भाषा नहीं, मुद्दों पर बात कीजिए
हमारी वर्तमान व्यवस्था ने युवाओं के हाथ में निर्माण के औज़ार दिए ही नहीं इसलिए वह सिर्फ बड़ा और निराश होता गया। परंतु अब युवाओं ने ऐसे बड़े होने से इंकार किया और अपना औज़ार स्वयं तलाशा। उन्होंने उस भाषा का पुर्नअविष्कार किया जिसमें परिवर्तन ला पाने की शक्ति है।
अफ़जल, पवन पुरब से आयकर, पहाड़ दिया गिराय,
पपिल कुंजर ले उड़ी, सागर दियो सुखाय।
अफ़जल साहब
(निमाड़ी निर्गुण संत)
भारतीय संत परंपरा में कबीर एकमात्र संत कवि नहीं हैं, जिन्होंने उलटबांसी रची। अफजल साहब ने अब से दो शताब्दी पहले मध्य प्रदेश के निमाड़ स्थित बड़वानी शहर में रहकर अनुपम संतवाणी की रचना की थी। परंतु उलटबांसी पर अब सिर्फ संतों या कवियों का ही विशेषाधिकार नहीं है। भारत के राजनीतिज्ञों को भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महारत है। तभी तो प्रधानमंत्री ने भारत के युवाओं को न मालूम किन अज्ञात कारणों से "माफ़" कर दिया।
देर रात उन्होंने अपनी "फ्रेंड" जमात को संबोधित किया और उनकी आत्मा प्रसन्न कर उन्हें अभयदान प्रदान कर दिया। उन्होंने अपना संबोधन इंस्टाग्राम के माध्यम से दिया जो आजकल युवाओं से संवाद और संप्रेषण का सबसे प्रभावशाली माध्यम माना जा रहा है। सन 1970 के दशक में मार्शल मैकहुआन ने कहा था Medium is the Mass age, माध्यम ही संदेश है। यह उनकी मीडिया पर लिखी पुस्तक का शीर्षक भी है, और इसमें वे समझा रहे हैं, कि माध्यम किस तरह दुनिया के लोगों को प्रभावित और संचालित करता है और अंततः पर्याय बन जाता है। साठ साल बाद भी उनकी बात सही साबित हो रही है।
नीट परीक्षा में हुई धांधली और भ्रष्टाचार के बाद युवाओं की आत्महत्याओं ने भारत के सामाजिक वातावरण को झकझोरा और अंततः यह निष्कर्ष सामने आया कि राजनीति से अलगाव अंततः घातक सिद्ध हो रहा है। यहीं जयप्रकाश नारायण के कथन पर गौर करते हैं। उनके अनुसार "क्रांति को कोई क्रांतिकारी नेता पैदा नहीं करता है। क्रांति को न लेनिन ने पैदा किया, न माओ ने और न गांधी ने। क्रांति परिस्थितियों में से निर्माण होती है। क्रांतिकारी नेता की पहचान यह है कि वह परिस्थिति की नब्ज़ को पहचान लेता है।"
तो जंतर-मंतर में जो घटा उसकी खदबदाहट भारतीय समाज में लंबे समय से विद्यमान थी। जरूरत उसमें उबाल लाने वाली ऊर्जा के समावेश की थी और नीट धांधली ने वह उबाल ला दिया और विस्फोट हो गया। हमारी पिछली पीढ़ी की बदलाव के प्रति अन्यमनस्कता उसके इस विश्वास में थी कि "अच्छे दिन आने वाले हैं।" परंतु हुआ उल्टा और वस्तुतः दिन में अंधेरा छा गया। भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वतंत्र अध्ययन बताते हैं कि भारत में 15 से 25 वर्षों के युवाओं में बेरोजगारी दर 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है और 25 से 29 वर्षों के युवाओं में यह 20 प्रतिशत तक है। ऐसे में कब तक धैर्य और उससे भी ज्यादा "शालीनता" के साथ धैर्य रखा जा सकता है?
