हिंसा, अहिंसा और भगत सिंह: सच्‍चे भगत सिंह की खोज करती किताब

गांधीजी और कांग्रेस नेताओं के भगत सिंह को बचाने के बहुत से प्रयासों का ससंदर्भ जिक्र करने के साथ ही लेखक डॉ अंबेडकर के एक संपादकीय का जिक्र करते हैं, जिससे यह स्‍पष्‍ट होता है कि गांधीजी के प्रयासों के बावजूद फांसी टलना संभव नहीं था।

Updated: Oct 29, 2026, 03:42 PM IST

हमारे समय के सुपरिचित लेखक और जनवक्‍ता अशोक कुमार पांडेय की किताब 'हिंसा-अहिंसा और भगत सिंह' कई मायने में अनूठी है। अनबाउंड स्क्रिप्‍ट प्रकाशन से प्रकाशित 350 रुपये की किताब का अनूठापन इस बात में नहीं है कि किताब लिखने में किसी खास शैली, अलंकार, भाषा या लालित्‍य का प्रयोग किया गया है। किताब इसलिए अलग है कि इसने पॉपुलर दबाव के किसी भी हथकंडे को इस्‍तेमाल करने से परहेज किया है और विशुद्ध मृदुगूढ़ विश्लेषण से एक लोकविख्‍यात नायक की शास्‍त्रीय आलोचना की है। यहां आलोचना का अर्थ बुराई नहीं, बल्कि साहित्‍य में प्रचलित नीर-क्षीर विवेक से है। 

किताब के कथ्‍य पर आने से पहले एक बात और कह दूं कि यह किताब सरदार भगत सिंह, उनकी विचारधारा और उनके समय को समग्रता में समझती है और संक्षिप्‍त ढंग से व्‍यक्‍त करती है। जैसा कि शीर्षक से स्‍पष्‍ट है कि इसमें हिंसा और अहिंसा के प्रश्‍न पर विचार किया गया है। जाहिर है कि जब भगत सिंह के संदर्भ में हिंसा-अहिंसा का प्रश्‍न आएगा तो महात्‍मा गांधी को तो उसमें आना ही है। वैसे भी देश में लंबे समय से सरदार भगत सिंह की नुकीली मूछों वाली छवि उन्‍हें एक उग्र नायक के तौर पर पेश करती आई है, वहीं गांधीजी की पद्मासन मुद्रा में ध्‍यानमग्‍न छवि उन्‍हें बुद्ध के उत्‍तराधिकारी जैसा दिखाती है। 

ऐसे में बहुत संभव था कि अशोक जी भी पुराने विमर्श की तरह भगत सिंह और महात्‍मा गांधी को आमने-सामने कर देते और हिंसा-अहिंसा की बहस में किसी निष्‍कर्ष तक पहुंच जाते। लेकिन लेखक ने ऐसा नहीं किया।
 
उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक को व्‍यक्ति केंद्रित नहीं होने दिया, बल्कि एक तरह से भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम के बीच भगत सिंह को रखा, जो कि किसी भी नायक की वास्‍तविक स्थिति होती है। कोई भी नायक अपने देश-काल-परिस्थिति और समकालीन व्‍यक्तियों के बीच ही अंकुरित, पल्‍लवित और परिपक्‍व होता है। गांधी, भगत सिंह या अन्‍य कोई भी व्‍यक्ति इसका अपवाद नहीं हो सकता।
 
इस किताब में प्रचुर ऐतिहासिक तथ्‍यों और संदर्भों के साथ लेखक ने दिखाया है कि भगत सिंह का क्रांतिकारी स्‍वरूप उनसे पहले की क्रांतिकारी परंपरा का ही विस्‍तार था। यह धारणा कि वे ही पहले विचारवान क्रांतिकारी थे, भ्रामक है। जैसे कि भगत सिंह का वह मशहूर वाक्‍य जिसमें उन्‍होंने कहा था कि बहरे कानों तक आवाज पहुंचाने के लिए बम धमाका जरूरी है, फ्रांस के अराजकतावादी नेता ऑगुस्‍ते वैयां का वाक्‍य है। भगत सिंह ने बाकायदा उनका नाम लेकर ही यह वाक्‍य बोला था। भगत सिंह के क्रांतिकारी तेवर, देश पर मर मिटने की अदम्‍य इच्‍छा और देश में इंकलाब लाने की तड़प को लेखक ने बखूबी उकेरा है। लेकिन साथ ही लेखक ने एक बड़े जोखिम भरी कोशिश की है कि उसने नायकों पर लाद दिये जाने वाले देवत्‍व से भगत सिंह को अलग किया है। 

