खतरनाक होती है राजनीतिक चुप्पी

भारतीय गणतंत्र का मूलस्वरूप आज जिन विकट परिस्थितियों का सामना कर रहा है, वैसी स्थितियां अतीत में कभी भी सामने नहीं आई थीं

Updated: Jan 24, 2022, 03:03 PM IST

खतरनाक होती है राजनीतिक चुप्पी
Photo Courtesy: media india

कौन हमारे खिलाफ है यह हम इस बात से नहीं जानते वे क्या कह रहे हैं, बल्कि इसे उनके मौन, उनकी चुप्पी से समझते हैं।

मार्टिन लूथर किंग जू.

इस गणतंत्र दिवस पर देश को ‘‘अमर जवान ज्योति’’ के दर्शन का सौभाग्य नहीं मिलेगा। इस ज्योति को राष्ट्रीय रक्षा स्मारक में स्थित ज्योति में मिला दिया गया है। अमर जवान ज्योति कोई ओलंपिक मशाल नहीं है जिससे कि दूसरी मशाल को जलाकर दुनियाभर में घुमाया जाता है। वास्तविकता यह है कि इतिहास को न तो बदला जा सकता है, न नष्ट किया जा सकता है। यदि ऐसा संभव होता तो करीब 200 वर्षों के शासन में अंग्रेज भारत का नया इतिहास लिख देते। कोशिश के बावजूद वे ऐसा नहीं कर पाए। मुग़ल सम्राट औरंगजेब का राजपाट साढ़े बारह लाख वर्गमील में फैला था और 15 करोड़ लोग उसके राज्य के निवासी थे। जो उस समय की विश्व जनसंख्या का करीब 25 प्रतिशत था। अपने 88 वर्षों के जीवनकाल में से 50 साल उसने शासन किया। इस अवधि में वह न तो भारत का नया इतिहास लिख पाया और न ही गुरु गोविंद सिंह या छत्रपति शिवाजी के नाम को मिटाना तो दूर उनके मान सम्मान को कोई चोट पहुंचा पाया था। यह तय है वह भारत का राजा था और असीमित अधिकार उसके पास थे, लेकिन इतिहास ने उसके साथ कोई नर्मी नहीं बरती।

भारतीय गणतंत्र का मूलस्वरूप आज जिन विकट परिस्थितियों का सामना कर रहा है, वैसी स्थितियां अतीत में कभी भी सामने नहीं आई थीं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता के साथ ही साथ व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता की बात करती है। वर्तमान में इन मूल्यों में से शायद ही किसी पर अमल होता दिखाई दे रहा है। भारत में मानवीय मूल्यों और सांप्रदायिक एकता के खिलाफ जो मुहीम चल रही है, उस पर सरकार व शीर्ष प्रशासनिक तंत्र की चुप्पी हमें बता रही है, कि मार्टिन लूथर किंग क्यों मानते थे कि बोलने से ज्यादा चुप्पी या मौन कई बार बहुत अधिक संप्रेषणीय होता है और दूसरे पक्ष के इरादों को बिना कहे ही समझा देता है।

यह गणतंत्र दिवस हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा है। हरिद्वार में हुए सम्मेलन में जिस तरह से नरसंहार की बात को उठाया गया, उसके बाद सरकार का मौन रहना आश्चर्य का नहीं, शर्म का विषय है। सुल्ली डील्स में मुस्लिम महिलाओं की नीलामी को लेकर कार्यवाही नहीं होने या चुप्पी का परिणाम बुल्लीबाई के रूप में सामने आया। बुल्ली बाई जैसे घृणित व वीभत्स कांड पर सरकार का मौन उन लोगों को और मुखर कर गया जो अपनी कम उम्र के बावजूद धार्मिक उन्माद और नफरत से भरे हुए हैं। बुल्ली बाई को लेकर चुप्पी की परिणिति ‘‘क्लब हाउस’’ में हुई आपसी बातचीत की बजबजाती भाषा के रूप में सामने बाई। बलात्कार अब उनके लिए अपराध नहीं पुण्य का काम हो गया है। यह सब इसी वजह से हुआ कि सरकार की चुप्पी ने इन अमानुषों को मौका दिया और वे अपनी गंदगी का सार्वजनिक प्रदर्शन कर पाए। हमें याद रखना होगा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना का पहला शब्द सामाजिक न्याय है। क्या बिना सांप्रदायिक सौहार्द के सामाजिक न्याय की कल्पना भी की जा सकती है?

