मजबूत सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था लोकतंत्र की जीवनरेखा, बजट में कटौती से बढ़ा शिक्षा का निजीकरण: दिग्विजय सिंह
हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक मजबूत सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था लोकतंत्र की जीवनरेखा है। इसके बिना हम अपने संविधान में परिकल्पित सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते: दिग्विजय सिंह
जून की शुरुआत में कोटा में छात्रों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने हमारी शिक्षा व्यवस्था के पतन के लिए तीन संरचनात्मक कारणों की पहचान की थी-निजीकरण, केंद्रीकरण और संघीकरण। भारत की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति को लेकर उनके इस चिंताजनक आकलन से मैं सहमत हूं।
मैंने इसी वर्ष 21 जून को शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया। अपने दो वर्ष के कार्यकाल के दौरान समिति ने सर्वसम्मति से 22 अलग-अलग रिपोर्टें स्वीकार की। हमारी शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण पर निम्नलिखित मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, जिनमें से अनेक हमारी समिति की रिपोर्टों में भी प्रतिबिंबित हुए हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था के केंद्रीकरण और संघीकरण पर मैं अलग से लिखूंगा।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक मजबूत सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था लोकतंत्र की जीवनरेखा है। इसके बिना हम अपने संविधान में परिकल्पित सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते। शिक्षा के महत्व को बाबासाहेब के नारे-‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो’-से बेहतर कोई नहीं दर्शाता। यह नारा सही मायने में शिक्षा को किसी भी सामाजिक परिवर्तन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी के रूप में स्थापित करता है। इसलिए उच्च गुणवत्ता वाली और सभी के लिए सुलभ सार्वजनिक शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की एक विशिष्ट जिम्मेदारी है।
पिछले एक दशक में हमारी शिक्षा व्यवस्था निजीकरण की दिशा में एक ख़राब मोड़ ले चुकी है। शिक्षा के लिए किए गए बजटीय आवंटन इस ट्रेंड का स्पष्ट प्रमाण हैं। मोदी सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग के बजटीय आवंटन का हिस्सा आधा कर दिया है-जो वित्त वर्ष 2014-15 में कुल बजट व्यय का 3.07 प्रतिशत था, वह वित्त वर्ष 2026-27 में घटकर 1.56 प्रतिशत रह गया है। उच्च शिक्षा के लिए आवंटन भी बजट के 1.54 प्रतिशत से घटकर 1.04 प्रतिशत रह गया है। सार्वजनिक शिक्षा में इस अपर्याप्त निवेश ने स्वाभाविक रूप से मुनाफाखोर निजी संस्थानों के लिए खुली छूट दे दी है
स्कूली शिक्षा के स्तर पर सबसे चिंताजनक घटनाक्रम लगभग एक लाख सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने की खबरें हैं। हालांकि, इसके संबंध में कोई निश्चित आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने समिति को बताया कि वह स्कूलों के बंद होने का कोई रिकॉर्ड नहीं रखता।यह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है। और यह तब और भी दुखद हो जाता है, जब यह कल्पना करें कि इन स्कूलों के बंद होने से प्रभावित छात्रों का कोई अथॉरिटी रिकॉर्ड रख रहा है या नहीं।
यह तर्क कि स्कूली शिक्षा मुख्यतः राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है और इसलिए स्कूलों के बंद होने के लिए मोदी सरकार जवाबदेह नहीं है, नैतिक दृष्टि से कोई वजन नहीं रखता। वर्ष 2009 का शिक्षा का अधिकार अधिनियम छात्रों के निकट भौगोलिक क्षेत्र में स्कूल उपलब्ध कराने का प्रावधान करता है और भारतीय संविधान में निहित एक मौलिक अधिकार को प्रभावी बनाता है। स्कूलों के बंद होने के कारण इस अधिकार का जो मजाक बनाया जा रहा है, उससे केंद्र सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। बल्कि, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में स्कूलों को बंद करने की अवधारणा तैयार करने और उसे बढ़ावा देने का काम स्वयं नीति आयोग ने किया था। हमारी सरकारी स्कूल व्यवस्था को खोखला करने का काम मोदी सरकार की नीतियों ने ही किया है।
स्कूलों के एकीकरण से मौजूदा सरकारी स्कूलों के लिए संसाधनों के आवंटन में कोई वृद्धि नहीं हुई है। संसदीय समिति ने पिछले वर्ष अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि भारत की सरकारी स्कूल व्यवस्था में लगभग 10 लाख शिक्षकों के पद रिक्त हैं। इन रिक्तियों के कारण ही बड़ी संख्या में मल्टी-ग्रेड कक्षाएं संचालित हो रही हैं, जहां शिक्षक प्रभावी ढंग से पढ़ाई नहीं करा पा रहे हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का स्थिर बजट भी उसे राज्य सरकारों को स्कूलों के बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश के लिए अधिक वित्तीय सहायता देने से रोकता है।