प्रधानमंत्री, सत्ता के भागीदार और थके हुए बुजुर्ग आंदोलन में प्रयुक्त भाषा को लेकर अपनी-अपनी थकी ऊर्जा के माध्यम से ठंडा विरोध कर रहे हैं। वे मूल मुद्दे पर बात नहीं कर रहे कि इस विस्फोट के पीछे की मुख्य वजहें क्या हैं।
रघुवीर सहाय लिखते हैं,
"बड़ा हो रहा है लड़का,
उन औज़ारों के बिना,
जिसमें वह बनाता और तोड़ता हुआ बड़ा होता,
वह सिर्फ बड़ा हो रहा है।"
हमारी वर्तमान व्यवस्था ने युवाओं के हाथ में निर्माण के औज़ार दिए ही नहीं इसलिए वह सिर्फ बड़ा और निराश होता गया। परंतु अब युवाओं ने ऐसे बड़े होने से इंकार किया और अपना औज़ार स्वयं तलाशा। उन्होंने उस भाषा का पुर्नअविष्कार किया जिसमें परिवर्तन ला पाने की शक्ति है। गालियां और अशालीन शब्द इस संघर्ष में महज अपवाद हैं। वास्तविकता तो यह है कि युवा पीढ़ी ने अपने बौने बने रहने से इंकार किया। बहुत वर्षों बाद युवाओं की भाषा में तंज़, विनोदवृत्ति और तीखा व्यंग्य नज़र आया और उसने इससे पूरे सत्ता प्रतिष्ठान और उनके हमसफ़रों को न सिर्फ अचंभित बल्कि शर्मिंदा भी किया। उन्होंने अपने मुहावरे गढ़ने शुरू किये और बता दिया कि उनकी उसमें महारत है। भारत के "हम लोग" वस्तुतः चाहते क्या थे?
पुनः रघुवीर सहाय को याद करते हैं,
"इसलिए कहूँगा मैं,
मगर मुझे पाने दो,
पहले ऐसी बोली,
जिसके दो अर्थ न हों।"
समाज को गुलाम या अधीन बनाए रखने के लिये अनिवार्य होता है कि उससे उस भाषा में संवाद किया जाए जिसमें वह सहज न हो। यह परिपाटी रोमन साम्राज्य में भी विद्यमान थी और भारत में संस्कृत, अरबी, फारसी और आगे अंग्रेजी के माध्यम से शासन करती आई। स्थितियों में थोड़ा सुधार आया तो सही परंतु उसका स्थान ऐसी भाषा ने ले लिया जो सिर्फ अतिशयोक्ति में ही अभिव्यक्त हो रही थी। सहज भाषा में उसे "जुमलेबाजी" भी कह सकते हैं। परंतु भारतीय युवा इस चालाकी को समझ गया और उसने एक ऐसी भाषा में जवाब दिया, जिससे शासक वर्ग कमोवेश अपरिचित था।
यह भाषाई आक्रमण उन्हें भयभीत और हतप्रभ कर गया। हमारे विश्वविद्यालयों ने तो नैतिकता और ईमानदारी तो दूर की बात है, छात्रों को भाषा सिखाना ही बंद कर दिया। उनकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति और सामाजिक सहभागिता, को कमोवेश अपराध की श्रेणी में ला दिया। ऐसे में जो होना था वही हुआ।
अरुंधति रॉय कहती है, "मैं सोच भी नहीं पाती हूँ कि युवा लोगों ने कभी भी किसी सार्वजनिक हस्ती का इतनी निर्दयता से मजाक उड़ाया होगा।" तो विचारणीय यह है कि यह निर्दयता युवाओं में एकाएक कैसे उभरी? याद रखना होगा कि जितना उन्हें दबाने का प्रयास किया जाएगा, मुखरता उतनी ही तीव्र और कटु होती जाएगी।
जंतर-मंतर पर हुए बलप्रयोग के पंद्रह दिन बाद तक प्रधानमंत्री और गृह मंत्री न तो संसद के सत्र में नज़र आए और न ही उनकी ओर से किसी वक्तव्य या संवाद की बात ही सामने आई। यह दुखद स्थिति है। एक ओर जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आपातकाल के अपने अनुभव से सीखने की प्रक्रिया में है और राहुल गाँधी सहित सभी कांग्रेसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अवसरों की समानता सहित शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में हुए असाधारण, असामान्य और अनैतिक निजीकरण के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वहीं सत्ताधारी दल आपातकाल को शायद आदर्श मानने की भूल कर रहा है।
