शराब कांड: शासन प्रशासन से पुनर्जन्म की अपेक्षा

मंटो की एक छोटी सी कहानी पेशबंदी इंतज़ाम में वे लिखते हैं, पहली वारदात नाके के होटल के पास हुई। फौरन ही वहां एक सिपाही का पहरा लगा दिया गया। दूसरी वारदात दूसरे ही रोज़ शाम को स्टोर के सामने हुई। सिपाही को पहली जगह से हटाकर उस जगह तैनात कर दिया गया जहां दूसरी वारदात हुई थी। तीसरी घटना रात के बारह बजे लांड्री के पास घटी। जब इंस्पेक्टर ने सिपाही को नई जगह पर पहरा देने का हुक्म दिया तो सिपाही कुछ देर तक सोचने के बाद बोला, मुझे वहां खड़ा कर दीजिए, जहां नई वारदात होने वाली है। मंटो ने करीब 80 बरस पहले यह लघुकथा लिखी होगी। हमें आजाद हुए 75 बरस होने को आए, परंतु सिपाही आज भी इंस्पेक्टर से यही कहता आ रहा है

Updated: Aug 07, 2021, 07:59 PM IST

शराब कांड: शासन प्रशासन से पुनर्जन्म की अपेक्षा
Photo courtesy: The Indian Express

मध्यप्रदेश में नवीनतम शराब कांड, नवीनतम इसलिए क्योंकि यहां तकरीबन हर माह किसी न किसी अंचल, मालवा, निमाड़, बुंदेलखंड, बघेलखंड, चंबल और महाकौशल में कहीं न कहीं नकली शराब से संबंधित वारदातें होती ही रहतीं है। इसके अलावा अवैध रेत खनन, महिलाओं के साथ बलात्कार और बदसलूकी, दलितों व आदिवासियों पर अत्याचार और उनके खिलाफ अपराध की वारदातें और घटनाएं भी होती ही रहतीं हैं। एक घटना होती है, चाय के प्याले में उबाल आता है और ठंडा हो जाता है। ऐसा सुबह होता है और शासन शाम की चाय पीने की तैयारी शुरु कर देता है। दूध में एकाएक आए उबाल को समाप्त करने के लिए किसी परिश्रम या जोखिम भरे कदम को उठाने की जरुरत नहीं पड़ती, सिर्फ पानी की कुछ बूंदे उस अनियंत्रित से दिखने वाले तूफान को तुरंत शांत कर देती हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही अपराधों को लेकर सामने आए सार्वजनिक उबाल को लेकर भी होता है, सरकार (तकरीबन सभी राज्यों की) इसे ठंडा करने के लिए एक तरह के उपाय, यानी उक्त अपराध के लिए “फासी की सजा” के प्रावधान की घोषणा कर देती है और कालांतर में से इसे कानूनी जामा भी पहना देती है। मगर ..........

शराब कांड के घटनाक्रम को देखते, सुनते पढ़ते मंटो की एक छोटी सी कहानी ‘पेशबंदी/इंतजाम’ याद आ गई। वे लिखते हैं, ‘‘पहली वारदात नाके के होटल के पास हुई। फौरन ही वहां एक सिपाही का पहरा लगा दिया गया। दूसरी वारदात दूसरे ही रोज़ शाम को स्टोर के सामने हुई। सिपाही को पहली जगह से हटाकर उस जगह तैनात कर दिया गया जहां दूसरी वारदात हुई थी। तीसरी घटना रात के बारह बजे लांड्री के पास घटी। जब इंस्पेक्टर ने सिपाही को नई जगह पर पहरा देने का हुक्म दिया तो सिपाही कुछ देर तक सोचने के बाद बोला, ‘‘मुझे वहां खड़ा कर दीजिए, जहां नई वारदात होने वाली है।’’ मंटो यदि आज होते तो करीब 110 साल के हो गए होते। उन्होंने करीब 80 बरस पहले यह लघुकथा लिखी होगी। हमें आजाद हुए 75 बरस होने को आए, परंतु सिपाही आज भी इंस्पेक्टर से यही कहता आ रहा है। शराब से हुई मौतों की ही बात करें पिछले ही महीनों में चंबल में काफी सारे लोग जहरीली शराब से मारे गए थे। इस बार मालवा व निमाड़ की बारी है। मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा शहर इन्दौर भी इससे अछूता नहीं रहा।

