एक अखबार और पहला स्वतंत्रता दिवस
15 अगस्त 1947 को प्रकाशित इस विशिष्ट समाचार पर गौर करें। शीर्षक है, "प्रश्नपत्रों की कथित चोरी : आरोपी दोषमुक्त" इसमें एक प्रिंटिंग प्रेस के जो वस्तुतः समकालीन ही लगता है। कर्मचारियों पर एस.एस.एल.सी. और इंटरमीजिएट परीक्षाओं के प्रश्नपत्र चुराने का आरोप लगाया गया था। क्या इस निरंतरता को हम कभी रोक पाएंगे?
"कालचक्र एक दिन अंग्रेजों को बाध्य कर देगा कि वे अपने भारतीय साम्राज्य को छोड़कर चले जाएं। परंतु कठोर त्रासदी यह है कि वे अपने पीछे किस तरह का भारत छोड़कर जाएंगे? अंततः जब उनके शताब्दियों के प्रशासन की धारा सूख जाएगी, तो वह अपने पीछे किस तरह का कूड़ा-करकट और गंदगी छोड़कर जाएंगे?"
रवींद्रनाथ टैगोर-1941
भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया। रवींद्र बाबू ने अपनी मृत्यु के करीब तीन माह पूर्व उक्त बात कही थी। विचारणीय है कि इसके बाद के 6 वर्षों में भारत की और कितनी दुर्गति हुई होगी। यही द्वितीय विश्वयुद्ध का और उसके बाद का कालखंड भी है, जिसमें अमेरिका उत्तरोत्तर मजबूत और निर्णायक होता चला गया और ब्रिटेन को अपने कुकर्मों के परिणाम मिलने शुरू हो गए।
भारत की स्वतंत्रता देशवासियों द्वारा शताब्दियों के संघर्ष से अर्जित प्रतिफल और यश है। हम लोग स्वतंत्रता दिवस को मुक्ति दिवस भी मानते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों का मानना था कि यह महज अंग्रेजों की अधीनता से मुक्ति ही नहीं है, बल्कि यह देश में व्याप्त गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, साम्प्रदायिकता, आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक असमानता, लैंगिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत भी है।
रवींद्र बाबू ने जिस तरह के अंग्रेज मुक्त भारत की परिकल्पना की थी, वास्तविकता उससे भी ज्यादा भयानक थी। परंतु विषम परिस्थितियों के बावजूद भारतीयों में गजब का आत्मविश्वास और ऊर्जा थी, एक नया देश बनाने और संवारने की। आवश्यकता यह समझने की है कि 15 अगस्त 1947 को भारत के लोग कैसे भविष्य की परिकल्पना कर रहे थे और भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को किस तरह से परिभाषित कर रहे थे।
"दि हिंदू" ने हाल ही में 15 अगस्त, शुक्रवार 1947 को प्रकाशित अपने मद्रास (अब चेन्नई) संस्करण का हूबहू पुनर्प्रकाशन किया है। इसका तत्कालीन मूल्य 2 आना था। मूल पृष्ठ संख्या 12 एवं इसके साथ 20 पृष्ठों का सप्लीमेंट भी था। इसे पढ़ना न सिर्फ रोमांचित करता है बल्कि यह हमारे दिमाग में स्पष्टता लाता है कि आजादी के लिए संघर्षरत सिर्फ भावुक नहीं बल्कि जबरदस्त संतुलित लोग थे।
उस दिन का पहला शीर्षक है "स्वतंत्र भारत का जन्म", "केंद्रीय संविधान सभा ने कार्यभार ग्रहण किया", "सदस्यों ने देशसेवा की प्रतिज्ञा की"। इसके पश्चात उपशीर्षक है, "राजेन्द्र बाबू का अल्पसंख्यकों को आश्वासन", यह आजाद भारत का पहला आश्वासन है। इसमें भारत के राष्ट्र के रूप में विकसित होने की मूलभावना परिलक्षित होती है। संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते उन्होंने अल्पसंख्यकों को आश्वस्त किया था कि भारत में उनके साथ समान और न्यायपूर्ण व्यवहार किया जाएगा।
