दफ्तर दरबारी: मंत्री मोहन यादव के एडीएम पर भड़कने का राज क्‍या

मध्य प्रदेश में अंतत: पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव सम्‍पन्‍न हो गए। जहां विपक्ष ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने बीजेपी की कठपुतली बन कर काम किया है। वहीं उज्‍जैन में उच्‍च शिक्षा मंत्री मोहन यादव पहले एडीएम कुपित हुए, फिर प्रफुल्लित। इस नाराजगी व खुशी का राज भी दिलचस्‍प है।  

Updated: Jul 31, 2022, 02:12 PM IST

दफ्तर दरबारी: मंत्री मोहन यादव के एडीएम पर भड़कने का राज क्‍या
समर्थकों के साथ उच्‍च शिक्षा मंत्री मोहन यादव

मध्य प्रदेश में लंबे समय बाद हुए त्रिस्‍तरीय पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव में जमकर राजनीति हुई। अपनी ग्राम व नगर सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ सहित तमाम हथकंडों का उपयोग हुआ। विपक्ष कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने बीजेपी सरकार की कठपुतली बन कर काम किया है। कई जगह के परिणाम इसी पक्षधरता के कारण प्रभावित हुए। 

पूर्व मुख्यमंत्री व राज्‍यसभा सांसद दिग्विजय सिंह और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने कहा कि कांग्रेस सदस्यों को पुलिस द्वारा बंधक बनाए जाना, सदस्यों को वोट रद्द करना, गैरकानूनी तरीके से टेंडर वोटिंग करना और झूठी पर्ची निकालने सहित हर हथकंडा अपना कर बीजेपी ने चुनाव जीता। मध्य प्रदेश जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी पर बेईमानी और सत्ता के दुरुपयोग से पंचायत अध्यक्ष चुनाव जीतने का आरोप लगाया है। भोपाल सहित अन्‍य जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बीजेपी ने पुलिस प्रशासन, पैसा और बेईमानी का जिस कदर इस्तेमाल किया गया, वह मध्यप्रदेश के लोकतांत्रिक इतिहास के लिए कलंक है। 

विपक्ष के आरोप तो है ही अचरज तो तब हुआ जब एक मंत्री ने पहले तो एडीएम को खरी खोटी सुनाई फिर आग लगाने की धमकी भी दे दी।  उज्जैन में जनपद अध्यक्ष पद पर कांग्रेस का कब्जा होने के बाद गुस्साए भाजपाइयों ने जनपद में घुसकर तोड़फोड़ की। उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव ने एडीएम को खरी-खोटी सुनाते हुए आग लग जाने तक की धमकी दे डाली। भाजपा के उम्मीदवार की हार की सूचना मिलते ही उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव समर्थकों के साथ जनपद पंचायत पहुंचे। मंत्री मोहन यादव ने कहा कि निर्वाचन में भारी चूक हुई है। भाजपा के पास 13 वोटर होने के बाद भी हार गई, उन्हें वोट नहीं डालने दिया गया। जंगल राज जैसा काम कर रहे हैं।

बाद में जब जिला पंचायत अध्‍यक्ष बीजेपी का चुना गया तो मोहन यादव के सुर बदल गए। उन्‍होंने कार्यकर्ताओं के साथ प्रफुल्लित भाव से नारेबाजी करते हुए कांग्रेस मुर्दाबाद के नारे भी लगाए। जहां एक तरफ सभी मंत्री किसी तरह बीजेपी की जीत सुनिश्चित करने में जुटे थे वहीं, मोहन यादव का सड़क पर आम कार्यकर्ता की तरह बर्ताव करना क्‍या संदेश देता है? वे अपने ही जिले के अधिकारियों से धमकी भरे अंदाज में बात करने को मजबूर क्‍यों हुए? उनकी की पार्टी के नेताओं ने माना कि एडीएम के साथ मंत्री का व्‍यवहार अनुचित था।  

