नैतिकता विरोधी पोस्ट पर बर्खास्त हुए, अब युवाओं को पत्रकार बनना सिखाएंगे

महात्मा गांधी को भारत का नहीं पाकिस्तान का राष्ट्रपिता बताने वाले अनिल कुमार सौमित्र IIMC के नए प्रोफेसर नियुक्त, एमपी में बीजेपी मीडिया सेल के प्रमुख रहते विवादित पोस्ट लिखी तो पार्टी ने बर्खास्त कर दिया था

Updated: Oct 31, 2020, 10:01 AM IST

नैतिकता विरोधी पोस्ट पर बर्खास्त हुए, अब युवाओं को पत्रकार बनना सिखाएंगे
Photo Courtesy: Wed Dunia

नई दिल्ली। भारतीय जन संचार संस्थान में एक नए प्रोफेसर बनाए गए हैं। नाम है अनिल कुमार सौमित्र। बड़े योग्य हैं। एक साल पहले भारतीय जनता पार्टी ने नैतिकता और सिद्धांतों के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने पर बर्खास्त कर दिया था। यानी पार्टी के हिसाब से अनैतिक और सिद्धांतहीन थे, लेकिन युवा छात्रों के गुरु बनने के लिए बिलकुल फिट हैं। महात्मा गांधी को भारत का नहीं, पाकिस्तान का राष्ट्रपिता बताकर शोहरत हासिल की थी। ज़ाहिर है उनका इतिहास बोध भी शानदार है। देश के नवोदित पत्रकारों को ठीक से सिखाने-पढ़ाने के लिए इससे ज़्यादा और क्या योग्यता चाहिए। इससे अलावा जो होगी, वो तो बोनस ही है।

आपको शायद याद हो, अनिल कुमार सौमित्र पिछले साल अचानक चर्चा में आए थे। उस वक्त वे मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की मीडिया सेल के प्रमुख थे। मई 2019 में उन्होंने अपने एक फेसबुक पोस्ट में इतिहास का अद्भुत ज्ञान प्रदर्शित किया। महात्मा गांधी के बारे में यह लिखा कि “वे राष्ट्रपिता तो थे, पर पाकिस्तान के। देश के पास उनके जैसे करोड़ों बेटे थे, कुछ काबिल, कुछ नालायक।” उनके इस पोस्ट पर हंगामा मचा तो बीजेपी ने उनसे पार्टी की जिम्मेदारियां ही नहीं, प्राथमिक सदस्यता तक छीन लीं। ये कहते हुए कि उनकी पोस्ट पार्टी के सिद्धांतों, विचारों और नैतिकता के खिलाफ है।

वैसे अनिल सौमित्र के लिए ये कोई नई बात नहीं थी। इससे पहले 2013 में भी बीजेपी ने उनके खिलाफ कार्रवाई की थी। तब वे बीजेपी की पत्रिका चरैवेति के संपादक थे। तब पत्रिका में चर्च के खिलाफ लिखे एक लेख पर विवाद हो गया था, जिसके कारण उन्हें हटा दिया गया था।

अपने साथ हुए इस बर्ताव से उस वक्त अनिल सौमित्र काफी नाराज़ हुए थे। उन्होंने इंदौर की तत्कालीन सांसद सुमित्रा महाजन से लेकर आरएसएस चीफ मोहन भागवत तक को एक शिकायती चिट्ठी लिख मारी थी। जिसमें उन्होंने कहा था, “मेरे साथ अपराधियों जैसा बर्ताव हो रहा है। मैं संघ की पृष्ठभूमि और वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण संपादक चुना गया था।” अनिल सौमित्र ने यह चिट्ठी आरएसएस चीफ के अलावा सुरेश जोशी, सुरेश सोनी जैसे संघ के वरिष्ठ नेताओं से लेकर लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह चौहान जैसे बीजेपी के दिग्गजों को भी भेजी थी। हो सकता है इसी के बाद उनके साथ इंसाफ हुआ हो, जिसके चलते वे कालांतर में मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की मीडिया सेल के प्रमुख भी बनाए गए। लेकिन पिछले साल महात्मा गांधी के बारे में अपनी बेमिसाल वैचारिक प्रतिबद्धता से उपजे अद्भुत विचार फेसबुक पर व्यक्त करके वे एक बार फिर से संकट में फंस गए।

बहरहाल, ये जानकारी कहीं मिली नहीं कि मई 2019 में पार्टी से निकाले जाने के बाद भी उन्होंने चीफ के पास या कहीं और, इंसाफ की वैसी ही गुहार लगाई थी या नहीं, जैसी 2013 में संपादक का पद छिनने के बाद लगाई थी। लेकिन कुछ भी हो, अंत भला तो सब भला। साल-सवा साल बाद ही सही, उन्हें इंसाफ तो मिला। और अब वे अपने अद्भुत इतिहास बोध, नैतिक पृष्ठभूमि और वैचारिक प्रतिबद्धता का इस्तेमाल देश में पत्रकारों की वैसी ही नई पीढ़ी तैयार करने में कर सकेंगे, जैसी कि उनसे अपेक्षा की जाती होगी।

द इंडियन एक्सप्रेस का कहना है कि इस नियुक्ति पर अनिल सौमित्र की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनसे संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने किसी फोन कॉल या मैसेज का जवाब नहीं दिया। भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक संजय द्विवेदी ने भी इस नियुक्ति पर बोलने से इनकार कर दिया। अब अखबार वाले भी न कई बार हद कर देते हैं। इस मामले में भला बोलने को बचा ही क्या है, जो अपना और उनका वक्त खराब करते सौमित्र जी या द्विवेदी जी। सब कुछ तो साफ है। यही तो इंसाफ है।