दाम नहीं रत्नागिरी के आमों की मांग गिरी

आम के दाम बहुत कम नहीं हुए हैं पर आम की सप्लाई में आ रही परेशानियों के कारण व्यापार प्रभावित हुआ है।

Publish: Apr-23, 2020, 09:56 PM IST

दाम नहीं रत्नागिरी के आमों की मांग गिरी

महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र में स्थित रत्नागिरी जिले की अर्थव्यवस्था में वहां के रसीले अल्फांसो आमों का अहम योगदान होता है. साल के इस वक्त तक इन आमों की मांग आना शुरू हो जाती है. रत्नागिरी में दिसंबर में हुई बारिश पहले ही 40 फीसदी उपज को प्रभावित कर चुकी है, ऐसे में लॉकडाउन के चलते यहां किसानों को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है.

द इंडियन एक्सप्रेस को 30 साल से आम का व्यापार करने वाले देवदत्ता पाटिल ने बताया कि इस वक्त तक आमों की मांग आने लगती थी. लॉकडाउन में बरती गई नरमी से उन्हें राहत मिली है. 

लॉकडाउन में बरती गई नरमी के बाद वो इस सीजन की आमों की पहली खेप मुंबई भेज रहे हैं.  देवदत्ता ने कहा कि अमूमन हम 2500 बॉक्स तक का व्यापार करते हैं. पर इस साल हमें आशंका है कि सालाना होने वाली बिक्री के करीब भी हम नहीं पहुंच पाएंगे. आम के उत्पादकों और विक्रेताओं की सहकारी संस्था के अध्यक्ष विवेक भिड़े के अनुमान के मुताबिक कोंकण प्रांत के तीन जिलों में सालाना 3.5 लाख मीट्रिक टन आम का उत्पादन होता है. ए ग्रेड क्वालिटी के करीबन तीस से चालीस हजार मीट्रिक टन आम का निर्यात भी कोंकण प्रांत से होता है. हालांकि कोरोना के कारण इस बार बाहर देशों से होने वाली मांग में कमी आई है.

हाल ही में आम के किसानों ने सरकार से मांग की कि उन्हें मुंबई, थाने और पुणे जैसे अधिक मांग वाले बाजारों में खुदरा बिक्री की सुविधा मुहैया कराई जाए. प्रति पेटी (चार से सात दर्जन आम) अल्फांसो का दाम 800 से 2000 रुपये है. भिडे़ ने कहा कि आम के दाम बहुत कम नहीं हुए हैं पर आम की सप्लाई में आ रही परेशानियों के कारण व्यापार प्रभावित हुआ है. अमर देसाई ने कहा कि कम सेल्फ लाइफ वाले आम की बिक्री ही प्रभावित नहीं हुई है बल्कि इसके पल्प आदि से बनने वाले अन्य उत्पादन भी प्रभावित हुए हैं. हम किसानों को शहरी इलाकों में रहने वाले ग्राहकों से सीधे लिंक बनाने का मौका दे रहे हैं. साथ ही सतारा, सांगली, कोल्हापुर जैसे जिलों में गांड़ियां भेज रहे हैं ताकि किसान वहां अपने आमों की बिक्री कर सकें.

कुछ थोक विक्रेता फूड होम डिलीवरी एप जोमेटो के साथ मिलकर आमों की डिलीवरी कर रहे हैं. बीते हफ्ते कोंकण भूमि प्रतिष्ठान नामक एनजीओ ने राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने वाले किसानों के साथ शहरी ग्राहकों तक पहुंचने का प्रयास किया. एनजीओ के संस्थापक संजय यादवराव ने कहा, अल्फांसो का व्यापार इस बार घटकर एक हजार करोड़ का रह जाएगा. जबकि बीते साल ये तीन हजार करोड़ रुपये का था. हालांकि सोशल मीडिया के काफी सहायता मिल रही है. अब मांग इतनी अधिक है कि हम इसे पूरा करने की कोशिश में जुटे हैं.