गौरतलब है कि उस दिन जो शपथ सदस्यों ने ली, उसको पं. जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्तुत किया, मुस्लिम लीग के चौधरी खलीक्ज्जाम ने प्रस्ताव का अनुमोदन किया और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उस प्रस्ताव का समर्थन किया था। पं. नेहरू के उस दिन के अद्भुत भाषण से तो हम सभी परिचित हैं। गौतलब है डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने महात्मा गांधी के बारे में कहा था, "हम महात्मा गांधी, जो कि पिछले तीस वर्षों से भी अधिक से हमारे प्रकाश पुंज, हमारे मार्गदर्शक और दार्शनिक रहे हैं, को भी अपना स्नेह और श्रद्धा अर्पित करते हैं।"
भारत के लिये यह वास्तव में बेहद अफसोस की बात थी कि महात्मा गांधी ने इस समारोह में आने और कोई संदेश देने तक से इंकार कर दिया था।
अखबार में एक लेख राष्ट्रपिता (Father of Nation) शीर्षक से महात्मा गांधी पर छपा है। यह उनके तीस साल के संघर्ष का लेखा जोखा भी है और लेख के अंत में वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कथन है कि, “राजनीति में अहिंसा अब एक खूबसूरत सपना भर नहीं है बल्कि यह खुबसूरत सपना अब सच हो गया है। परमाणु बम वाले इस प्राणघातक दौर में गाँधी विचार ही विश्व के लिए उम्मीद हैं।"
इस अंक के तमाम लेख भारत की स्वतंत्रता संग्राम की अहिंसक क्रांति को एक आदरणीय आश्चर्य की तरह से देख रहे थे। अमेरिकन के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ ईमेन्युअल सेलर ने अपने संदेश में कहा था कि भारत ही दुनिया को रास्ता दिखाएगा। साथ ही उन्होंने भारत के तत्कालीन नेताओं को “आधुनिक अशोक” की संज्ञा दी थी।
दि हिन्दू ने जिस तरह से पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर कराची में हुई गतिविधियों को समेटा उससे साफ जाहिर होता है कि तत्कालीन भारतीय प्रेस में असाधारण सहिष्णुता थी और प्रथम पृष्ठ पर समानांतर दोनों राष्ट्रों के उदय की संतुलित रिपोर्टिंग पर यदि वर्तमान भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया गौर करे तो उसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान की गई अपनी रिपोर्टिंग की सड़ांध स्पष्ट नजर आ जाएगी। प्रथम पृष्ठ पर ही दोनों देशों के पहले मंत्रीमंडल की सूची भी है। गौर करिए इस सूची में भारत के पहले कानून मंत्री डॉ. भीम राव अम्बेडकर हैं और पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री का नाम है जोगेंद्र नाथ मंडल, जिन पर कानून के साथ ही साथ शिक्षा, सार्वजनिक कार्य, खनन और ऊर्जा मंत्री का भार भी था। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों देशों के पहले कानून मंत्री दलित समुदाय से ही थे।
भारत का स्वतंत्रता दिवस इसलिये और भी महत्वपूर्ण हो गया था क्योंकि भारत की स्वतंत्रता की घोषणा स्वयं भारत की संविधान सभा ने की थी, ब्रिटिश सम्राट ने नहीं। इसी सभा ने लॉर्ड माउंटबैटन को भारत का पहला गवर्नर जनरल भी नियुक्त किया था। दुनिया भर के नेताओं, बुद्धिजीवियों, लेखकों ने भारत की स्वतंत्रता में मानवता के लिए बेहतर भविष्य की संकल्पना की थी। समाचार पत्र में छपा प्रत्येक संदेश दर्शाता है कि भारत से तत्कालीन विश्व को कितनी उम्मीदें लगी हुई थीं।
आज अस्सी बरस बाद हमें पुनरावलोकन करना चाहिए कि हम क्या उन उम्मीदों पर खरे उतरे? यदि नहीं उतरे तो क्यों नहीं? साथ ही यह भी विचारणीय है कि भारत से इतनी उम्मीदें क्यों थीं? इसकी सबसे बड़ी वजह थी एक दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्र का मुकाबला, दुनिया के सबसे कमजोर लोग अपनी दिव्य आंतरिक शक्ति, जिसका अहसास महात्मा गांधी ने "अहिंसा" के रूप में कराया था, के माध्यम से कर रहे थे।
