हिस्सा कर्ज पर ब्याज चुकाने में जा रहा है। इसके बावजूद सरकार का फोकस कर्ज का बोझ कम करने के बजाय अपनी इमेज चमकाने पर ज्यादा नजर आ रहा है। स्थिति यह है कि सरकार प्रतिदिन औसतन 1 करोड़ 90 लाख रुपये विज्ञापन और प्रचार पर खर्च कर रही है।

न्यूज़लॉन्ड्री ने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में बताया है कि मध्य प्रदेश सरकार ने 2023-24 और 2024-25 के दौरान विज्ञापन और प्रचार मद में कुल 1,413.76 करोड़ रुपये खर्च किए। यह खर्च इन दोनों वर्षों में रोजाना औसतन करीब 1.93 करोड़ रुपये बैठता है। दोनों ही वर्षों में सरकार ने प्रचार पर जितना खर्च किया, वह बजट में पहले निर्धारित रकम से कहीं अधिक था।

रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जनसंपर्क विभाग को विज्ञापन और प्रचार के लिए 632.37 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। बाद के संशोधित अनुमान में इसे बढ़ाकर 727.93 करोड़ रुपये कर दिया गया। अगर यह राशि खर्च होती है तो तीन वर्षों में विज्ञापन और प्रचार पर कुल खर्च 2,141.69 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा, यानी औसतन करीब 1.95 करोड़ रुपये रोजाना।

खास बात ये है कि विज्ञापन और प्रचार पर खर्च करने वाला जनसंपर्क विभाग मुख्यमंत्री के ही अधीन है।बता दें कि साल 2023-24 मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव वाला साल था। उस समय राज्य में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार थी और मोहन यादव ने दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री पद संभाला था। इस साल विज्ञापन और प्रचार पर 817.58 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि बजट में इसके लिए 513.59 करोड़ रुपये का प्रावधान था। यानी सरकार ने तय बजट से करीब 304 करोड़ रुपये या लगभग 59 प्रतिशत ज्यादा खर्च किया।

वित्त वर्ष 2021-22 में जनसंपर्क विभाग का प्रचार समेत कुल खर्च  285.14 करोड़ रुपये जबकि 2022-23 में 479.17 करोड़ रुपये था। यानी 2023-24 में सिर्फ विज्ञापन और प्रचार पर हुआ खर्च पिछले दोनों वर्षों में पूरे जनसंपर्क विभाग के कुल खर्च से ज्यादा था। साफ है कि चुनाव के मौसम में सरकार का फोकस जन कल्याणकारी कार्यों की बजाए इमेज चमकाने पर था।

रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार ने सबसे ज्यादा पैसा प्रिंट मीडिया पर खर्च किया। प्रिंट मीडिया को 319.99 करोड़ रुपये जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 266.29 करोड़ रुपये दिए गए। दोनों पर कुल 586.28 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके अलावा विशेष अवसरों के प्रचार पर 190.06 करोड़ रुपये और कार्यक्रमों के आयोजन तथा प्रबंधन पर 103.99 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

वित्त वर्ष 2024-25 मोहन यादव सरकार के पहले पूर्ण बजट वाला साल था। इस साल विज्ञापन और प्रचार के लिए 518.11 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। बाद में जनसंपर्क विभाग का संशोधित कुल बजट 736.07 करोड़ रुपये हो गया। इस दौरान वास्तविक प्रचार खर्च 596.18 करोड़ रुपये रहा, जो निर्धारित बजट से करीब 78.07 करोड़ रुपये ज्यादा था।

वहीं, वित्त वर्ष 2025-26 में जनसंपर्क विभाग का कुल बजट 875.59 करोड़ रुपये था, जिसमें विज्ञापन और प्रचार के लिए 632.37 करोड़ रुपये रखे गए थे। मध्य वर्ष के संशोधन में प्रचार का अनुमान बढ़ाकर 727.93 करोड़ रुपये कर दिया गया, जबकि आश्चर्यजनक तरीके से पूरे विभाग का बजट घटाकर 797.80 करोड़ रुपये कर दिया गया। यानी पिछले वाले साल के वास्तविक प्रचार खर्च की तुलना में यह संशोधित अनुमान करीब 22 प्रतिशत अधिक है।

राज्य में विज्ञापन और प्रचार पर हुए खर्च राज्य के कुछ अन्य विभागों के बजट की तुलना में कहीं अधिक हैं। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को तीन वर्षों में कुल 468.34 करोड़ रुपये मिले है। जबकि विज्ञापन और प्रचार पर खर्च इससे कई गुना ज्यादा रहा। इसी तरह कुटीर एवं ग्रामीण उद्योग विभाग को तीन वर्षों में कुल 443.10 करोड़ रुपये मिले। विमुक्त, घुमंतू और अर्ध घुमंतू जनजाति कल्याण विभाग का तीन साल का कुल बजट 151.20 करोड़ रुपये रहा। जबकि
पर्यावरण संरक्षण की बात करने वाली सरकार ने इस विभाग को तीन वर्षों में कुल 100.15 करोड़ रुपये ही दिए।

रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ 2023-24 में प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों पर खर्च किए गए 319.99 करोड़ रुपये अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के उस पूरे साल के बजट के दोगुने से भी ज्यादा थे। इसी तरह, 2023-24 में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खर्च किए गए 266.29 करोड़ रुपये विमुक्त और घुमंतू जनजाति विभाग के तीन साल के पूरे बजट से ज्यादा थे।अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के बजट का तो एक बड़ा हिस्सा खर्च भी नहीं हुआ।

इसके उलट राज्य के आर्थिक सेहत की बात करें तो
चालू साल में मोहन सरकार ने अब तक रिकॉर्ड 19 बार उधारी ली है। चालू वित्त वर्ष में राज्य सरकार द्वारा लिया गया कुल कर्ज 17,400 करोड़ रुपए हो गया है, जबकि प्रदेश पर कुल देनदारी बढ़कर करीब 5.6114 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई है। हैरानी की बात ये है कि नीति आयोग और CAG द्वारा लगातार चेतावनी के बावजूद खर्चे की कटौती की बजाए सरकार इमेज चमकाने में पानी की तरह पैसे बहा रही है।