गौर करिए किसी वारदात के हो जाने के बाद पुलिस, आबकारी विभाग और सामान्य प्रशासन, धड़ाधड़ छापामारी करते हैं। दर्जनों अड्डों पर छापे मारते हैं, सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर लेते हैं। कुछ हफ्ते पहले इंदौर में ही शराब व्यवसासियों के खर्च पर पल रहे गुंडों के मध्य जबरदस्त गोलीबारी हुई। पुलिस ने तमाम लोगों को पकड़ भी लिया। पकड़ने की प्रक्रिया ने कई के हाथ-पैर भी टूट गए। उनका जुलूस भी निकाला गया। अब प्रशासनिक अमले को एक नया उपाय या औजार मिल गया है कि आरोपी के भवनों को तोड़ देना। यहीं पर सवाल उठता है कि आरोपी द्वारा वारदात करने के पश्चात हुए हो-हल्ले के चलते गिरफ्तारी होते ही आरोपी का पूरा जीवन वृतांत और उसके द्वारा अतीत में की गई सारी आपराधिक गतिविधियों का मोटा पुलिंदा सामने आ जाता है। पूरा मीडिया पिल पड़ता है, उनका बखान करने। शायद ही कहीं से यह आवाज उठती है, कि जब प्रशासनिक तंत्र के पास इतनी प्रचूर जानकारी उपलब्ध थी तो, कार्यवाही होने के पहले रोका क्यों नहीं जा सका ? अवैध शराब या नकली शराब का धंधा कोई आपसी मारपीट या चाकूबाजी जैसी तात्कालिक घट जाने वाली घटना नहीं है, इस कार्य के लिए पूरा नेटवर्क चाहिए होता है।

गौरतलब है, सरकार ने नकली शराब से होने वाली मृत्यु के लिए मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया। अब वे कह रहे हैं कि गुंड़ों से निपटने के लिए महाराष्ट्र में प्रचलित मकोका एवं उत्तरप्रदेश के गुंडा एक्ट की तर्ज पर अपने यहां कानून बनायेंगे। क्या इसके बाद अपराध रुक जाएंगे या इनमें कमी आएगी ? अभी भी सरकारें जिस तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) का उपयोग कर रहीं है, वह कतई परिणाममूलक सिद्ध नहीं हो पा रहा है। जब सारी दुनिया मृत्युदंड को अपने वहां से हटा रही है, तब हम हर दूसरे अपराध में मृत्युदंड का प्रावधान कर रहे हैं। दुनिया भर के और भारत के भी अनुभव बताते हैं कि मृत्युदंड कोई कारगर उपाय नहीं है। निर्भया कांड के बाद न्यायमूर्ति वर्मा आयोग ने भी स्पष्ट रूप से इस प्रावधान का विरोध किया था। तमाम महिला संगठनों ने भी मृत्युदंड का विरोध किया था। परंतु क्या हुआ ? क्या कोई हल निकला ? यदि निकला होता तो उसी दिल्ली में जहां निर्भया कांड हुआ था, वहां पर नवीनतम शर्मनाक कांड जो कि एक श्मशान में घिनौने ढंग से किया गया है, नहीं किया जाता।

