परीक्षा व्यवस्था के संकट से लोकतांत्रिक टकराव तक
पिछले एक दशक में देशभर में केंद्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षाओं के 90 से अधिक पेपर लीक होने के मामले सामने आए हैं, जिनसे लगभग 7.5 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं। इनमें नीट-यूजी, यूजीसी-नेट, एसएससी तथा विभिन्न राज्यों की पुलिस और शिक्षक भर्ती परीक्षाएं शामिल हैं।
भारत में शिक्षा और सार्वजनिक भर्ती परीक्षा प्रणाली को लेकर उपजा असंतोष अब एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का रूप ले चुका है। पिछले लगभग एक महीने से हजारों छात्र-छात्राएं और युवा शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन कर रहे हैं। उनकी प्रमुख मांग है कि शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक भर्ती एवं प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में गहराते संकट के लिए जवाबदेही तय की जाए तथा परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बहाल की जाए।
पिछले एक दशक में देशभर में केंद्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षाओं के 90 से अधिक पेपर लीक होने के मामले सामने आए हैं, जिनसे लगभग 7.5 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं। इनमें नीट-यूजी, यूजीसी-नेट, एसएससी तथा विभिन्न राज्यों की पुलिस और शिक्षक भर्ती परीक्षाएं शामिल हैं। भारत की 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 34.5 से 37.1 करोड़ युवा आबादी, जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग 27 प्रतिशत है, इस व्यवस्था से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ी हुई है। बार-बार परीक्षाओं के निरस्त होने, नियुक्तियों में देरी और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की कार्यप्रणाली पर उठते सवालों ने लाखों युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता में डाल दिया है।
हर रद्द हुई परीक्षा और हर प्रश्नपत्र लीक के पीछे वर्षों की मेहनत, परिवारों का आर्थिक निवेश, मानसिक तनाव और टूटते सपने जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि यह आंदोलन केवल परीक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि युवाओं के रोजगार, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा जैसे व्यापक प्रश्नों से भी जुड़ गया है।शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर तीन सप्ताह से आमरण अनशन कर रहे पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाने के बाद आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जनसमर्थन मिला। इसके बाद छात्रों ने संसद तक मार्च का आह्वान किया।
दिल्ली, मुंबई, पटना, बेंगलुरु सहित अनेक शहरों में कैंडल मार्च, धरने और प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं। सिख समाज सहित अनेक सामाजिक संगठनों द्वारा प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन की व्यवस्था की जा रही है। बड़ी संख्या में आम नागरिक भी भोजन और अन्य आवश्यक सामग्री भेजकर आंदोलन के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त कर रहे हैं। इस मानवीय सहयोग ने आंदोलन को सामाजिक संवेदना का भी स्वरूप प्रदान किया है।
20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। पुलिस ने आंसू गैस, लाठीचार्ज तथा अन्य बल प्रयोग के माध्यम अपनाए। अनेक प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि उनके विरुद्ध अत्यधिक बल प्रयोग किया गया, जबकि पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई। आंदोलनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ सादे कपड़ों में मौजूद लोगों ने प्रदर्शनकारियों पर हिंसा की तथा बैरिकेडिंग में करंट और कीलों वाली लाठियों का प्रयोग किया गया। पुलिस पर पैलेट गन के इस्तेमाल के भी आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है।
सरकार ने जंतर-मंतर क्षेत्र में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए, कई मेट्रो स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद किया तथा पूरे इलाके को सुरक्षा घेरे में बदल दिया। केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शनों को संभालने के लिए 3000 अतिरिक्त सशस्त्र पुलिसकर्मी भेजे हैं। यह कदम दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर उठाया गया है। राजधानी के संवेदनशील हिस्सों जंतर-मंतर से संसद भवन तक खासतौर से इसके आसपास के इलाकों को पूरी तरह से छावनी में बदल दिया गया है। यहां पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है।
जमीनी घेराबंदी के अलावा दिल्ली की सुरक्षा को आधुनिक तकनीक से पूरी तरह से लैस किया गया है। इसके बावजूद अगले दिन भी बड़ी संख्या में छात्र आंदोलन स्थल पर पहुंचे और संघर्ष जारी रखने की घोषणा की है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित अनेक विपक्षी नेताओं ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में प्रदर्शन किया और गिरफ्तार हुए। उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव, शरद पवार, सुप्रिया सुले, अरविंद केजरीवाल और संजय सिंह सहित कई नेताओं ने जंतर-मंतर पहुंचकर आंदोलन का समर्थन किया।
संसद में भी विपक्ष ने पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए गृह मंत्री अमित शाह और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई। एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित कई मानवाधिकार संगठनों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग पर चिंता व्यक्त की और लोकतांत्रिक अधिकारों के सम्मान की आवश्यकता पर बल दिया। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी बात रखने तथा धरना-प्रदर्शन करने का अधिकार देता है।
आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि उनकी लड़ाई केवल किसी एक परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया की नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा एवं भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही स्थापित करने की है। उनकी प्रमुख मांगों में परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, पेपर लीक मामलों में त्वरित एवं कठोर कार्रवाई, भर्ती प्रक्रियाओं की समयबद्धता, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी में जवाबदेही तय करना तथा शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास बहाल करना शामिल है। यह आंदोलन अब केवल परीक्षा सुधार का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि युवाओं के भविष्य, रोजगार और शासन की जवाबदेही से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है।
यदि सरकार आंदोलनकारी छात्रों के साथ संवाद स्थापित कर उनकी मांगों पर ठोस और समयबद्ध निर्णय लेती है, तो स्थिति शांत हो सकती है और शिक्षा व्यवस्था में सुधार का रास्ता खुल सकता है। इसके विपरीत यदि केवल पुलिस बल और प्रशासनिक नियंत्रण के माध्यम से आंदोलन को दबाने का प्रयास जारी रहता है, तो युवाओं का असंतोष और व्यापक हो सकता है। ऐसी स्थिति में यह आंदोलन देशव्यापी छात्र-युवा अभियान का रूप लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों को भी अपने साथ जोड़ सकता है। इससे संसद, न्यायपालिका और सरकार पर संस्थागत सुधारों का दबाव बढ़ने की संभावना है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संकट का सबसे प्रभावी समाधान संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही है। इसलिए आने वाले समय में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत, विश्वास बहाली और शिक्षा सुधारों पर ठोस पहल ही यह तय करेगी कि यह संघर्ष टकराव की दिशा में बढ़ता है या फिर भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बनता है।
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।)