वे स्‍पष्‍ट रूप से बताते हैं कि आज भगत सिंह को पूजने वाले, उन्‍हें केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने वाले या सांडर्स की हत्‍या करने वाले वीर के तौर पर पूजते हैं। उनके इस तरह के प्रशंसकों के मन में यह बात रहती है कि जहां गांधीजी की अहिंसा कमजोर थी, वहीं भगत सिंह ने हथियार के जोर पर ऑन द स्‍पॉट फैसला कर दिया। लेकिन लेखक याद दिलाते हैं कि लंबे समय तक तो देश को यह पता हीं नहीं था कि सांडर्स की हत्‍या भगत सिंह ने की है। वह तो जब बम फेंकने के मामले में गिरफ्तार हुए और उनके ही संगठन के कई साथी सरकारी गवाह बन गए, तब जाकर इस वीरता का खुलासा हुआ और अंतत: हत्‍या का यही प्रकरण उनकी फांसी का आधार बना।
 
भारतीय जनमानस में तो भगत सिंह की लोकप्रियता अपने चरम पर तब पहुंची जब वे और उनके साथी लाहौर जेल में कई महीने तक भूख हड़ताल पर बैठे। यही वह समय था जब कांग्रेस नेता पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस भगत सिंह से मिलने गए और गांधीजी ने उनकी रिहाई के लिए वायसराय से बात की। यहां भी लेखक स्‍पष्‍ट करते हैं कि भगत सिंह की इस भूख हड़ताल को गांधी की अहिंसा के समकक्ष न रखा जाए, क्‍योंकि जेल में बंद कैदियों के पास दूसरा कोई विकल्‍प नहीं था, इसलिए वे अहिंसा की तरफ मुड़े। 

लेखक अपने आप को हिंसा या अहिंसा दोनों में से किसी का तरफदार नहीं बनाता, बल्कि कसौटी यह रखता है कि देश की आजादी के साथ लोकतंत्र और खुशहाली के लिए कौन सा रास्‍ता बेहतर हो सकता था। इस तराजू पर वह तौलते हैं कि गांधीजी ने अहिंसक आंदोलनों से करोड़ों लोगों को आजादी की लड़ाई में शामिल कराया। वह गांधीजी के इस तर्क को भी स्‍वीकार करते हैं कि अगर हिंसा से आजादी हासिल की गई तो आजादी के बाद भी लोग अपने विरोधियों से निपटने के लिए हिंसा का प्रयोग करेंगे, जो आत्‍मघाती होगा।
 
दूसरी तरफ हिंसक मार्ग से परहेज किए बिना भारत की आजादी के क्रांतिकारियों के मार्ग को जब वे कसौटी पर कसते हैं, तो पाते हैं कि जनता का बहुत बड़ा वर्ग उनके साथ आने से डरता था। यही नहीं, भारतीयों का पक्ष रखने वाला मीडिया भी असेंबली पर बम फेंकने की निंदा कर रहा था। इसमें पंडित मदनमोहन मालवीय का हिंदुस्‍तान टाइम्‍स भी शामिल था। लेखक खुद भगत सिंह के विचारों से यह साबित करते हैं कि भगत सिंह को भी छिटपुट हिंसा की घटनाओं से आजादी आने की उम्‍मीद नहीं रह गई थी और जेल में अपने अंतिम दिनों में वह लिख रहे थे-''इंकलाब का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्‍त्र आंदोलन नहीं होता। बम और पिस्‍तौल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं। इसमें भी संदेह है कि कुछ आंदोलनों में बम और पिस्‍तौल महत्‍वूपर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परंतु केवल इसी कारण से बम और पिस्‍तौल क्रांति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो।''

लेखक इस बात को रेखांकित करते हैं कि गांधीजी ने भगत सिंह को फांसी से नहीं बचाया, जैसी धारणा आज वे विचारधाराएं फैला रही हैं, जो उस समय भगत सिंह के साथ नहीं थी। वे भगत सिंह की रिहाई के लिए कांग्रेस के प्रयास और वामपंथ तथा दक्षिणपंथ की निष्क्रियता को बखूबी दर्ज करते हैं। वे कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के साप्‍ताहिक अखबार वर्कर्स वीकली के नवंबर 1930 के अंक को उद्धृत करते हैं- ''भगत सिंह और उनके साथी व्‍यक्तिवादी, पेटी बुर्जुआ और केवल षड़यंत्रकारी हैं। एचएसआरए (भगत सिंह का संगठन)एक सामाजिक आधार विकसित करने में और वर्ग संघर्ष की यथार्थवादी समझ विकसित करने में बुरी तरह विफल हुआ है।'' इसी तरह का रुख दक्षिणपंथियों का रहा। 

