देश के ग्रामीण क्षेत्रों के घरों तक नल से जल पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना के तहत बड़ी संख्या में कनेक्शन तो दिए गए हैं लेकिन पानी की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। साल 2024 में किए गए सर्वे के मुताबिक, घरेलू नल कनेक्शन से लिए गए पानी के हर चार में से एक नमूने माइक्रोऑर्गेनिज्म संबंधी मानकों में विफल रहे। कुल 76 प्रतिशत नमूने लैब परीक्षण में पास हुए जबकि 24 प्रतिशत फेल हो गए। यह आंकड़े जल शक्ति मंत्रालय की राष्ट्रीय रिपोर्ट में सामने आए हैं।

चिंता की बात यह है कि तीन में से दो नहीं बल्कि चार में से तीन परिवार पानी पीने से पहले किसी तरह की ट्रीटमेंट नहीं करते। यानी करोड़ों ग्रामीण परिवार ऐसे पानी का सीधा सेवन कर रहे हैं जिसकी गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतर रहे। इसके बावजूद 92.4 प्रतिशत परिवारों ने अपने नल के पानी की गुणवत्ता पर संतोष जताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब पानी दिखने, स्वाद और गंध में सामान्य लगता है तो लोग उसे सुरक्षित मान लेते हैं। जबकि, कई बार उसमें माइक्रोऑर्गेनिज्म मौजूद होते हैं। नॉर्वे और कनाडा जैसे देशों के अध्ययनों में भी यही देखा गयै है और भारत के विभिन्न राज्यों में भी सालों से यह धारणा बनी हुई है।

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यह आकलन जुलाई से अक्टूबर 2024 के बीच 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 761 जिलों के चयनित गांवों में किया गया था। प्रत्येक गांव में 12 परिवारों का सर्वे हुआ और साथ ही सभी सार्वजनिक संस्थानों, स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य सुविधाओं से भी नमूने लिए गए थे। इनमें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओड़िसा, पुदुचेरी, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिल नाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, लद्दाख, और लक्षद्वीप शामिल हैं।

सार्वजनिक संस्थानों की स्थिति घरों से भी खराब पाई गई है। स्कूलों से लिए गए 73.3 प्रतिशत नमूने, आंगनवाड़ी केंद्रों से 72.5 प्रतिशत और स्वास्थ्य केंद्रों से 72.0 प्रतिशत नमूने ही माइक्रोऑर्गेनिज्म संबंधी मानकों पर खरे उतरे हैं। इसका मतलब है कि बच्चे, गर्भवती महिलाएं, नव माताएं और इलाज के लिए आने वाले लोग भी ऐसे पानी का सेवन कर रहे हैं जो पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। चूंकि इन संस्थान में अक्सर उसी गांव से जल आपूर्ति होती हैं जहां से घरों में जाता है। इसलिए गुणवत्ता संबंधी समस्याएं समान हैं।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि दूषित पेयजल और अपर्याप्त स्वच्छता का सीधा संबंध हैजा, डायरिया, पेचिश, हेपेटाइटिस-ए, टायफाइड और पोलियो जैसी बीमारियों से है। ऐसे में पानी की गुणवत्ता में कमी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि 28 जनवरी 2026 तक लगभग 15.8 करोड़ ग्रामीण परिवारों यानी 81.6 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल जल पहुंच चुकी है। 98 प्रतिशत परिवारों के पास कनेक्शन होने की जानकारी दी गई थी। इनमें से 87 प्रतिशत को कार्यरत बताया गया था। जबिक, 84 प्रतिशत से नियमित आपूर्ति मिलने और 80 प्रतिशत से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर से अधिक पानी मिलने की पुष्टि की गई थी। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि योजना का जोर बुनियादी ढांचे पर ज्यादा रहा है। जबकि, गांवों में टिकाऊ जल स्रोत विकसित करना उतना ही जरूरी है। यदि मुख्य स्रोत ही भरोसेमंद नहीं होगा तो योजना लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी।