असल में, पार्टी ने अपने मंत्रियों व विधायकों को निकाय चुनाव में जीत का टारगेट दिया था। अपने ही जिले में जनपद पद हारने के बाद अपनी रैंकिंग गिरती देख मोहन यादव आपा खो बैठे। फिर जब जिला पंचायत अध्‍यक्ष बीजेपी का बन गया तो वे खुश हो कर झूम उठे। इन दोनों ही स्थितियों में उन्‍होंने सतही व्‍यवहार किया।  अब संगठन ऐसा नेताओं को लेकर पसोपेश में हैं जिनके क्षेत्र में कुछ पद जीते हैं और कुछ पद हारे हैं। 50 पर्सेंट टारगेट पूरा करने वाले नेताओं को चिंता है कि अब उनकी रैंकिंग क्‍या होगी, क्‍योंकि इसी आधार पर अगले मंत्रिमंडल का गठन निर्भर करेगा। 

अब ऊपर से नीचे तक बदले जाएंगे अफसर

चुनाव के दौरान नेताओं की प्रतिष्‍ठा ही दांव पर नहीं लगी थी देखा गया अफसर क्‍या कर रहे हैं। बीजेपी संगठन को बड़ी संख्‍या में मैदान से अफसरों के बारे में शिकायतें मिली हैं। कार्यकर्ताओं का मानना है कि कुछ प्रशासनिक निर्णयों के कारण बीजेपी की हार हुई है। 

इस फीडबैक और मिशन 23 के हिसाब से प्रशासनिक जमावट के लिहाज से प्रदेश में बड़े पैमाने पर तबादले होना तय है। माना जा रहा है कि कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक सहित जिलों के प्रमुख अधिकारियों को स्थानांतरित किया जाएगा। प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले तो सरकार किसी भी समय कर सकती है मगर निचले स्‍तर के अधिकारियों के व्‍यापक ट्रांसफर के लिए सरकार तबादलों पर से बैन हटाने की तैयारी कर रही है। नई तबादला नीति का प्रारूप तैयार कर मुख्‍यमंत्री सचिवालय भेजा जा चुका है। 

नेताओं की मांग को देखते हुए कई तबादले होने हैं और आमतौर पर जुलाई के पहले तबादलों से बैन हटाने वाली सरकार अब बीच वर्ष में ही तबादलों पर लगा प्रतिबंध हटाने की तैयारी कर चुकी है। खबर है कि सामान्य प्रशासन विभाग ने एक माह के लिए प्रतिबंध हटाने का प्रस्ताव तैयार किया है। यह प्रस्‍ताव निकाय चुनाव का कारण अटका था, अब जल्‍द इस पर विचार होगा। 

क्‍या चुनाव आयुक्‍त के नंबर बढ़ गए 

मंत्रियों और बीजेपी विधायकों को ही टारगेट पूरा नहीं करना था, विपक्ष अफसरों पर भी आरोप लगा रहा है कि उन्‍होंने पार्टी विशेष के लिए काम किया। अफसर जो मैदानी पोस्टिंग संभाल रहे हैं और वे भी जो चुनाव आयोग में पदस्‍थ हैं। 

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि तमाम तरह की धांधलियां हुईं और चुनाव आयोग मूक दर्शक बना रहा वहीं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा कि चुनाव के हर चरण में बेईमानी, मतों की लूट, गिनती में धांधली, परिणामों की अदला बदली, जन प्रतिनिधियों के अपहरण और उनकी सरेआम खरीद फरोख्त हुई है। मध्य प्रदेश के राज्य निर्वाचन आयुक्‍त अकर्मण्य और सत्ता पार्टी की कठपुतली बने रहे। सीपीएम ने राज्य निर्वाचन आयुक्त पद रिटायर्ड आईएएस बसंत प्रताप सिंह को बर्खास्त करने की मांग कर डाली। 

आयुक्‍त बीपी सिंह अभी विपक्ष के निशाने पर हैं तो चुनाव के पहले चरण में वे बीजेपी के आक्रोश का सामना कर चुके हैं। पहले चरण में कम मतदान का ठिकरा चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली पर फोड़ा गया था क्‍योंकि कई मतदाताओं के नाम वोटर लिस्‍ट में थे ही नहीं। कम मतदान के कारण हार के आकलन से डरे बीजेपी नेता तुरंत चुनाव आयुक्‍त बीपी सिंह से मिले थे। 