गांधीजी और कांग्रेस नेताओं के भगत सिंह को बचाने के बहुत से प्रयासों का ससंदर्भ जिक्र करने के साथ ही लेखक डॉ अंबेडकर के एक संपादकीय का जिक्र करते हैं, जिससे यह स्‍पष्‍ट होता है कि गांधीजी के प्रयासों के बावजूद फांसी टलना संभव नहीं था, क्‍योंकि ऐसा करना ब्रिटेन की लेबर सरकार के लिए राजनैतिक रूप से आत्‍मघाती कदम होता।  डॉ अंबेडकर के शब्‍दों में- ''सरकार समेत पूरी दुनिया जानती है कि यह न्‍याय की देवी के प्रति भक्ति नहीं, बल्कि इंग्‍लैंड में कंजरवेटिव पार्टी और जनमत का डर था, जिसने उन्‍हें यह बलिदान देने के लिए मजबूर किया।''

अहिंसा और हिंसा के सैद्धांतिक पक्ष के साथ ही लेखक क्रांतिकारी के मन की भी पड़ताल करते हैं। उनका शोध बताता है कि किसी भी 22-23 साल के नौजवान की तरह भगत सिंह के मन में भी प्रेम की कोमल भावनाएं थीं। खुद पूरी तरह बागी होने और अपनी शहादत से हजारों नौजवानों के उनके रास्‍ते पर चलने की आशा करने वाले भगत सिंह को अंतिम समय में अपने छोटे भाई की पढ़ाई की फ्रिक सता रही थी। लेखक को इस बात पर खासी आपत्ति‍ है कि क्रांतिकारी आंदोलन में प्रेम या विवाह करने को बुरा क्‍यों माना जाता था। वे यह भी रेखांकित करते हैं कि संगठन और क्रांति का खयाल भले सिद्धांतों पर आधारित हो लेकिन बहुत से मौकों में महत्‍वपूर्ण निर्णय विवेक से नहीं भावुकता से लिए गए। इसमें भगत सिंह का असेंबली में बम फेंकने का निर्णय भी शामिल है। इसके पीछे की कथा पाठकों को किताब में ही पढ़नी चाहिए।

सारे पक्षों को तौलने के बाद और साक्ष्‍यों की पूरी शृंखला पेश करने बाद किताब के 208वें पन्‍ने पर लेखक लिखते हैं, राम प्रसाद''बिस्मिल सही साबित हुए कि बंदूक और बम से अगले पचास साल तक देश आजाद नहीं हो पाएगा, इतिहास ने भगत सिंह की इस भविष्‍यवाणी को गलत साबित किया कि जल्‍दी ही देश का युवा साम्राज्‍यवाद को उखाड़ फेंकेगा और देश में कम्‍युनिस्‍ट क्रांति होगी। सही तो तब गांधी साबित हुए कि हिंसा से हुई क्रांति बहुत दिनों तक नहीं चलेगी, जब नब्‍बे के दशक में दुनिया ने सोवियत संघ को टुकड़ों में बिखेर दिया।''

वह फांसी से कुछ दिन पहले 2 फरवरी 1931 को नौजवानों के नाम लिखे भगत सिंह के संदेश को याद  दिलाते हैं- ''मैंने आतंकवादी की तरह व्‍यवहार किया, लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूं। ... और मुझे यकीन है कि हम उन तरीकों से कुछ हासिल नहीं कर सकते।'' लेखक ऐसे ही बहुत से उद्धरणों से बताते हैं कि जेल में बंद भगत सिंह ठीक वैसे नहीं सोच रहे थे, जैसे कि वे अपनी गिरफ्तारी से पहले कर रहे थे। अपने अंतिम समय में भगत सिंह को सबसे महत्‍वपूर्ण बात यही लग रही थी कि देश में इंकलाब लाने के लिए उन्‍हें अपने विचारों को घर-घर तक पहुंचाना होगा। कुछ अंग्रेज अफसरों की हत्‍या करने से यह काम नहीं हो सकता। 

लेखक अपने पाठकों को सच्‍ची वीरता की ओर ले जाने की लगातार कोशिश करते हैं। इस मार्ग में हौसला और जज्‍बा होने के साथ ही संगठन, विवेक और रणनीति की भी जरूरत पड़ती है। शायद वे यह कह रहे हैं कि अभिमन्‍यु की तरह बलिदान होने से कृष्‍ण की तरह विजयी बनना ज्‍यादा कल्‍याणकारी है। वे बार-बार पूछते हैं कि अगर भगत सिंह जैसा हीरा असमय मृत्‍यु की चक्‍की में न पीस दिया गया होता, तो क्‍या वह जीवित रहकर और बड़े काम न कर लेता। यह तकरीबन वही बात है जो गांधीजी कह रहे थे। भगत‍ सिंह की बहादुरी और देश की विंडबना को रेखांकित करते हुए व्‍यथित लेखक पाठक के पास यह सवाल छोड़ देता है- ''भगत सिंह राष्‍ट्रीय नायक बन चुके थे, क्रांतिकारी आंदोलन बिखर चुका था। इन्‍हीं दो पंक्तियों में उस दौर के इतिहास को समेटा जा सकता है, हालांकि अक्‍सर पहली पंक्ति की रौशनी में दूसरी दब जाती है।''