MP में सरकारी रिकॉर्ड से गायब हुआ आदिवासियों का गांव, ग्रामीणों ने शुरू किया आंदोलन

MP के खरगोन में पुश्तैनी जमीन का रिकॉर्ड भूलेख पोर्टल से गायब होने पर आदिवासी किसान भड़क गए हैं। किसान इसे अपनी जमीन बता रहे हैं। जबकि, प्रशासन ने इसे सरकारी भूमि घोषित किया है।

Publish: Jul 02, 2026, 05:00 PM IST

खरगोन। मध्य प्रदेश के खरगोन जिले की भगवानपुरा तहसील स्थित दगड़खेड़ी गांव में भूमि अधिकारों को लेकर आदिवासी किसानों और जिला प्रशासन के बीच विवाद गहरा गया है। गांव के दर्जनों आदिवासी परिवारों का आरोप है कि दशकों से जिस जमीन पर वे खेती कर रहे हैं और जिसके स्वामित्व संबंधी दस्तावेज उनके पास मौजूद हैं उसका रिकॉर्ड एमपी भूलेख पोर्टल से गायब है या उसे शासकीय भूमि के रूप में दर्ज कर दिया गया है। दूसरी ओर जिला प्रशासन ने किसानों के दावों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि संबंधित भूमि पिछले लगभग 100 सालों से सरकारी रिकॉर्ड में शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है और जांच में किसी प्रकार की रिकॉर्ड संबंधी त्रुटि सामने नहीं आई है।

विवाद भगवानपुरा तहसील के दगड़खेड़ी गांव के उन आदिवासी परिवारों से जुड़ा है जो सालों से संबंधित जमीन पर खेती कर रहे हैं। इनमें अकला चमार जैसे किसान भी शामिल हैं जिनके पास राजस्व विभाग द्वारा जारी भूमि अधिकार एवं ऋण पुस्तिका, पुराने भूमि पंजीयन दस्तावेज और सहकारी बैंक से भूमि के आधार पर लिए गए लोन का रिकॉर्ड मौजूद है। किसानों का कहना है कि इन दस्तावेजों के बावजूद एमपी भूलेख पोर्टल पर उनके नाम या संबंधित खसरा नंबर दिखाई नहीं देते हैं। जिसकी वजह से उनके स्वामित्व पर सवाल खड़े हो गए हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, दगड़खेड़ी के करीब 40 बरेला और भील आदिवासी परिवार इसी समस्या से जूझ रहे हैं। उनका कहना है कि पहले वे भूमि अधिकार पुस्तिका के आधार पर सहकारी ऋण, बीज और उर्वरक पर मिलने वाली सरकारी सहायता का लाभ लेते थे लेकिन भूमि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण के बाद उनके नाम ऑनलाइन रिकॉर्ड से गायब हो गए। इसके कारण वे फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपज बिक्री, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और अन्य कृषि योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

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भूमि रिकॉर्ड में सुधार की मांग को लेकर ग्रामीणों ने भगवानपुरा तहसील कार्यालय के सामने कई दिनों तक धरना दिया। भीषण गर्मी के बीच ग्रामीणों ने वहीं तंबू लगाकर प्रदर्शन किया और प्रशासन से रिकॉर्ड दुरुस्त करने की मांग की। किसानों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे दोबारा बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे। आंदोलन के दौरान किसानों ने मध्य प्रदेश पेसा नियम-2022 की प्रति प्रशासन को सौंपते हुए दावा किया कि ग्राम सभा को भूमि अभिलेखों में संशोधन की अनुशंसा करने का अधिकार प्राप्त है। भाजपा नेता चंदर सिंह वासकले भी आंदोलनरत किसानों से मिलने पहुंचे और उनकी बात सुनी।

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि उस समय बनी जब कुछ महीने पहले उद्योग विभाग ने क्षेत्र की लगभग 200 एकड़ भूमि औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के लिए आवंटित करने का प्रस्ताव रखा था। ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और ग्राम सभा ने प्रस्ताव के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया। किसानों का कहना है कि इसी घटना के बाद उन्हें आशंका हुई कि जिन जमीनों पर वे सालों से खेती कर रहे हैं उनका रिकॉर्ड सरकारी अभिलेखों में सुरक्षित नहीं है। प्रशासन ने बाद में उद्योग विभाग का प्रस्ताव निरस्त कर दिया। बावजूद इसके भूमि स्वामित्व का विवाद बना हुआ है।

