छात्र आंदोलन: हम चुनेंगे साथी, जिन्दगी के टुकड़े

संसद भवन की ओर कूच करते हुए जिस तरह की हिंसा का सामना अहिंसा और शांति से किया गया, वह बेहद उम्मीद भरे भविष्य की ओर इशारा करता है। पिटता हुआ युवा खड़ा हो जाता है और जब हाथ जोड़कर पुलिस सिपाही से कहता है कि मुझे मारो! तो यह सिर्फ आक्रोश नहीं है, यह सत्याग्रह की किरण का फूटना भी है।

Updated: Jul 23, 2026, 11:53 AM IST

"लोकतंत्र और हिंसा एक साथ चल ही नहीं सकते। जो राज्य आज केवल नाम के लिए ही लोकतांत्रिक हैं, उन्हें या तो खुले तौर पर सत्ताधारी राज्य बन जाना चाहिए। अथवा यदि वे सच्चे अर्थ में लोकतांत्रिक बनना चाहें तो हिम्मत के साथ उन्हें अहिंसक बन जाना चाहिए। यह कहना अविचारपूर्ण है कि केवल व्यक्ति ही अहिंसा का आचरण कर सकते हैं, राष्ट्र कभी नहीं....जो व्यक्तियों के ही बने होते हैं।"
-- महात्मा गांधी (12-11-38)

दिल्ली में जंतर-मंतर में जो हुआ और जो हम सबने देखा भी, वह वास्तव में भारत के लोकतंत्र के लिए एक दुःस्वप्न ही था। हज़ारों-हज़ार युवा, बच्चे, लड़के, लड़कियाँ, बड़े-बूढ़े, राजनीतिक-गैर राजनीतिक, धार्मिक-नास्तिक, सवर्ण-दलित, उत्तर भारतीय-दक्षिण भारतीय, पूर्वी भारतीय-पश्चिमी भारतीय, सबकी अच्छे से पिटाई हुई। सामान्य बातचीत, तथ्यों आदि से तो इस वर्तमान व्यवस्था (सरकार) के प्रति मोह नहीं छूट रहा था, शायद अब डंडे की मार या आँसू गैस से भारतीय समाज की आँखें खुल जाएँ। 

प्रदर्शन के दौरान एक युवा के हाथ में पोस्टर था, "They tried to bury us. They didn't know we are seeds! यानी वे हमें गाड़ना चाहते थे। परंतु वे नहीं जानते कि हम तो बीज हैं।“ पंजाबी कवि पाश ने कहा है, "मैं घास हूँ/ मैं आपके हर किये धरे पर उग आऊँगा।" यह आंदोलन काकरोच जनता पार्टी ने शुरू किया, सोनम वांगचुक ने इसे एक नया आयाम दिया। सोनम एक क्षण को थोड़ा ठिठकते नजर भी आए लेकिन तब तक यह अंदोलन सर्वव्यापी हो गया था और किसी के भी पास वापस लौटने का मौका नहीं बचा था।

सरकार के हाथ में लाठी थी और बच्चों/युवाओं में हिम्मत। उनके रोते होंठ कह रहे थे, "किसी भी धर्म का कोई ग्रंथ/ मेरे जख्मी होंठ की चुप से/ अधिक पवित्र नहीं है।(पाश)” रोते हुए बच्चे डरे हुए नहीं थे, वे गुस्सा थे। उन्हें दर्द चोट से नहीं अपने विश्वास के टूटने का था। तभी तो वह छोटी सी पहली बार वोट देने वाली लड़की कह रही थी कि उसने इन्हें (भाजपा-मोदी) को वोट देकर बड़ी गलती की है और वह अब कभी उन्हें वोट नहीं देगी। 

छोटी-छोटी लड़कियाँ रोते-रोते शिकायत कर रही थीं कि हमने तो पुलिस वालों को नहीं मारा तो उन्होंने हमें क्यों मारा? वे अब तक मानवता और निरंकुशता में अंतर नहीं जानती थीं, अब जान गई हैं। वहीं पास में ही स्थित राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की छत पर खड़े लोग यह सब देख रहे थे। ज़ाहिर है वे कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे, क्योंकि उनके पास लिखित में शिकायत नहीं आई थी और वे आँखों पर नहीं, दस्तावेजों पर विश्वास करते हैं। और उनकी ही क्या बात करें, न्यायालय भी कह रहा है, “हमें इसमें मत घसीटो”। ठीक कह रहा है, वे भी निर्णय देंगे, हस्तक्षेप नहीं करेंगे। भले ही आम जनता को सड़कों पर घसीट कर मारा जा रहा हो या उनके सिर, हाथ, पैर क्यों न तोड़े जा रहे हों।

