ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने शहर की पहाड़ियों पर बढ़ते अवैध कब्जों को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए सभी अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित करने का भी आदेश दिया है। जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह सिर्फ प्रशासनिक या कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि शहर के अस्तित्व और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर संकट है।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि समय रहते पहाड़ियों को नहीं बचाया गया तो वे पूरी तरह खत्म हो जाएंगी। जिसकी वजह से पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार, ग्वालियर शहर में करीब 15 प्रमुख पहाड़ियां थी लेकिन पिछले दो दशकों में अधिकांश का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। कई पहाड़ियों पर अवैध कब्जे हो चुके हैं। जबकि, कुछ को भू माफिया द्वारा काटकर समतल कर दिया गया है।

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महलगांव पहाड़ी को मूल रूप से हाउसिंग बोर्ड को आवासीय विकास के लिए दिया गया था लेकिन बाद में इसके निचले हिस्से में निजी कॉलोनियां विकसित कर दी गई। इसी तरह कैंसर पहाड़ी को कैंसर अस्पताल और शोध संस्थान के लिए लीज पर दिया गया था जहां औषधीय पौधों के विकास की योजना थी। हालांकि, वर्तमान में इस पहाड़ी के केवल एक हिस्से में अस्पताल है। जबकि, लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र पर अतिक्रमण हो चुका है।

मांढरे की माता क्षेत्र के आसपास अवैध रिहायशी बस्तियों को हटाने के लिए कई बार आदेश जारी किए गए हैं लेकिन राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक लापरवाही के चलते कार्रवाई प्रभावी नहीं हो सकी। वहीं, मोतीझील कृष्णानगर पहाड़ी पर भू माफियाओं द्वारा प्लॉट बेचने का मामला भी सामने आया है। वहां डेढ़ लाख से चार लाख रुपये तक में जमीन बेची गई। साल 2016 में यहां से 250 अतिक्रमण हटाए गए थे लेकिन बाद में दोबारा कब्जे हो गए।

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इसी तरह रहमत नगर पहाड़ी पर भी भू माफिया ने लॉटरी के जरिए 50 हजार से दो लाख रुपये तक में प्लॉट बेचे। यहां भी 2016 में 400 अतिक्रमण हटाए गए थे लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण फिर से अतिक्रमण बढ़ गया। शहर के बीच स्थित सत्यनारायण की टेकरी पर तीन से चार हजार अवैध कब्जे हैं। जिन्हें अदालत पहले ही अवैध घोषित कर चुकी है।

गोल पहाड़िया का हाल भी चिंताजनक है। यहां पिछले दो दशकों में बड़े पैमाने पर पहाड़ी को काटकर करीब पांच हजार मकान बना दिए गए हैं। इस अंधाधुंध निर्माण के कारण क्षेत्र में जल स्रोत लगभग समाप्त हो गए हैं। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है। अदालत के निर्देशों के अनुसार, गठित होने वाली कमेटी पूरे मामले की निगरानी करेगी और अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ पहाड़ियों के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएगी।

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