वास्तविकता यही है कि अपराधों की रोकथाम के लिए कठोरतम दंड भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। इंदौर में 6 अक्टूबर 1976 को एक बड़ा भयानक जहरीली शराब कांड हुआ था। इसमें अधिकारिक तौर पर 112 लोग मारे गए थे। परंतु गैर सरकारी आंकड़ा इससे कई गुना ज्यादा का था। दर्जनों की आँखे चली गई थीं। हमारे घर के ठीक पीछे पंचकुइयां श्मशान घाट है। तब उसकी बाहरी दीवार नहीं थी। हमारे घर से न केवल जलती लाशें दिखाई पड़ती थीं बल्कि उनके जलने से उठती बदबू भी हमारे नथुनों में भर गई थी। कई दिनों तक वह बदबू दिमाग में बस गई थी। अजीब किस्म की मिचलाहट भर गई थी। लम्बे समय तक वह बदबू शारीरिक तौर पर बसी रही। वहीं दूसरी ओर आज करीब 50 वर्षों बाद भी वह अहसास गया नहीं है। वह दृष्य आँखों के सामने हर ऐसी घटना जिसमें जहरीली शराब से मौत हुई हो, जेहन में कौंधता है और वही सड़ांध फिर महसूस होने लगती है।

हम तो नश्वर हैं, वहीं राज्य और उसका तंत्र तो एक सतत् व अविनाशी उपक्रम है। वह इन घटनाओं को बार-बार कैसे भूल सकता है ? वह क्या है, जिसकी वजह से राज्य की स्मृति की अवधि लगातार कम होती जाती है और वह कुछ मुद्दों पर कमोवेश डिमेंशिया की स्थिति को अपना लेता है ? वैसे मंटो एक और बड़ी महत्वपूर्ण बात कहते है कि, ‘‘कानून बनाने वाले जाहिल नहीं हो सकते। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि कानूनों में अक्सर हास्यास्पद त्रुटियां क्यों रह जाती हैं ?‘‘ मालवा - निमाड़ में हुए इस शराब कांड में किसी भी सरकारी विभाग या कर्मचारी की जवाबदेही तय की गई हो, ऐसा नहीं लगता। वरना गृहसचिव द्वारा मंदसौर जिले में इसी तरह की जहरीली शराब से मौतों की विशिष्ट जांच के तुरंत बाद 72 घंटों के अंदर अंचल के तमाम जिलों से जहरीली शराब से होने वाली मृत्यु कैसे संभव थीं। उच्चतम अधिकारी के दौरे व जांच के बावजूद यह घृणित कार्य नहीं रुक पाया ? गौरतलब है, इस मामले में अभी तक एक भी उच्चाधिकारी फिर वह आबकारी विभाग का हो या पुलिस का, न तो तबादला हुआ और न ही निलंबन। तो जवाबदारी किसकी हो ? क्या यह नहीं होना चाहिए कि ऐसी वारदात जिसमें जहरीली शराब पीने से मृत्यु हो गई हो, से संबंधित पूरा सरकारी अमला तुरंत निलंबित हो, और दूसरे जिले में भेजा जाए और तब तक निलंबित रहे जब तक कि न्यायालय अपना फैसला न दे दे ?

पुरातन काल में अपराधों के लिए कठोरतम दंड देने के लिए बेहद नृशंस तरीके अपनाये जाते थे। परंतु अपराध उससे नहीं बल्कि सुशासन से रुके। आज की स्थिति में छोटे से छोटा सरकारी अधिकारी व कर्मचारी महाबली है, और उस पर अपनी जिम्मेदारी निभाने में हो रही लापरवाही को लेकर कोई कार्यवाही कर पाना सर्वथा असंभव है। मृत्युदंड के प्रावधान से नहीं बल्कि शासन प्रशासन के संवेदनशील होने से ही इस तरह की घटनाओं पर काबू पाया जा सकता है। साथ ही नीतियों पर भी पुनर्विचार जरुरी है। चलते - चलते मंटो की एक सीख बशर्ते प्रशासन इसे जज्ब कर सके, ‘‘अगर आपकी जिंदगी दर्द के अहसास के बगैर गुजरी है, तो आप अभी पैदा ही नहीं हुए।’’ शासन से पुर्नजन्म की अपेक्षा है।