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गांव स्तर पर संस्थागत व्यवस्थाओं में भी कमी सामने आई है। केवल 55 प्रतिशत गांवों में ही ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति या पानी समिति के होने की जानकारी मिली है। यही समितियां जल जीवन मिशन के तहत गांव की जलापूर्ति की योजना और प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाती हैं। संचालन और रखरखाव के लिए प्रशिक्षित कर्मी सिर्फ 58.1 प्रतिशत गांवों में उपलब्ध थे। यानी चार में से अधिक एक गांव में कुशल मानव संसाधन नहीं था। ऐसे में मरम्मत कार्य लंबित रहते हैं। कभी पानी समय पर नहीं आता और कभी बिल्कुल नहीं आता। जिससे ग्रामीणों को कुओं जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर होना पड़ता है।

वित्तीय स्थिरता भी चुनौती बनी हुई है। केवल 26.8 प्रतिशत गांवों में जल सेवा के लिए उपयोगकर्ता शुल्क वसूला जा रहा था। जल गुणवत्ता निगरानी ढांचे में भी बड़े अंतर दिखे। फील्ड टेस्ट किट केवल 27.2 प्रतिशत गांवों में उपलब्ध थीं। यानी 73 प्रतिशत गांवों में बुनियादी जांच उपकरण ही नहीं थे। लगभग 70.3 प्रतिशत गांवों में क्लोरीनीकरण की व्यवस्था थी लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि क्लोरीनीकरण मुख्यतः जैविक प्रदूषण को नियंत्रित करता है। पानी में रासायनिक तत्वों की सफाई अक्सर नहीं हो पाती है। इसलिए असल में फेल नमूनों की संख्या और अधिक हो सकती है। परीक्षण प्रक्रिया में स्वतंत्र तीसरी एजेंसी की भागीदारी की भी जरूरत बताई गई है ताकि निष्पक्ष जांच हो सके।

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ढांचागत खामियां भी बड़ी वजह बनकर सामने आई हैं। जिन परिवारों ने नल कनेक्शन के काम न करने की शिकायत की थी उनमें 32 प्रतिशत मामलों में पाइप नेटवर्क क्षतिग्रस्त था। जबकि, 30 प्रतिशत मामलों में पंप फेल होने की समस्या थी। कई ग्रामीण इलाकों में कनेक्शन होने के बावजूद अनियमित आपूर्ति के कारण लोगों को निजी जल स्रोतों पर खर्च करना पड़ रहा है। साल 2024 के एक अध्ययन में भी कहा गया था कि केवल नल कनेक्शन बना देना नियमित जल प्रवाह की गारंटी नहीं है। परियोजना में देरी, संचालन संबंधी खामियां, स्थानीय प्रणाली की सीमाएं, सामुदायिक भागीदारी और सामाजिक आर्थिक असमानताएं भी सेवा की स्थिरता को प्रभावित करती हैं।

जहां तक घरेलू स्तर पर उपचार का सवाल है केवल 13.2 प्रतिशत परिवार पानी उबालते हैं। जबकि, 11.2 प्रतिशत कपड़े से छानने का तरीका अपनाते हैं। अधिकांश परिवार बिना किसी प्रक्रिया के सीधे पानी पीते हैं। राज्यवार आंकड़े भी गंभीर असमानता दिखाते हैं। कुछ क्षेत्रों में स्थिति बेहतर है जहां 99 प्रतिशत तक नमूने पास हुए हैं। जबकि, कुछ राज्यों में केवल 31.1 प्रतिशत नमूने ही मानकों पर खरे उतर सके हैं। राष्ट्रीय औसत 76 प्रतिशत से नीचे रहने वाले बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, केरल और गुजरात शामिल हैं। यहां पास दर क्रमशः 66.4 प्रतिशत, 63.3 प्रतिशत, 56.4 प्रतिशत और 47.3 प्रतिशत रही। कई पहाड़ी और दूरदराज गांवों में उच्च कवरेज के दावों के बावजूद नल सूखे या अनियमित पाए गए और लोगों को झरनों जैसे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ा।

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