प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता पी. सी. जोशी ने लिखा था “कम्युनिस्ट पार्टी का यह दृढ़ विश्वास है कि महान संघर्ष अभी अंतिम मुकाम तक नहीं पहुँचा है और हम ठहरकर आराम नहीं कर सकते। वास्तविकता तो यह है कि (संघर्ष का) सबसे निर्णायक और गंभीर काल अब शुरू हुआ है।" वे भारत के डामिनियन (स्वशासी) से स्वतंत्र राष्ट्र तक की यात्रा में आने वाली कठिनाइयों पर प्रकाश डाल रहे थे। साथ ही भविष्य की आर्थिक नीतियां भी उनकी चिंता का विषय थीं।
श्री द्वारका दास का आलेख भारतीय राजाओं को परोक्ष चेतावनी भी देता दिखाई देता है। उनकी निगाह में भी संविधान की पूर्णता तक का सफ़र काफी कठिनाइयों भरा हो सकता है। दि हिन्दू के लंदन संवाददाता लियोनार्ड मेटर्स का लेख "एक राष्ट्र का पुनर्जन्म : भारतीय प्रेस की देशभक्ति" से तब के समाचार पत्रों, संपादकों और प्रकाशकों की जिजीविशा का पता चलता है।
कृष्णा हठी सिंह का आलेख नेहरू परिवार के संघर्ष की सुंदर व्याख्या करता है। वहीं फ्रेडेरिक ग्रस लिखते हैं कि "अब भारत को यह दर्शाना होगा कि उसे अपने पुरखों पर गर्व है और वह अपनी अजन्मी पीढ़ी के प्रति वचनबद्ध है कि उनकी स्वतंत्रता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता।" वे लिखते हैं कि, “जिन्ना को एक दिन विभाजन को लेकर पछतावा जरूर होगा।" एक लेख "डॉ. बेसेंट और भारत की स्वतंत्रता" में उनके "होमरूल" संघर्ष की बात, उन्हें याद करते हुए कही है।
आजाद हिंद फौज के मेजर जनरल एस. जी. अलगप्पन का आलेख, "नेताजी बोस और इंडियन नेशनल आर्मी" पूर्व एशिया के सभी स्वतंत्रता संग्रामों के साथ ही साथ सुभाष चंद्र बोस के योगदान पर बेहद बारीकी से जांच करता है। लेख में उल्लेख है युद्ध की घोषणा के बाद नेताजी गांधी जी और भारतीय नागरिकों को संबोधित करते हुए कहते हैं, "हमारे राष्ट्रपिता, इस कठिन दौर में हमें आपके आशीर्वाद और मार्गदर्शन की आवश्यकता है।" यह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की विभिन्न धाराओं के एकरस होने का प्रमाण भी है।
डॉ. एस. पट्टाभी सीतारमैया का आलेख महात्मा गांधी के आगमन से पहले और उनके आगमन के बाद की राजनीति और कांग्रेस पर बेहतरीन टिप्पणी है। श्री अरबिंदो ने "स्वतंत्र भारत के भविष्य" के रूप में अपने सन्देश में इसे सिर्फ भारत ही नहीं, पूरे एशिया और विश्व के लिए एक नई शुरुआत बताया। वे भारत की स्वतंत्रता को मानवता के एकीकरण से भी जोड़ रहे थे। उनका मानना था कि भारत ने विश्व को आध्यात्मिक उपहार देना आरंभ भी कर दिया है। अंत में उन्होंने कहा था, यह नए और स्वतंत्र भारत पर निर्भर करता है कि वह स्वतंत्रता के उद्देश्यों को किस तरह से और कितनी शीघ्रता से पूरा करता है।
वहीं के. एम. पणिक्कर का आलेख "केंद्र एवं राज्य", भारत में विलय के महत्व को रेखांकित कर रहा था। वहीं नोबल पुरस्कार प्राप्त सी. वी. रमण "नए भारत में विज्ञान" में लिखते हैं कि, “मैं अत्यंत दुख के साथ लिख रहा हूँ कि, भारत अभी भी विज्ञान के क्षेत्र में आजाद नहीं हुआ है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत के कमजोर लोगों पर अपने को थोपा है। कुछ वर्ष पहले मैंने “अमेरिकन पोलिटिकल साइंस क्वाटरली में लिखा था कि किस तरह से विदेशी शासन ने पिछली एक शताब्दी से विज्ञान के क्षेत्र में भारत के पुर्नाआगमन को रोके रखा है।"