दरअसल, भारत की वर्तमान परिस्थिति यह समझा रही है कि संवैधानिक संस्थाओं से उम्मीद रखना शायद अब मुश्किल होता जा रहा है। हमारी एक बड़ी गलतफहमी यह भी है कि हम यह मानने लगे हैं कि राजनीति के माध्यम से परिवर्तन नहीं आ सकता। परंतु जो कुछ भी सकारात्मक होना है, वह वहीं से संभव है। अतः राजनीति को बदलना होगा। संसद भवन की ओर कूच करते हुए जिस तरह की हिंसा का सामना अहिंसा और शांति से किया गया, वह बेहद उम्मीद भरे भविष्य की ओर इशारा करता है। पिटता हुआ युवा खड़ा हो जाता है और जब हाथ जोड़कर पुलिस सिपाही से कहता है कि मुझे मारो! तो यह सिर्फ आक्रोश नहीं है, यह सत्याग्रह की किरण का फूटना भी है। 

पाश ने भी सिपाही से पूछा था, "सिपाही बता, मैं तुम्हें भी/ इतना खतरनाक लगता हूँ/ भाई सच बता, तुम्हें/ मेरी छिली हुई चमड़ी/ और मेरे मुँह से बहते खून में/ कुछ भी अपना नहीं लगता?” शायद लगता होगा, शायद नहीं भी लगता होगा। उस भयानक मंजर में भी इन युवाओं ने अपना संतुलन नहीं खोया। वे जख्मी हाथ-पैर या फटे सिर से बहते खून में लिपटे हुए भी सवाल ही पूछ रहे थे कि ये हमें क्यों मार रहे हैं? उनकी मासूमियत पर गौर करिए, वे अभी सबको अपने जैसा ही मानते हैं। वे नहीं मानते कि उन्हें मारने वाला और वे स्वयं कोई अलग-अलग हैं। परंतु शासन और प्रशासन यह भूल गया है कि संविधान ने सबको बराबरी का हक दिया है। यदि एक को डंडा पकड़ने का अधिकार दिया तो सामने वाले को यह पूछने का अधिकार कि डंडा मारा क्यों जा रहा है?

अब सवाल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से बड़ा हो गया है। क्या गृह मंत्रालय अपने अधिकारों का इस तरह से एकतरफा प्रयोग कर सकता है? क्या प्रशासनिक तंत्र अपने विवेक का प्रयोग करना भूल चुका है? यदि ऐसा है तो पुलिस/प्रशासन के मुखिया का पद भी राजनीतिक कर दिया जाए। वहाँ जो इकट्ठा थे, वे अपने भविष्य के लिए वहाँ आए थे, किसी से संघर्ष या टकराव के लिए नहीं। वे नहीं जानते कि वर्तमान व्यवस्था में उनकी अहमियत महज़ एक वोट की है और यदि वे नहीं देंगे तो कोई और दे देगा या अंततः एस आई आर तो है ही। 

वहाँ का जमावड़ा जो कह रहा था “पाश” उसे बहुत पहले शब्द दे चुके थे “मैं कोई सफेदपोश/ कुर्सी का बेटा नहीं हूँ/ इस अभागे देश का भाग्य बनाते/ धूल में लथपथ हज़ारों चेहरों में से एक हूँ/ मेरे माथे से बहती पसीने की धारा से/ मेरे देश की कोई भी नदी बहुत छोटी है।" उस दिन दिल्ली में पसीने से आगे कुछ और बहने की स्थिति थी। वहाँ जो बहा उसे बार-बार बताने की जरूरत नहीं है।

जो बात वहाँ से उभरी वह सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं थी। यू.पी.एस.सी. की परीक्षा देने वाली लड़की ने कहा कि उसने तय कर लिया है कि वह अब यह परीक्षा नहीं देगी। उसका कहना था कि उस सर्वोच्च परीक्षा में सफलता पा लेने के बाद मुझे यदि यही करना है जो आज यहाँ हो रहा है तो इससे अच्छा है मैं अपने घर लौट जाऊँ। व्यवस्था से विश्वास खत्म होने का इससे “कठोर प्रमाण” दूसरा नहीं हो सकता। 

