Bihar Election: कौन समझेगा पांडेय जी का दर्द, चुनाव के लिए पुलिस के मुखिया का पद छोड़ा, लेकिन न खुदा ही मिला न....

Ex DGP Gupteshwar Pandey: डीजीपी की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ नीतीश बाबू की पार्टी में आए , लेकिन उन्होंने पांडेय जी से ही पल्ला झाड़ लिया

Updated: Oct-08, 2020, 12:21 PM IST

Bihar Election: कौन समझेगा पांडेय जी का दर्द,  चुनाव के लिए पुलिस के मुखिया का पद छोड़ा, लेकिन न खुदा ही मिला न....
Photo Courtsey: India Today

पटना। क्या एक पूर्व डीजीपी का दर्द कोई समझ रहा है? क्या उनके समर्थक समझ पा रहे हैं? गुप्तेश्वर पांडेय, बिहार के पुलिस महानिदेशक की बड़ी कुर्सी ही नहीं, विधानसभा चुनाव में आने वाली एक बड़ी जिम्मेदारी से भी किराना करके सियासत के मैदान में पहुंचे थे। उधर कुर्सी छोड़ी, इधर पांचवे दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दरबार में जा पहुंचे थे। सीएम सााहब के घर पर सीधे उन्हीं के कर-कमलों से जेडीयू की सदस्यता भी ग्रहण कर ली। चर्चा पहले से थी कि बिहार पुलिस महकमे के बड़े साहब अब बक्सर से चुनाव लड़ेंगे। विधायक जी बनेंगे। मंत्री जी भी बन सकते हैं। लेकिन सीटों के बंटवारे के चक्कर में सारे सपने रह गए। बक्सर की सीट बीजेपी के खाते में चली गई।

फिर भी उम्मीद बरकरार थी कि सीएम साहब इतनी बड़ी सरकारी कुर्सी छोड़ने वाले को यूं थोड़े ही न छोड़ेंगे। कहीं न कहीं तो मामला सेट हो ही जाएगा। लेकिन जेडीयू उम्मीदवारों की लिस्ट आते ही सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। नीतीश बाबू ने गुप्तेश्वर बाबा का मान नहीं रखा। पूरे बिहार में एक भी विधानसभा सीट ऐसी नहीं मिली, जहां से वो अपने इस पुराने मुरीद मुलाजिम को उम्मीदवार बनाते। जिस तरह पांडेय जी ने बिहार पुलिस के मुखिया के तौर पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा था, वैसे ही नीतीश बाबू ने पांडेय जी से पल्ला झाड़ लिया।

लेकिन पांडेय जी मज़बूत कलेजे वाले हैं। ऐसे निराश थोड़े ही न होते हैं। मगर अपने दोस्तों-मित्रों, चाहनेवालों का क्या करें? बिहार की तमाम जनता का क्या करें, जो उन्हें टिकट नहीं मिलने से निराश है। और कुछ भले न कर पाएं, उन्हें दिलासा तो दे ही सकते ही हैं। तो वही कर रहे हैं। सबको निराश न होने का संदेश दे रहे हैं। तो पांडेय जी ने फेसबुक पर फरमाया है, 

"अपने अनेक शुभचिंतकों के फ़ोन से परेशान हूँ। मैं उनकी चिंता और परेशानी भी समझता हूँ। मेरे सेवामुक्त होने के बाद सबको उम्मीद थी कि मैं चुनाव लड़ूँगा लेकिन मैं इस बार विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रहा। हताश निराश होने की कोई बात नहीं है। धीरज रखें। मेरा  जीवन संघर्ष में ही बीता है। मैं जीवन भर जनता की सेवा में रहूँगा। कृपया धीरज रखें और मुझे फ़ोन नहीं करे। बिहार की जनता को मेरा जीवन समर्पित है। अपनी जन्मभूमि बक्सर की धरती और वहाँ के सभी जाति मज़हब के सभी बड़े-छोटे भाई-बहनों माताओं और नौजवानों को मेरा पैर छू कर प्रणाम! अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए रखें !"

पता नहीं आपको याद है या नहीं, तो चलिए याद दिला देते हैं कि ये वही गुप्तेश्वर पांडेय जी हैं, जिन्होंने बिहार के डीजीपी रहते हुए सीएम नीतीश बाबू की तरफ से धुआंधार बल्लेबाजी की थी। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के केस में शिवसेना नेता संजय राउत और अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती की खूब खबर ली थी। क्या पता, इस दौरान उन्हें खबरों में जिस तरह जगह मिली, उसी के बाद पुलिसिया नौकरी छोड़ सियासत के मैदान में चौके-छक्के लगाने का इरादा और मज़बूत हो गया हो। खैर, आपको ये भी याद दिला दें कि गुप्तेश्वर पांडेय साहब सियासत के मैदान में अपना सिक्का जमाने की कोशिश पहले भी कर चुके हैं। दरअसल ऐसी एक कोशिश उन्होंने 11 साल पहले 2009 में की थी। तब उन्होंने आईजी रहते हुए वीआरएस लिया था और बक्सर से बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन उस बार भी उन्हें टिकट नहीं मिल पाया था। फिर क्या करते, मन मारकर दोबारा पुलिस की नौकरी ज्वाइन कर ली थी।

तब क्या किसी को अंदाज़ा रहा होगा कि 11 साल बाद वही इतिहास एक बार फिर से खुद को दोहराएगा? और इस बार तो दोबारा पुलिस की नौकरी में जाने का विकल्प भी शायद ही खुला हो, क्योंकि वैसे भी वे अगले साल फरवरी में रिटायर होने ही वाले थे। खैर कोई बात नहीं, अच्छा तो यही है कि पांडेय जी निराश नहीं हैं। ये नहीं और सही...और नहीं, और सही...नर हो न निराश करो मन को!