सरकारी स्कूलों के बंद होने और उनके बुनियादी ढांचे तथा शिक्षण व्यवस्था के लगातार कमजोर होने के दोहरे आघात के बीच, बड़ी संख्या में छात्र प्राइवेट स्कूलों की ओर पलायन कर रहे हैं। एक ओर सरकारी स्कूल बंद किए गए, तो दूसरी ओर देशभर में लगभग 43,000 नए प्राइवेट स्कूल खुल गए। ये प्राइवेट स्कूल सरकारी स्कूलों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली मध्याह्न भोजन, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों, निःशुल्क वर्दी जैसी अतिरिक्त सुविधाएं दिए बिना भी अत्यधिक फीस वसूलते हैं। इन निजी स्कूलों के शिक्षकों और वहां दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता भी एक जैसी नहीं है। सरकार के कॉम्प्रिहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे एजुकेशन 2025 के अनुसार, निजी स्कूलों में पढ़ने वाले परिवारों का खर्च सरकारी स्कूलों की तुलना में 10 गुना अधिक है। यानी भारत के छात्र अपनी जेब से कहीं अधिक खर्च कर रहे हैं, जबकि बदले में उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में बहुत कम अतिरिक्त लाभ मिल रहे हैं।
उन नीतिगत निर्णयों का विशेष रूप से उल्लेख करना ज़रूरी है, जिनकी वजह से माध्यमिक शिक्षा का असल में निजीकरण हो गया है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) ने कक्षा 8 तक के छात्रों के लिए स्कूलों, शिक्षकों और अन्य सहायक व्यवस्थाओं में बड़े पैमाने पर निवेश को बढ़ावा दिया। मोदी सरकार के हालिया कदमों से इसमें आई गिरावट के बावजूद, यह प्राथमिक शिक्षा को लगभग सार्वभौमिक बनाने में काफी हद तक सफल रहा था। इसलिए समय की मांग थी कि RTE का दायरा बढ़ाकर कक्षा 12 तक किया जाए।
मोदी सरकार की अपनी NEP भी वर्ष 2030 तक सार्वभौमिक माध्यमिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित करती है, और संसदीय समिति ने भी RTE को कक्षा 12 तक विस्तारित करने की सिफारिश की थी। लेकिन सरकार ने इस सलाह पर ध्यान नहीं दिया और परिणामस्वरूप माध्यमिक शिक्षा में निवेश करने में विफल रही। शिक्षा मंत्रालय के पास तो माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या का कोई अनुमान तक नहीं है।विडंबना यह है कि भारत के कार्यबल को समझने के लिए तैयार किया गया पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) ही अब स्कूल से बाहर हो चुके इन बच्चों की पहचान का सबसे भरोसेमंद माध्यम बन गया है। इसके अनुसार, 14 से 18 वर्ष की आयु के कम से कम 2 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं।
उच्च शिक्षा की स्थिति भी उतनी ही चिंताजनक है। सबसे खतरनाक ट्रेंड 2017 में मोदी सरकार द्वारा हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी (HEFA) की शुरुआत रही है। केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों से कहा गया कि वे पूंजीगत विस्तार के लिए सरकारी अनुदानों पर निर्भर रहने के बजाय HEFA से ऋण लें। इन ऋणों का भुगतान करने के लिए विश्वविद्यालयों ने छात्रों से ली जाने वाली फीस बढ़ाने का रास्ता अपनाया। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी द्वारा किए गए एक आकलन से पता चला कि HEFA के 78 प्रतिशत ऋणों की अदायगी छात्रों की फीस के जरिए की जा रही है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह सामने आई कि उच्च शिक्षा विभाग ने स्वयं संस्थानों से HEFA के ऋण चुकाने के लिए फीस बढ़ाने को कहा था।हमारे सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों का वित्तीय निजीकरण कोई संयोग नहीं है। यह सरकार की आधिकारिक नीति है।
इसी तरह निम्न गुणवत्ता वाले निजी विश्वविद्यालयों की बढ़ती संख्या भी गंभीर चिंता का विषय है। मात्र छह लाख की आबादी वाले सिक्किम में 28 निजी विश्वविद्यालय हैं।
इसी प्रकार अरुणाचल प्रदेश में भी 8 निजी विश्वविद्यालय हैं। जबकि दोनों राज्यों में केवल एक-एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और एक-एक नया राज्य विश्वविद्यालय है। यह विश्वास करना कठिन है कि इन राज्यों के इतने बड़े संख्या में मौजूद निजी विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही है, जबकि इनमें से अधिकांश मुश्किल से ही ठीक ढंग से संचालित हो रहे हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि विश्वविद्यालयी शिक्षा के मानकों का निर्धारण और उन्हें बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने वाला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) निम्न गुणवत्ता वाले निजी संस्थानों की बढ़ती संख्या पर रोक लगाने के लिए क्या कर रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में निजी भागीदारी का स्वागत है और उसकी आवश्यकता भी है। लेकिन राज्य अपनी शिक्षा बजट में कटौती करके या आंकड़े एकत्र करने तथा मानक निर्धारित करने जैसी अपनी शासन संबंधी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर निजीकरण को बढ़ावा नहीं दे सकता। ऐसा करना हमारी शिक्षा की सुलभता और भारत के करोड़ों लोगों के सामाजिक उत्थान के अवसरों के लिए खतरा है। इसलिए दांव पर केवल हमारी आर्थिक वृद्धि ही नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक एकजुटता और हमारा लोकतंत्र भी लगा हुआ है।