धरने के बाद प्रशासन ने 12 पटवारियों की टीम गठित कर मौके पर सर्वे और सीमांकन शुरू कराया ताकि यह पता लगाया जा सके कि संबंधित भूमि पर वास्तविक रूप से खेती कौन कर रहा है। हालांकि, किसानों का कहना है कि केवल सर्वे पर्याप्त नहीं है बल्कि डिजिटल रिकॉर्ड में उनके स्वामित्व की विधिवत प्रविष्टि भी की जानी चाहिए।

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जिला प्रशासन का कहना है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा जिस भूमि पर दावा किया जा रहा है वह राजस्व अभिलेखों में लंबे समय से शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है। प्रशासन के अनुसार, ग्राम धूलकोट के खसरा नंबर 318, रकबा 232.318 हेक्टेयर भूमि का रिकॉर्ड साल 1925-26 में पुराने खसरा नंबर 194 के रूप में दीगर जंगल मद में दर्ज था। बाद में 1968-69 के बंदोबस्त में इसका नया खसरा नंबर 318 दर्ज किया गया और वर्तमान रिकॉर्ड में भी यह मध्य प्रदेश शासन की भूमि के रूप में दर्ज है। अधिकारियों का दावा है कि इस भूमि का कभी पट्टा जारी नहीं हुआ और किसी भी आवेदक का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं मिला।

कलेक्टर भव्या मित्तल के अनुसार, आंदोलन के बाद रिकॉर्ड की दोबारा जांच कराई गई लेकिन किसी प्रकार की विसंगति सामने नहीं आई। प्रशासन का यह भी कहना है कि अब तक किसानों ने अपने दावों के समर्थन में ऐसा कोई वैधानिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया है जिससे निजी स्वामित्व सिद्ध हो सके। मामले की विस्तृत रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दी गई है। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि पेसा नियम-2022 में अतिक्रमित शासकीय भूमि को निजी स्वामित्व में दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं है।

हालांकि, किसान इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि उनके पास दशकों पुराने भूमि अधिकार दस्तावेज, ऋण पुस्तिकाएं और अन्य सरकारी अभिलेख मौजूद हैं। इनके आधार पर सालों तक सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिलता रहा। किसानों का आरोप है कि भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण के दौरान रिकॉर्ड अपडेट नहीं किए गए। जिसकी वजह से उनकी जमीनें डिजिटल सिस्टम में या तो गायब हो गईं या गलत श्रेणी में दर्ज हो गई।

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भूमि अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अभिलेखों के रखरखाव में वर्षों से गंभीर कमियां रही हैं। उनके अनुसार, पहले गिरदावरी व्यवस्था के तहत नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण और रिकॉर्ड अपडेट होता था लेकिन यह प्रक्रिया बंद होने के बाद रिकॉर्ड में कई विसंगतियां बनी रही। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटलीकरण के दौरान पुराने रिकॉर्ड का पर्याप्त सत्यापन नहीं होने से कई ऐतिहासिक त्रुटियां ऑनलाइन रिकॉर्ड में भी चली गई।

किसानों का कहना है कि रिकॉर्ड में विसंगति का सीधा असर उनकी आजीविका पर पड़ रहा है। कई परिवार सरकारी सब्सिडी पर मिलने वाले बीज, कृषि ऋण, फसल बीमा और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी योजनाओं से वंचित हो गए हैं। खराब फसल वाले सालों में उन्हें मजदूरी के लिए महाराष्ट्र जैसे पड़ोसी राज्यों में जाना पड़ता है। किसानों का कहना है कि वे केवल उन जमीनों का अधिकार चाहते हैं जिन पर उनके परिवार पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं।

फिलहाल प्रशासन सर्वे और रिकॉर्ड की जांच की प्रक्रिया जारी होने की बात कह रहा है। जबकि, किसान ग्राम सभा की निगरानी में नए सर्वे, भूमि अभिलेखों के संशोधन और डिजिटल रिकॉर्ड में अपने स्वामित्व की प्रविष्टि की मांग पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि यदि स्पष्ट समाधान नहीं मिला तो आंदोलन आगे भी जारी रहेगा।

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