PEB धांधली मामले में शिवराज सरकार की बढ़ी मुश्किलें, कोर्ट ने दो महीने के भीतर मांगी जांच रिपोर्ट

कृषि विकास अधिकारी के पद के लिए सरकार ने निकाली थी 863 पदों पर भर्ती, एक ही कॉलेज, एक ही जाति और एक ही क्षेत्र के छात्र बने थे टॉपर, बवाल बढ़ने पर सरकार ने रद्द कर दी थी परीक्षा

Updated: Sep 07, 2021, 08:28 PM IST

PEB धांधली मामले में शिवराज सरकार की बढ़ी मुश्किलें, कोर्ट ने दो महीने के भीतर मांगी जांच रिपोर्ट
Photo Courtesy : OneIndia

भोपाल। PEB धांधली मामले में मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं। ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस हाईप्रोफाइल घोटाला मामले में राज्य सरकार को जांच रिपोर्ट पेश करने की अंतिम तिथि तय कर दी है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार दो महीने के भीतर यानी 5 नवंबर तक पूरे मामले की जांच रिपोर्ट पेश करे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि इस धांधली में बड़े-बड़े लोगों की संलिप्तता उजागर होगी।

दरअसल, इसी साल 10 और 11 फरवरी को मध्य प्रदेश सरकार के कृषि विभाग ने 'ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी' और 'वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी' के कुल 863 पदों पर भर्ती के लिए परीक्षा हुई थी। परीक्षा लेने की जिम्मेदारी प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड (PEB) को मिली थी।

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PEB को कुछ साल पहले तक व्यापम के नाम से जाना जाता था। देश के सबसे चर्चित घोटाले का सूत्रधार होने के कारण इस बोर्ड का नाम तो बदल दिया गया लेकिन काम में बदलाव हुआ या नहीं इस बात को लेकर संशय जारी है। दरअसल, यह संशय 17 फरवरी को तब उपजा जब बोर्ड द्वारा उत्तर-पुस्तिका और टॉपर्स की सूची जारी की गई। इस परीक्षा में 23 हजार से ज्यादा उम्मीदवार शामिल हुए थे लेकिन टॉपर्स एक ही कॉलेज, एक ही क्षेत्र और एकाध को छोड़कर एक ही सरनेम यानी जाति के उम्मीदवार थे।

इतना ही नहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों का तो ये भी कहना है कि ये सभी टॉपर्स एक साथ घूमने, एक साथ रहने वाले भी थे। टॉपर्स की सूची सामने आने के बाद छात्रों ने बवाल शुरू कर दिया। छात्र सुनील उपाध्याय के मुताबिक टॉप 10 के जो छात्र हैं उनकी 4 साल में डिग्री पूरी नहीं हो पाई है। सभी को डिग्री पूरी करने में 6 से 10 साल लगे। यानी वे बार-बार फेल होते रहे। लेकिन बात जब नौकरी के लिए प्रतियोगिता की आई तो टॉप कर गए। सिर्फ टॉप ही नहीं किए 200 में 195 और 194 नंबर लेकर इतिहास रच दिया। 

हालांकि, बोर्ड ने इस पूरे प्रकरण को संयोग बताकर मामला खत्म करने की कोशिश की। कृषि मंत्री कमल पटेल ने भी इसे संयोग करार दिया। जबतक इस बात पर चर्चा चल ही रही थी कि इसे संयोग माना जाए या यह एक बड़े धांधली का हिस्सा, छात्रों के हाथ एक और अहम जानकारी लग गयी। छात्रों का दावा है कि सभी टॉपर्स ने तीन बेसिक सवालों के उत्तर गलत दिए। ये उत्तर बोर्ड द्वारा जारी आंसर शीट में भी गलत चयन किए गए हैं। ऐसे में छात्रों का कहना है कि जब इतने बुद्धिमान लोग थे तो बेसिक सवालों का उत्तर सही क्यों नहीं दे सके। या उन्हें ये कैसे पता चला कि बोर्ड इन सवालों का गलत आंसर शीट जारी करेगा।

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छात्रों का कहना है कि एक बार यह माना जा सकता है कि त्रुटि वश बोर्ड द्वारा गलत आंसर जारी हो गया है, लेकिन इतिहास रचने वाले ये सभी विद्वान भी वही त्रुटि करेंगे जो बोर्ड ने की? ऐसे में आरोप है कि सभी टॉपर्स को एग्जाम से पहले पीईबी के आंसर दिए गए और उन्होंने उसी आधार पर परीक्षा दी। छात्रों ने इसे व्यापम पार्ट-2 करार देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सीबीआई जांच की मांग की है। 

बहरहाल, मामले पर बवाल बढ़ता देख मध्य प्रदेश सरकार ने भी परीक्षा को रद्द करने का आदेश जारी कर दिया है। 6 सितंबर सोमवार को इस मामले पर हुई सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट से कहा कि संदेह के आधार पर परीक्षा को रद्द करने का निर्णय लिया गया है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सिर्फ परीक्षा रद्द करने से काम नहीं चलेगा बल्कि मामले की जांच होगी। कोर्ट ने जांच सीबीआई को तो नहीं सौंपा है परंतु राज्य सरकार को ही दो महीने के भीतर जांच कर रिपोर्ट पेश करने का आदेश जारी किया गया है।