तब जयप्रकाश नारायण ने कहा था, "आज एक ही व्यक्ति के हाथ में लगभग सारी सत्ता केंद्रित होती जा रही है और सारे ढांचे को ऐसी मजबूती के साथ कसा जा रहा है कि कोई किसी तरह की चू-चपड़ न कर सके। राज्यों के मुख्यमंत्रियों की हैसियत पटवारी सी बना दी गई है।" आज क्या इसकी पुनरावर्ती नहीं हो रही है तथा उसी के समानांतर ठीक वैसे ही छात्र असंतोष में भी उभार आ रहा है। तो बात उठती है कि क्या सरकार परिस्थितियों का आकलन नहीं कर पा रही है? या वह कुछ निश्चय कर चुकी है कि उसे अंत में क्या करना है। गौरतलब है, आपातकाल के पहले और बाद के कटु राजनीतिक संघर्ष के बावजूद, जयप्रकाश नारायण के लिये इंदिरा गांधी “इंदु” ही थीं।
महात्मा गाँधी दो बेहद महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाते हैं। पहली "किसी भी बात को वेदवाक्य मत मानो, भले ही वह किसी महात्मा ने क्यों न कही हो, जब तक कि वह तुम्हारे मस्तिष्क और हृदय को न जंचे।" इसी के साथ वह एक और बड़ी मजेदार बात कहते हैं, "जब आप बदलाव की बात करते हैं तो सबसे पहले लोग आपकी अनदेखी करते हैं, फिर आप पर सवाल उठाते हैं, फिर आपसे लड़ते हैं और अंत में आपके पीछे आ जाते हैं।"
वर्तमान दौर में भारतीय समाज की यही स्थिति है। वह तीसरे क्रम यानी लड़ने पर आ गया है अब बारी है पीछे आने की या समझ के विकसित होने की। जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन ने सांप्रदायिकता के साथ ही साथ लिंगभेद वाली मानसिकता से भी टक्कर ली है। यह एक सुखद परिणाम है। अभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख युवाओं से बात करने को तत्पर हुए हैं। उस संवाद की विषयवस्तु को लेकर काफी जिज्ञासा है। परंतु सवाल राजनीतिक शुचिता और नैतिकता का है।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, "गाँधी ने सिद्ध कर दिया है कि केवल प्रचलित चालबाजियों और धोखाधडियों के मक्कारी भरे खेल के द्वारा ही नहीं, बल्कि जीवन में नैतिकतापूर्ण श्रेष्ठतर आचरण के प्रबल उदाहरण द्वारा भी मनुष्यों का एक बलशाली अनुगामी दल एकत्र किया जा सकता है।" क्या भारतीय समाज में नैतिक लामबंदी की राह की बाधाएं दूर होने की उम्मीद की जा सकती है?
समाज में व्याप्त असंतोष और बेचैनी को जबानी जमाखर्च और वाक्चातुर्य से हल नहीं किया जा सकता। ऐसा करना अफ़जल साहब की उलटबांसी के हिसाब से कहें तो,
"अफ़जल, मीन-चली चुगन कु, सुई किया अहार,
चूहे ने बिल्ली खाई, ये कयसी चली बयार।"
इसलिए भाषा की शालीनता और अशालीनता की आड़ लेकर वास्तविक समस्याओं की ओर से ध्यान हटाना अब कारगर सिद्ध नहीं होगा। असंतोष कभी किसी एक उम्र पर आकर अटकता नहीं है। देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों में कम संख्या में ही सही, परंतु प्रत्येक आयुवर्ग के नागरिक शामिल हुए और मध्यमवर्गीय परिवारों के आँखों की पट्टी भी शायद अब खुलने लगी है। प्रधानमंत्री ने युवाओं के लिये भले ही माफ़ी की रील जारी कर दी हो। परंतु उनके सहित हम सबको रघुवीर सहाय की इस हिदायत को याद रखना चाहिए,
"सारे अधूरे काम
नई पीढ़ी करती है,
अपने पिता को माफ,
नई पीढ़ी करती है।"
नई पीढ़ी को सलाम
(लेखक चिन्मय मिश्र मध्य प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।)