महात्मा गांधी ने अठारह रचनात्मक कार्यों को अपने दर्शन और भविष्य के भारत का आधार बनाया था। इन कार्यों में सबसे पहला है कौमी या सांप्रदायिक एकता, दूसरा अस्पृश्यता निवारण और तीसरा शराबबंदी। आज उपरोक्त तीनों ही आयामों पर भारतीय गणराज्य की जो स्थिति है वह किसी से भी छुपी नहीं है। उनका मानना था कि यदि भारत को भविष्य में संगठित व मजबूत बने रहना है तो उसके लिए सबसे आवश्यक है सांप्रदायिक एकता। वे जानते थे यदि भारत पुनः सांप्रदायिकता की आग में फस गया तो इसका एक बने रहना बहुत ही कठिन होगा। इसलिए उन्होंने नया शब्द दिया, ‘‘सर्वधर्म-समभाव’’।  वे कहते हैं कि सहिष्णुता जिसे अंग्रेजी में टालरेन्स कह सकते हैं वह उन्हें पसंद नहीं है। काका कालेलकर ने उन्हें सर्वधर्म-समादर शब्द सुझाया। इस पर उनका कहना था, ‘‘मुझे वह भी पसंद नहीं आया। दूसरे धर्मों को बरदाश्त करने में उनकी (धर्मों) कमी मान ली जाती है। आदर में मेहरबानी का भाव आता है। अहिंसा हमें दूसरे धर्मों के लिए समभाव, बराबरी का भाव सिखाती है। आदर व सहिष्णुता अहिंसा की नजर से काफी नहीं हैं। दूसरे धर्मो के लिए समभाव रखने के मूल में अपने धर्म की अपूर्णता का स्वीकार आ जाता है। और सत्य की आराधना, अहिंसा की कसौटी यही सिखाती है।’’

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परंतु आज समभाव की तो बात ही छोड़ दें तमाम लोग अब दूसरे धर्मों को लेकर अपनी उच्चता और उनकी हीनता की भावना से ओतप्रोत होते जा रहे हैं। हरिद्वार की घटना के बाद भी नफरत फैलाने वालों के मन में किसी भी किस्म का कोई डर पैदा ही नहीं हुआ। वे स्वयं को भारतीय संविधान और कानून से भी ऊपर मान रहे हैं। वे पुलिस व सेना को ललकार रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय को चुनौती दे रहे हैं तथा संविधान का मजाक उड़ा रहे हैं। ऐसे में गौर करने लायक यह है कि जो सरकारें अपनी आलोचना करने वालों तक को दुर्दांत कानूनों में जकड़ लेती हैं और वर्षों जमानत नहीं होने देतीं, वे आज मौन हैं। उनकी चुप्पी दर्शा रही है कि उनका मन्तव्य क्या है। जिस भी देश में सांप्रदायिकता फैली और बहुलतावाद को चोट पहुंचाई गई है, वे आज जिन परिस्थितियों में हैं, वह हमें समझा रही है कि यदि भारत को एक राष्ट्र के रूप में अपना गौरव बनाए रखना है तो उसे इस कोढ़ से मुक्ति पानी ही होगी। भारत में बढती सांप्रदायिक भावना को लेकर ब्रिटेन की संसद, संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार संगठन चिंता जता चुके हैं। अमेरिका सांसद प्रयास कर रहे हैं कि इस विषय पर वहां की संसद में विस्तृत चर्चा हो। उधर संयुक्त राष्ट्र संघ, सुरक्षा परिषद से अनुरोध किया जा रहा है कि वह नरसंहार की धमकी वाले विषय पर बैठक बुलाए।

भारत की स्थिति दिनोदिन विस्फोटक होती जा रही है। हर रोज कोई नया विवाद या झमेला खड़ा किया जाने लगा है। इस सबके चलते राजनितिक चुप्पी या मौन अपने को नए-नए ढंग से प्रस्तुत करता जा रहा है। यह मौन भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता को लेकर है। यह चुप्पी बढ़ती बेराजगारी को लेकर है और बढ़ते अपराधों को लेकर भी है। शासन का मौन महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों और बच्चे पर हो रहे शोषण को लेकर भी है। मौन घटती सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों की घटती संख्या पर भी लागू है। भारत में आज आंकड़ों को लेकर चुप्पी छा गई है। जनहित के आकडे अब हमारे सामने आ ही नहीं रहे हैं। इसकी वजह से हम वर्तमान स्थिति की विवेचना ही नहीं कर सकते। भारत की आधी जनसंख्या का आमदनी में हिस्सा महज 13 प्रतिशत रह गया है। ऊपर के 10 प्रतिशत ने 57 प्रतिशत आमदनी पर कब्जा कर लिया है और सर्वोच्च एक प्रतिशत के पास भारत की 22 प्रतिशत आमदनी जाती है। परंतु वीमत्स चुप्पी की वजह से यह बात आम जनता तक पहुंच ही नहीं रही है।

