दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सेक्रेटरी से की थी शिकायत, RTI में हुआ बड़ा खुलासा

RTI खुलासे में पता चला कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मनीष गर्ग के खिलाफ शिकायत की थी लेकिन कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई नहीं की।

Updated: Oct 23, 2026, 12:18 PM IST

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर मतभेदों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। एक RTI के तहत यह जानकारी सामने आई कि दो चुनाव आयुक्तों ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के खिलाफ कैबिनेट सचिवालय में शिकायत की थी लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। सचिवालय ने दलील दी कि शिकायतें दोनों आयुक्तों ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से भेजी थी और पूरे चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली थी। ऐसे में कार्रवाई करना अनुचित माना जा सकता था।

यह जानकारी रिटायर्ड कमोडोर लोकेश के. बत्रा द्वारा दायर RTI आवेदन के जवाब में सामने आई है। कैबिनेट सचिवालय ने आवेदन के तहत 14 पन्नों के दस्तावेज उपलब्ध कराए। इनमें दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र, उन पर की गई फाइल नोटिंग और शिकायतों से संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड शामिल हैं।

दस्तावेजों के मुताबिक, चुनाव आयोग में उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु की छुट्टी के दौरान मनीष गर्ग को प्रशासन विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 28 जुलाई के कार्यालय आदेश के अनुसार, गर्ग को 27 जुलाई से 9 अगस्त तक अंतरिम व्यवस्था के तहत येतुरु का काम संभालना था।

अतिरिक्त प्रभार मिलने के कुछ ही घंटों के भीतर गर्ग ने वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कामकाज के बंटवारे में बदलाव का आदेश जारी कर दिया। इस व्यवस्था में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशकों और उनके समकक्ष अधिकारियों की जिम्मेदारियों में संशोधन किया गया था।

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने अपनी शिकायत में कहा कि यह बदलाव आयोग से पूर्व चर्चा या उनकी जानकारी के बिना किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गर्ग ने अपने स्तर पर खुद को और अपने बराबर या वरिष्ठ अधिकारियों को काम आवंटित कर दिया। संधू के मुताबिक, गर्ग जब उप चुनाव आयुक्त (प्रशासन) के रूप में कार्यरत थे तब भी इस तरह के आदेश जारी किए गए थे।

संधू ने अपने पत्र में कहा कि संबंधित अधिकारियों को पहले ही मौखिक और लिखित रूप से निर्देश दिए गए थे कि आयोग की पूर्व चर्चा या मंजूरी के बिना इस तरह के फैसले न लिए जाएं। उन्होंने इस कार्रवाई को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम 2023 की धारा 18(1) और 18(2) के उल्लंघन से जोड़ते हुए उचित कार्रवाई की मांग की।

चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने भी कैबिनेट सचिव को भेजे अपने अलग पत्र में इसी तरह की आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने आरोप लगाया कि गर्ग ने आयोग से चर्चा किए बिना और उन्हें सूचित किए बगैर अधिकारियों के कामकाज में बदलाव किया।

जोशी ने अपनी शिकायत में एक और मुद्दा उठाया। उनके अनुसार, जब उन्होंने प्रशासन विभाग से संबंधित फाइल मांगी तो उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। उन्होंने भी पहले से जारी निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि आयोग की चर्चा या मंजूरी के बिना इस तरह की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी। जोशी ने भी 2023 के कानून के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उचित कदम उठाने की मांग की।

दोनों आयुक्तों ने अपनी शिकायतें सीधे कैबिनेट सचिव को भेजी। इससे मामला आयोग के आंतरिक प्रशासनिक विवाद से आगे बढ़कर एक संवैधानिक संस्था के कामकाज में संभावित हस्तक्षेप के सवाल से भी जुड़ गया।

कैबिनेट सचिवालय की 3 अगस्त की फाइल नोटिंग में शिकायतों को गंभीरता से दर्ज किया गया लेकिन तत्काल हस्तक्षेप को उचित नहीं माना गया। नोट के अनुसार, दोनों पत्र चुनाव आयुक्तों ने व्यक्तिगत हैसियत से भेजे थे। इन्हें पूरे निर्वाचन आयोग की ओर से आया औपचारिक संदेश नहीं माना जा सकता था।

फाइल नोटिंग में कहा गया कि इस स्तर पर कार्रवाई करना संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है। इसलिए दोनों शिकायतों की प्राप्ति स्वीकार करने और उनकी प्रतियां संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का सुझाव दिया गया।

कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन ने 5 अगस्त को दोनों आयुक्तों को पत्र भेजकर उनकी शिकायतें मिलने की पुष्टि की। इन पत्रों में मनीष गर्ग के कामकाज से संबंधित शिकायतों का उल्लेख था। संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के वरिष्ठ अधिकारियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय को भी भेजी गई। हालांकि, RTI से मिले रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि शिकायतों की प्राप्ति के बाद कोई औपचारिक जांच शुरू हुई या मनीष गर्ग के खिलाफ आगे कोई कार्रवाई की गई।

शिकायतों के घटनाक्रम में 30 जुलाई की तारीख भी अहम है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने एक दिन पहले जारी किए गए कामकाज के बंटवारे से जुड़े आदेश को रद्द कर दिया था। इसके साथ ही निर्देश दिया गया कि जब तक आयोग में नई व्यवस्था पर सहमति नहीं बनती तब तक पहले से लागू कार्य विभाजन ही जारी रहेगा। इस फैसले से अधिकारियों की जिम्मेदारियों में किए गए बदलाव को वापस ले लिया गया।

यह घटनाक्रम बताता है कि विवाद केवल अधिकारियों के बीच प्रशासनिक जिम्मेदारियों के निर्धारण तक सीमित नहीं था। शिकायतों में आयोग की पूर्व सहमति, निर्णय लेने की प्रक्रिया और वरिष्ठ अधिकारियों के कामकाज पर नियंत्रण जैसे मुद्दे भी उठाए गए थे।

मनीष गर्ग का नाम इससे पहले मतदाता सूची से जुड़े IT सिस्टम के संचालन और अधिकारियों को उसकी पहुंच मिलने के मुद्दे पर भी चर्चा में आया था। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने ERONet सॉफ्टवेयर पर निर्वाचन अधिकारियों को मिलने वाली पहुंच को लेकर चिंता जताई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, संधू का कहना था कि कई निर्वाचन अधिकारियों को सिस्टम का पूरा एक्सेस नहीं मिल रहा था। इससे मतदाता सूची से जुड़े उनके वैधानिक दायित्वों के निर्वहन पर असर पड़ने की आशंका थी।

इसी तरह द इंडियन एक्सप्रेस ने 23 सितंबर को रिपोर्ट किया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने के भीतर 14 बार आधिकारिक तौर पर कुछ कदमों पर आपत्ति जताई थी। इन मामलों में मतदाता सूची में नए मतदाताओं को शामिल करने, नाम हटाने और मतदाता डेटाबेस की विश्वसनीयता से जुड़े सवाल शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार, इन चिंताओं को कैबिनेट सचिव के सामने भी रखा गया था।