MP में रोज 3 हजार वायरल फीवर के मरीज, खुद दवा लेने से किडनी पर पड़ रहा बुरा असर

मध्य प्रदेश में वायरल फीवर और सर्दी-जुकाम के बढ़ते मामलों के बीच बिना डॉक्टर की सलाह के पेनकिलर व एंटीबायोटिक्स लेने का चलन खतरनाक साबित हो रहा है। भोपाल, इंदौर समेत कई शहरों में रोज हजारों मरीज ऐसे पहुंच रहे हैं।

Updated: Oct 21, 2026, 01:12 PM IST

मध्य प्रदेश में वायरल फीवर, सर्दी-जुकाम और खांसी के बढ़ते मामलों के बीच बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं लेने का चलन चिंता बढ़ा रहा है। प्रदेश के प्रमुख शहरों में अनुमानित 3 हजार मरीज रोज इन समस्याओं के चलते अस्पतालों और निजी क्लिनिकों में पहुंच रहे हैं। इनमें कई लोग डॉक्टर के पास जाने से पहले ही पेनकिलर और एंटीबायोटिक का इस्तेमाल कर चुके होते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, गलत दवा, जरूरत से ज्यादा डोज या लंबे समय तक दर्द निवारक दवाएं लेने से किडनी को नुकसान पहुंचने का जोखिम हो सकता है। वहीं, वायरल संक्रमण में बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेना भी भविष्य में बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज को मुश्किल बना सकता है।

भोपाल में जेपी अस्पताल, हमीदिया अस्पताल, जिला अस्पताल और निजी क्लिनिकों में सर्दी-जुकाम व वायरल फीवर के करीब 600 मरीज रोज पहुंच रहे हैं। इंदौर और जबलपुर में यह संख्या लगभग 500-500, ग्वालियर में 200 और उज्जैन में 150 मरीज प्रतिदिन बताई गई है। इन शहरों के आंकड़ों के अलावा प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी मरीज सामने आ रहे हैं।

डॉक्टरों के पास ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जो दर्द या बुखार होने पर पहले खुद दवा लेते हैं और परेशानी बनी रहने पर ही चिकित्सकीय सलाह के लिए पहुंचते हैं। कई बार दवा लेने के बाद लक्षण कम हो जाते हैं। जिससे मरीज को लगता है कि उपचार सही है लेकिन लक्षणों में कमी आने का मतलब यह नहीं कि बीमारी की असली वजह भी दूर हो गई है।

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एमबीबीएस, एमडी और एफआईसीडी डॉ. समन ताहिर के मुताबिक, उनके पास आने वाले करीब 50 प्रतिशत मरीज डॉक्टर से परामर्श लेने से पहले ही दवाओं का इस्तेमाल कर चुके होते हैं। उनके क्लिनिकल अनुभव में ऐसे मरीजों में लगभग 60 से 70 प्रतिशत को किसी न किसी तरह की दवा संबंधी क्षति या जटिलता के साथ देखा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये उनके अपने मरीजों से जुड़े अनुभव के आंकड़े हैं किसी व्यापक सर्वेक्षण के निष्कर्ष नहीं। डॉ. ताहिर के अनुसार, दवा का चयन और उसकी मात्रा तय करते समय मरीज की बीमारी, पुरानी मेडिकल हिस्ट्री और किडनी की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति को फायदा पहुंचाने वाली दवा हर मरीज के लिए सुरक्षित या प्रभावी हो यह जरूरी नहीं है।

डॉ. समन ताहिर ने करीब 20 साल के एक युवक का उदाहरण दिया जिसे बार-बार सर्दी-जुकाम और दर्द की शिकायत होती थी। वह डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय खुद ही कुछ दर्द निवारक दवाएं जिन्हें NSAIDs कहा जाता है और एंटीबायोटिक्स लेने लगा। दवाओं से हर बार कुछ राहत मिलने के कारण उसने इनका इस्तेमाल जारी रखा। बाद में जब युवक डॉक्टर के पास पहुंचा तो उसकी किडनी प्रोफाइल में गड़बड़ी मिली और क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ा हुआ था। ऐसे में उपचार के दौरान उसकी शुरुआती बीमारी के साथ किडनी की स्थिति पर भी ध्यान देना पड़ा।

हालांकि, केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किडनी की परेशानी किसी एक दवा के कारण ही हुई। इसकी पुष्टि के लिए चिकित्सकीय जांच और अन्य संभावित कारणों का आकलन जरूरी है। डॉक्टर का कहना है कि बिना निगरानी लंबे समय तक पेनकिलर लेना जोखिम बढ़ा सकता है।

