हम टीका ना लगवाई, वैक्सीन से डरकर ड्रम के पीछे छिपी दादी अम्मा, वीडियो वायरल

ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना वैक्सीन को लेकर इस कदर अफवाह फैली है कि वैक्सीन से बचने के लिए लोग कुछ भी कर रहे हैं, ऐसा ही एक मामला इटावा से आया जहां एक बुजुर्ग महिला डर से ड्रम के पीछे छिप गईं

Updated: Jun 03, 2021, 03:40 PM IST

हम टीका ना लगवाई, वैक्सीन से डरकर ड्रम के पीछे छिपी दादी अम्मा, वीडियो वायरल
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इटावा। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना वैक्सीन को लेकर इस कदर अफवाहें फैली है कि टीका लेने से बचने के लिए लोग कुछ भी कर रहे हैं। ऐसा ही एक मामला उत्तरप्रदेश के इटावा से आया है जहां टीका का नाम सुनते ही एक दादी अम्मा ड्रम के पीछे छिप गईं। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के लाख समझाने के बावजूद बुजुर्ग महिला ने आखिरकार टीका नहीं लिया, नतीजतन स्वास्थ्यकर्मियों को वापस लौटना पड़ा।

मामला इटावा के इकदिल इलाके का बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक वैक्सीन को लेकर लोगों में मन से डर खत्म करने के लिए प्रशासनिक टीमें गांवों में घूमकर लोगों को वैक्सीन के लिए प्रेरित कर रही है। इसी क्रम में जब प्रशासन और हेल्थ वर्कर्स की टीम बुजुर्ग महिला के घर के पास पहुंची तो वह भागकर घर में चली गईं। 

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स्वास्थ्यकर्मियों की नजर जब बुजुर्ग पर पड़ी तो उन्होंने आवाज देते हुए कहा कि "अम्मा टीका लगाने के लिए आए हैं, बाहर आओ"। इतना सुनते ही महिला को लगा कि अब बच पाना मुश्किल है और टीका वाले उसे जबरन टीका लगा जाएंगे। इससे बचने के लिए वह घर में रखे ड्रम के पीछे छिप गयीं। 

स्वास्थ्यकर्मी घर के अंदर जाकर महिला को बाहर लेकर आए और उसे काफी समझाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने कहा कि "हम टीका ना लगवाई" यानी मैं टीका नहीं लूंगी। कारण पूछने पर अम्मा ने कहा कि "बुखार आ जाई, हम मर जाई" यानी टीका लेने से बुखार आ जाएगा और मैं मर जाऊंगी। स्वास्थ्य कर्मियों को उम्मीद है कि दुबारा जब वे आएंगे तो अम्मा को समझा पाएंगे और वह टीका लेने के लिए तैयार हो जाएंगी।

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उत्तरप्रदेश में इस तरह का यह पहला मामला नहीं है। हाल ही में बाराबंकी में जब स्वास्थ्यकर्मियों की टीम टीका लगाने पहुंची तो डर के मारे दर्जनों लोग सरयू नदी में कूद गए। रायबरेली में तो एक जगह लाठी डंडे लेकर 50 की संख्या में लोग स्वास्थ्यकर्मियों पर टूट पड़े, जिसके बाद स्वास्थ्यकर्मियों को वहां से भागना पड़ा। यह अंधविश्वास और सरकार के प्रति अविश्वास का ही नतीजा है कि भारत में लोग टीके को जीवनरक्षक नहीं मौत का सामान समझ रहे हैं।