वास्तविकता यह है कि वर्तमान सरकार बच्चों और युवाओं से उनके सपने और कल्पनाएँ दोनों छीन लेना चाहती है। वे जंतर मंतर पर बैठे लोगों से भी संवाद नहीं करते और संसद में भी चर्चा नहीं करना चाहते। वे चाहते हैं कि जो भी हो वह सिर्फ उनकी शर्तों पर ही नहीं उनके निर्देशानुसार ही हो। परंतु वे भूल गए कि वो जो मान बैठे थे की अब यह देश भाषा खो चुका है, खासकर संवाद और सम्प्रेषण की तो यह उनकी भूल थी। उस व्यापक समूह में बहुत से बच्चे थे जो बोल या सुन नहीं सकते थे, वे संकेतों की भाषा में अपनी बात कह रहे थे, उनके चेहरे की खुशी और उनका आत्मविश्वास जो सम्प्रेषित कर रहा था, उसके सामने भाषा की ताकत भी फीकी थी। वे वहाँ गूँज रहे नारों का मुखर हिस्सा थे।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 भारत के सभी नागरिकों को वाक स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का, शांतिपूर्वक और निरायुध (बिना शस्त्र) सम्मेलन का और भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण (विचरण-घूमने) का अधिकार देता है। दिल्ली प्रशासन आम जनता के उपरोक्त सारे अधिकार एक आदेश निकालकर रद्द या स्थगित कर सकता है लेकिन वह जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए लोगों की वाजिब मांगों पर बात करने के लिए दूसरे पक्ष को बाध्य नहीं कर सकता? क्या भारतीय संविधान इसकी इजाजत देता है? क्या सत्ताधारी दल और उसकी सरकार को ऐसा मनमानी करने का अधिकार संविधान सम्मत है? 

जबकि संविधान की उद्देशिका हम, भारत के लोग, को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता की बात करती है। तो फिर सड़क पर खड़े इस समूह को अवसर की समता क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई। जिस संसद भवन में उनके ही द्वारा चुने प्रतिनिधि बैठते हैं उनसे मिलने के बदले लाठियाँ क्यों मिली हैं? वे तो बंधुता के साथ वहाँ खड़े थे तो फिर उनकी गरिमा को चूर-चूर क्यों किया गया? उन युवाओं के बारे में, बच्चों के बारे में सोचिए जो वहाँ रो रहे थे क्योंकि पुलिस ने उनके मोबाइल फोन तोड़ दिए थे। कितनी मुश्किल से उनके माता-पिता ने इसे खरीदने के लिए धन का जुगाड़ किया होगा। 

पाश ने यह भी कहा था,
"हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के कड़े टुकड़े।।"

छात्रों के समानांतर जो राजनीतिक दल इस मामले पर आवाज उठा रहे हैं, उनके साथ भी कोई अलग तरह का व्यवहार नहीं हो रहा है, ऐसा भी नहीं है। कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी नेता जब प्रधानमंत्री के आवास के बाहर शांतिपूर्ण धरना दे रहे थे, तो वहाँ भी कमोवेश वही हुआ जो जंतरमंतर से निकले छात्रों के साथ हुआ। राहुल गांधी की नाक से बहता खून और अन्य कई राजनीतिज्ञों को घसीटा जाना बता रहा है कि सत्ता का अहंकार अब चरम पर है। परंतु अब भारत की राजनीतिक और गैर राजनीतिक दोनों का मिलन कमोवेश अपरिहार्य हो गया है। 

राहुल गांधी पिछले लंबे समय से शिक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर अपनी बात रख रहे हैं। कोटा और देहरादून का उनका दौरा इसका प्रमाण है। सरकार यह कहकर अब अपना बचाव नहीं कर सकती कि इसका राजनीतिकरण किया जा रहा है। हमें यह समझना ही होगा कि बिना राजनीति को साथ लिए ऐसे जटिल विषयों का समाधान असंभव है। गांधी जी ने आजादी के बहुत पहले ही कह दिया था, आजादी के बाद के हमारे संघर्ष और भी कठिन होंगे क्योंकि तब हमें अपनी ही चुनी हुई सरकार से संघर्ष करना होगा। 

आज वही हो रहा है, देश को बढ़ती सांप्रदायिकता और भयावह आर्थिक असमानता के साथ ही साथ शिक्षा के व्यावसायिककरण और घटते अवसरों और बढ़ती बेरोजगारी का भी सामना करना पड़ रहा है। भारत की पैसठ प्रतिशत आबादी युवाओं की है और उनके सामने दीवार खड़ी है और सबकुछ जैसे रोक दिया गया है। 

राहत इंदौरी कहते हैं,
"राह में खतरे भी हैं लेकिन ठहरता कौन है
मौत कल आती है आज आ जाए डरता कौन है
तेरे लश्कर के मुकाबिल मैं अकेला हूँ मगर
फैसला मैदान में होगा कि मरता कौन है।"