तब बीजेपी प्रतिनिधि मंडल के ज्ञापन की भाषा पर सवाल उठे थे कि बीजेपी नेता चुनाव आयुक्‍त को निर्देश क्‍यों दे रहे हैं कि वे अगले चरण में क्‍या करें और क्‍या नहीं। अब जबकि विपक्ष हमलावर है तो क्‍या बीजेपी नेता बीपी सिंह के कार्य से संतुष्‍ट हैं? विपक्ष की अफसरों से नाराजगी का मतलब सत्‍ता पक्ष का संतोष्‍ज्ञ माना जाता है। तो क्‍या चुनाव आयुक्‍त बीपी सिंह के नंबर बढ़ गए हैं? अगर नंबर बढ़ें है तो उनके पुनर्वास की अवधि भी बढ़ना तय है अन्‍यथा ठकुराई वाली अफसरी के दिन जाने वाले हैं। 

... तो यह थी आईएएस नेहा मारव्‍या की प्रताड़ना की वजह 

जिस तेजी से युवा आईएएस नेहा मारव्‍या को मुख्‍यमंत्री के प्रमुख सचिव मनीष रस्‍तोगी द्वारा प्रताडि़त करने की पोस्‍ट वायरल हुई थी उतनी ही तेजी से इस प्रताड़ना का कथित कारण भी वायरल हुआ है। बताया गया कि प्रशासनिक मुखिया को आईएएस नेहा मारव्‍या का एक एक्‍ट रास नहीं आया और उसकी सजा के तौर पर उन्‍हें यह प्रताड़ना मिली। 

आपको याद होगा हमने बताया था कि युवा आईएएस नेहा मारव्‍या की एक पोस्‍ट वायरल होने से प्रशासनिक जगत में हलचल हो गई थी। नेहा ने महिला आईएएस के व्‍हाटस एप ग्रुप में लिखा था कि मुख्‍यमंत्री के प्रमुख सचिव मनीष रस्‍तोगी ने उन्‍हें बुरी तरह बेइज्‍जत किया है। काम तो छिना ही गया गाड़ी भी ले ली गई। 

सभी जानने को उत्‍सुक थे कि ऐसा क्‍या कारण था कि आचार संहिता के दौरान इमरजेंसी कर तरह नेहा मारव्‍या को मप्र राज्य रोजगार गारंटी परिषद की एडिशनल सीईओ पद से हटा कर उप सचिव राजस्व बनाया गया था। 2011 बैच की आईएएस नेहा मारव्या की प्रताड़ना का कारण अब उजागर होने लगा है। खुलासा हो रहा है कि नेहा मारव्‍या के तबादले की वजह बने थे वन विभाग के पीसीसीएफ पद से रिटायर हुए ललित बेलवाल। 

माना जा रहा है कि नेहा मारव्या ने बेलवाल के खिलाफ भर्ती में फर्जीवाड़ा करने की शिकायत को न सिर्फ सही पाया था बल्कि उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की अनुशंसा कर दी थी। आनन-फानन में नेहा का तबादला कर दिया गया।

जब बेनवाल के उच्‍च संपर्कों की पड़ताल की गई तो तार मुख्‍य सचिव तक पहुंच गए। बताया जाता है कि अपने उच्‍च संपर्क के कारण ही रिटायर्ड वन अधिकारी ललित बेलवाल अन्‍य विभाग में लंबे समय से पद हासिल किए हुए हैं। जब समर्थ की कृपा हो तो नेहा मारव्‍या जैसे युवा आईएएस को प्रताड़ना तो झेलनी ही होगी। अब देखना होगा कि प्रताड़ना की वजह सामने आने के बाद नेहा को कोई राहत मिलती है या नहीं? और जांच कर जो अनुशंसा की गई थी रिटायर्ड वन अधिकारी ललित बेलवाल उस दायरे में आएंगे या नहीं?