ऑर्थो स्पाइन एंड स्पोर्ट्स इंजरी विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ञेश सक्सेना ने भी एक मरीज का मामला साझा किया जो करीब तीन महीने तक सिरदर्द समझकर दर्द निवारक दवाएं लेता रहा। उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि उसके दर्द की वजह गर्दन से जुड़ी समस्या हो सकती है। विशेषज्ञ से जांच कराने पर पता चला कि गर्दन की नस पर दबाव पड़ने के कारण उसे सिर में दर्द हो रहा था।

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डॉ. सक्सेना के मुताबिक, लगातार दवाएं लेने के दौरान मरीज के क्रिएटिनिन में बढ़ोतरी भी सामने आई और किडनी से जुड़ी परेशानी का पता चला। इसके बाद उपचार में केवल दर्द कम करने के बजाय गर्दन की मूल समस्या पर ध्यान दिया गया। नस से जुड़ी परेशानी के इलाज के साथ मांसपेशियों को मजबूत करने की दिशा में भी काम किया गया। डॉ. सक्सेना के अनुसार, लगातार होने वाले दर्द को सामान्य मानकर लंबे समय तक दवाएं लेते रहना उचित नहीं है। सिरदर्द सहित कई तरह के दर्द शरीर में किसी दूसरी समस्या का संकेत हो सकते हैं। ऐसे में बार-बार दवा लेने के बजाय उसकी वजह का पता लगाना जरूरी है।

डॉ. प्रज्ञेश सक्सेना का कहना है कि उनकी ओपीडी में पहले करीब 10 प्रतिशत मरीज ऐसे आते थे जो डॉक्टर से मिलने से पहले ही दवा ले चुके होते थे। उनके व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार, अब यह संख्या बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। उनका मानना है कि गूगल और सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी आसानी से उपलब्ध होने के कारण लोग खुद ही दवाओं और एक्सरसाइज के बारे में निर्णय लेने लगे हैं। कुछ मरीज कई सप्ताह या महीनों तक दर्द निवारक दवाएं लेते रहते हैं लेकिन समस्या की असली वजह जानने के लिए जांच नहीं कराते।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी शुरुआती समझ बनाने में मदद कर सकती है लेकिन वह व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी व्यक्ति की बीमारी, उम्र, मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक स्थिति के अनुसार उपचार बदल सकता है। इसी वजह से किसी दूसरे मरीज का पुराना पर्चा इस्तेमाल करना या सोशल मीडिया पर बताई गई दवा और एक्सरसाइज को बिना सलाह अपनाना नुकसानदेह हो सकता है।

डॉ. समन ताहिर के मुताबिक, दर्द की वजह मांसपेशियों से जुड़ी परेशानी, पोषण की कमी या कोई अन्य बीमारी भी हो सकती है। पेनकिलर से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है लेकिन इससे दर्द पैदा करने वाली मूल समस्या का इलाज अपने आप नहीं हो जाता। डॉ. प्रज्ञेश सक्सेना भी मरीज की स्थिति के अनुसार शारीरिक गतिविधि, वॉकिंग, मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज और संतुलित खानपान पर ध्यान देने की सलाह देते हैं। 

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हालांकि, हर मरीज के लिए एक ही व्यायाम उपयुक्त नहीं होता। दर्द की वजह और उसकी गंभीरता के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए कि कौन सी गतिविधि सुरक्षित रहेगी। लगातार दर्द होने, बार-बार दवा की जरूरत पड़ने या परेशानी बढ़ने पर चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। विशेष रूप से लंबे समय तक दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने भी दर्द निवारक दवाओं और एंटीबायोटिक्स के तर्कसंगत इस्तेमाल पर जोर दिया है। NSAIDs यानी नॉन स्टेरॉयडल एंटी इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स का उपयोग दर्द और सूजन कम करने के लिए किया जाता है। इनमें से कुछ दवाएं किडनी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं खासकर जब उनका इस्तेमाल अनुचित मात्रा में या लंबे समय तक किया जाए।

दूसरी ओर एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमणों के इलाज के लिए किया जाता है। वायरल फीवर, सर्दी-जुकाम जैसे वायरल संक्रमणों में ये सामान्य तौर पर प्रभावी नहीं होती। बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेने से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ सकता है। जिसमें बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं और भविष्य में संक्रमण का इलाज कठिन हो सकता है। 

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अधिकांश NSAIDs शेड्यूल H और अधिकांश एंटीबायोटिक्स शेड्यूल H1 के अंतर्गत आती हैं। इन दवाओं की बिक्री और इस्तेमाल निर्धारित प्रिस्क्रिप्शन नियमों के अनुसार होना चाहिए। विशेषज्ञों की सलाह है कि बुखार, सर्दी-जुकाम या दर्द होने पर पुराने पर्चे के आधार पर खुद दवा शुरू न करें। बिना उचित प्रिस्क्रिप्शन दवाएं खरीदने, किसी दूसरे की दवा लेने और अपनी मर्जी से डोज या उपचार की अवधि तय करने से बचें। तुरंत राहत पाने के लिए की गई लापरवाही आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकती है।