चुप्पी की संस्कृति को भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी प्रोत्साहित किया है। वहां तमाम तरह के गैरजरुरी मसलों के लिए तो गुंजाइश है लेकिन जनहित के मसलों पर कोई चर्चा ही नहीं होती | मौन का बोलबाला है। गौर करिए महिलाओं की (श्रम) आय में 18 प्रतिशत की कमी आई है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में परिवारों की आर्थिक स्थिति कितनी दयनीय होती जा रही है। इन सब पर चुप्पी के बीच प्रधानमंत्री एक सर्किट हाउस का उद्घाटन करते नजर आते हैं और बताते हैं कि उसके हर कमरे से समुद्र दिखता है। यह कार्य प्रधानमंत्री का है या .....? आप खुद सोचिए किसका है | आज जब देश आंतरिक व बाह्य दोनों ही ओर से संकटग्रस्त है, उसमें जरुरी मुद्दों पर मौन धारण कर इस तरह के महत्वहीन मसलों पर जोर दिया जा रहा है।

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विनोबा कहते हैं, ‘‘बहुमत का शासन आज का नियम सा बन गया है। इसकी कोई परवाह नहीं करता कि बहुमत विवेकशील और चरित्रवान है या नहीं। क्या बहुमत का राज केवल पशु बल नहीं है ? आप सेना के शासन या रुपये के शासन में और बहुमत के शासन में कैसे भेद कर सकते हैं ? वह पशुबल नहीं तो और क्या है?’’ वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है कि बहुमत को निरंकुश होने से कैसे बचाया जाए ? इसके लिए संविधान बनाया गया था। तमाम संवैधानिक संस्थाएं जैसे चुनाव आयोग, सीएजी, सर्वोच्च न्यायालय के साथ ही साथ सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय जैसे तमाम संस्थान बहुमत पर लगाम कसने के लिए ही तो अस्तित्व में आए थे। परंतु आज धीरे-धीरे इनकी लगाम न केवल ढीली होती जा रही है, बल्कि उन्हीं के हाथों में जा रही है, जिन पर इसे कसा जाना था। स्थितियां दिनोदिन बद से बद्तर हो रही हैं। इसी के साथ यह बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि जिस तरह की राजनीति ने इस पूरी व्यवस्था को पंगु बनाया है, उसे ठीक करना भी अंततः राजनीति के ही जिम्मे है। अतएव राजनीति के नए स्वरूप व नए कलेवर पर गंभीर विमर्श की अनिवार्यता है।

गणतंत्र दिवस पर बाबा साहब अंबेडकर को भी याद करना जरुरी है। "वे कहते हैं कि मैं किसी की आलोचना नहीं करना चाहता, लेकिन यदि धर्म को समाज के पुनर्जागरण का माध्यम बनना है तो इसे लगातार लोगों में ध्वनित होते रहना होगा। बच्चा विद्यालय में कितने साल बिताता है ? आप बच्चे को एक दिन विद्यालय भेज कर और अगले दिन वहां से निकाल कर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सीख लेगा। शिक्षा लेने के लिए बच्चे को रोज विद्यालय जाना ही पड़ेगा और वहां पांच घंटे बैठना ही पड़ेगा। तभी कोई बच्चा सीख-समझ सकता है।" अतएव भारतीय संविधान की बात लगातार नागरिकों के कान में गूंजती रहनी चाहिए। साल में दो बार संविधान का नाम ले लेने भर से हम जिम्मेदार नागरिक तैयार नहीं कर पाएंगे। आज भारत गणराज्य सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय पाने की संकल्पना को भूलता जा रहा है।

चलते - चलते सरकार के एक और नवाचार पर गौर करिए, भारत सरकार ने इस बार गणतंत्र दिवस समारोह की समाप्ति के अवसर पर होने वाले ‘‘बीटिंग दी रिट्रीट’’ से महात्मा गांधी का प्रिय भजन ‘‘अबाइड विद मी’’ को भी हटा दिया है। यह धुन सन् 1950 से लगातार बजाई जा रही थी। वैसे सन् 2020 में हटाया था। विरोध होने पर 2021 में पुनः शामिल किया और इस वर्ष पुनः हटा दिया गया है। इसे सन् 1847 में स्काटिश कवि हेनरी फ्रांसिस लाइट ने लिखा था। यह बेहद अर्थपूर्ण भजन है और इसके लिखे जाने का ब्योरा भी बेहद मार्मिक है। परंतु आज सत्ता भूल गई है कि आधुनिक इतिहास में हिटलर, मुसोलिनी और फ्रेंकों जैसे शासकों का इतिहास इनके समकालीनों ने ही लिखा है।

गांधी कहते हैं, राष्ट्रपति विल्सन ने अपने चौदह सिद्धान्तों की रचना की और कहा कि यदि हम इसमें सफल हों तो फिर हथियार तो है ही। मैं इसे उलटकर कहना चाहता हूँ, हमारे सब पार्थिव शस्त्र बेकार हुए हैं, किसी नए शस्त्र को खोजें। चलो अब प्रेम का शस्त्र, सत्य का शस्त्र लें। यह शस्त्र जब हमें मिल जाएगा, तब हमें दूसरे किसी शस्त्र की जरुरत ही नहीं रहेगी।

 (गांधीवादी विचारक चिन्मय मिश्रा के यह स्वतंत्र विचार हैं)