इसी क्रम में टी. टी. कृष्णामचारी का आलेख "फाइनेंस ऑफ यूनियन" बेहद विस्तार से भारत के भविष्य की वित्तीय योजना पर प्रकाश डालता है। आर्थर मूरे अपने लेख "भारत शांति का मार्ग प्रशस्त करे" में पाकिस्तान के साथ बेहतर तालमेल की अनिवार्यता पर जोर दे रहे थे। उनका लेख एक बेहद सकारात्मक टिप्पणी करता है कि, “समस्याएं समाधान का इंतजार कर रही हैं।" वहीं बी. कुमारप्पा का आलेख, “गांधी विचार का क्रियान्वयन” में अहिंसा के भविष्य पर बेहद रोचक बातें कही गई हैं।
डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का आलेख पिछले करीब 70 बरसों के स्वतंत्रता संघर्ष को जैसे जीवंत बना देता है। प्रसिद्ध लेखक एवं भारतीय कला मर्मज्ञ आनंद कुमार स्वामी अपने आलेख, "भारतीय संस्कृति का पुनर्जागरण" भविष्य में आने वाले सांस्कृतिक तूफानों के प्रति सचेत करते हुए "समानता", "लोकतंत्र", "विकास" और "साक्षरता" को भविष्य के स्तंभ के रूप में निरूपित करते हैं। इसके अलावा बहुत अन्य लेख, टिप्पणियाँ और समाचार दर्शाते हैं कि एक नए राष्ट्र का उदय किस तरह से समारोहित किया जाना चाहिए।
दि हिन्दू का यह अंक दरअसल हमको यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि "भारत" नामक नवगठित राष्ट्र से कितनी अपेक्षाएं देश के नागरिकों और पूरे विश्व को थीं। यह एक चमत्कार ही था कि भारत ने गुलामी के बावजूद ब्रिटेन के खिलाफ कटुता को अपने मन से निकाल दिया था। उस दिन अखबार में छपे विज्ञापन भी उम्मीद जगाते हैं। अरेबियन नाइट का विज्ञापन बताता है "रमजान और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस” पर रिलीज फिल्म “अरेबियन नाइट्स" हिन्दी में ऐसे तमाम विज्ञापन बेहद गरिमामय ढंग से भारत की आजादी पर अपनी खुशी दर्शा रहे थे। कोलगेट, रिबन डेंटल क्रीम (टूथपेस्ट) के विज्ञापन के खुलेपन को देखकर आज भी कान गरम हो जाएंगे। भारत के साथ अमेरिकी कंपनियों के विज्ञापन भी आश्चर्यचकित करते हैं। इन्हीं विज्ञापनों से पता चलता है कि तब कागज पर “कंट्रोल” होने से सीमित प्रकाशन ही संभव था।
महात्मा गांधी ने भारत के विभाजन को "आध्यात्मिक दुर्घटना" कहा था। एक चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था, "मैंने अपने लोगों से कह दिया है कि वे फ़ौज और पुलिस पर निर्भर न रहें। तुम्हें लोकतंत्र स्थापित करना है और फ़ौज तथा पुलिस पर निर्भरता लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाती।"
आज की परिस्थिति हमारे सामने है। करीब अस्सी बरस पहले प्रकाशित अखबार हमें समझा रहा है कि आजादी के संघर्ष के साथ जुड़े सपने अभी पूरे नहीं हुए हैं। लुई फिशर गांधी जी के बारे में लिखते हैं, "पागल बने हुए मनुष्यों में अब गाँधी जी देवत्व की खोज करने लगे।“ यही गाँधी और भारतीय संस्कृति की निरंतरता की विशेषता है, जो इसे इतिहास नहीं बनने देती।"
अंत में 15 अगस्त 1947 को प्रकाशित इस विशिष्ट समाचार पर गौर करें। शीर्षक है, "प्रश्नपत्रों की कथित चोरी : आरोपी दोषमुक्त" इसमें एक प्रिंटिंग प्रेस के जो वस्तुतः समकालीन ही लगता है। कर्मचारियों पर एस.एस.एल.सी. और इंटरमीजिएट परीक्षाओं के प्रश्नपत्र चुराने का आरोप लगाया गया था। क्या इस निरंतरता को हम कभी रोक पाएंगे?
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।
(लेखक चिन्मय मिश्र मध्य प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।)




