चीन ने चावल के बाद भारतीय मिर्चों की खेप लौटाई, सीमा से अधिक मिले मेथामिडोफोस नामक रासायनिक पदार्थ

चावल के बाद चीन ने भारतीय मिर्च की खेपों को भी रिजेक्ट कर 3 निर्यातकों को सस्पेंड कर दिया है। मिर्च में प्रतिबंधित मेथामिडोफोस केमिकल मिलने का दावा किया गया है।

Updated: Jun 11, 2026, 08:16 PM IST

भारत और चीन के बीच कृषि व्यापार को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। चीन ने भारतीय मिर्च की कई खेपों को अस्वीकार कर दिया है। उनका कहना है कि उनमें मेथामिडोफोस नामक रासायनिक पदार्थ निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में पाया गया है। इसके साथ ही चीन ने भारत के तीन निर्यातकों को निलंबित भी कर दिया है। यह रसायन भारत में किसानों के उपयोग के लिए अनुमोदित नहीं है और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं से जोड़ते हैं। इस कदम ने भारतीय मसाला निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसा इसलिए क्योंकि चीन भारतीय मिर्च का सबसे बड़ा खरीदार माना जाता है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पिछले महीने भी चीन ने तीन भारतीय कंपनियों द्वारा भेजी गई गैर बासमती चावल की 70 खेपों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। उस समय चीनी अधिकारियों ने आनुवंशिक रूप से संशोधित (GMO) चावल से जुड़े मुद्दों का हवाला दिया था। जबकि, भारतीय निर्यातकों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे एक तरह का ट्रेड वॉर बताया था।

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दक्षिण एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के संस्थापक निदेशक भागीरथ चौधरी के अनुसार, हाल के महीनों में चीन खाद्य सुरक्षा मानकों को लेकर अधिक सख्ती बरत रहा है। उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादों के आयात में कीटनाशक अवशेषों और जीएमओ से जुड़े नियमों की पहले की तुलना में अधिक कड़ी जांच की जा रही है। इसका सीधा असर भारतीय निर्यात पर भी दिखाई दे रहा है।

भारत से चीन को मुख्य रूप से तेजा किस्म की मिर्च का निर्यात किया जाता है। जिसकी वहां भारी मांग रहती है। चीन हर साल लगभग 1.5 लाख से 1.9 लाख टन भारतीय मिर्च खरीदता है। वित्त वर्ष 2024-25 में चीन को भारतीय मिर्च का निर्यात 2.36 लाख टन से अधिक रहा था। जबकि, इसी अवधि में भारत का कुल वैश्विक मिर्च निर्यात लगभग 7.6 लाख टन था। इस वजह से चीनी बाजार भारतीय मिर्च निर्यातकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में पिछले दो सालों के दौरान कम कीमतों पर बड़े पैमाने पर मिर्च खरीदने के कारण वहां पर्याप्त भंडार जमा हो गया है। माना जा रहा है कि इसी वजह से आयात की रफ्तार धीमी हुई है। हालांकि, जिन मिर्च खेपों को अस्वीकार किया गया है उन्हें वापस नहीं भेजा गया है। इसके बजाय उनके मूल्य को लेकर दोबारा बातचीत की जा रही है। जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए बाजार पहुंच और व्यापारिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।

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भारतीय मसाला उद्योग पहले से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है। यूरोपीय देशों में भारतीय मसालों विशेषकर मिर्च की अस्वीकृति दर पिछले कुछ सालों में 5 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। फेडरेशन ऑफ इंडियन स्पाइस स्टेकहोल्डर्स के अध्यक्ष अश्विन के. नायक ने कहा था कि कीटनाशक अवशेषों के कारण होने वाली अस्वीकृतियां भारतीय निर्यात पर प्रतिकूल असर डाल रही हैं। इसके चलते कई उत्पादकों को नए बाजार तलाशने पड़ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में जैविक और कीटनाशक मुक्त मसालों की बढ़ती मांग भारतीय किसानों और निर्यातकों के लिए नई चुनौती बन रही है। इसके अलावा 2020-21 में गलवान संघर्ष और कोविड 19 महामारी के बाद चीन को होने वाले मसाला निर्यात की रफ्तार भी प्रभावित हुई थी।

भारत और चीन के व्यापारिक संबंधों में यह तनाव ऐसे समय बढ़ रहा है जब दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन लगातार बढ़ता जा रहा है। साल 2010-11 में जहां भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 37 अरब डॉलर था। वहीं, अब यह 110 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। इसके बावजूद भारत ने प्रेस नोट 3 में संशोधन कर चीनी निवेश के लिए कुछ रास्ते आसान किए हैं। 

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दूसरी ओर भारत में चीन से आयात भी पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ा है और 2003-04 के लगभग 3 अरब डॉलर से बढ़कर 2019-20 में 65.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। कृषि क्षेत्र के अलावा औद्योगिक मोर्चे पर भी भारत को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन कुछ महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों को अपनी रणनीतिक सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है। ऐसे में भविष्य में भारतीय कंपनियों के लिए चीन से महत्वपूर्ण कच्चे माल और क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।