सुभाष चंद्रा का 22 हजार करोड़ का कर्ज महज 6.5 करोड़ में सेटल, बैंक झेलेंगे 99.9 फीसदी का नुकसान
NCLT ने ZEE ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में 22 हजार करोड़ रुपए के कुल कर्ज को महज 6.5 करोड़ रुपए में निपटाने के प्लान को मंजूरी दी है।
नई दिल्ली। Zee Group के मालिक डॉ. सुभाष चंद्रा के कर्ज मामले में बेहद चौंकाने वाला फैसला आया है। एनसीएलटी ने सुभाष चंद्रा के उस प्लान को हरी झंडी दे दी है, जिसके तहत वह बैंकों का कुल 22,006 करोड़ रुपये का कर्ज सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये देकर निपटा देंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि बैंकों का पैसा पूरी तरह डूब गया है। उन्हें करीब 99.9 फीसदी का भारी नुकसान झेलना पड़ेगा और उनकी जेब में सिर्फ 0.03 फीसदी रकम ही वापस आएगी।
इस विवादास्पद फैसले को लेकर कोर्ट के दो जजों के बीच आपसी मतभेद भी था। एक जज इसके पक्ष में थे और दूसरे खिलाफ। इस टाई को तोड़ने के लिए तीसरे जज नीलेश शर्मा को लाया गया। उन्होंने सुभाष चंद्रा के प्लान के पक्ष में अपना वोट दिया, जिसके बाद इसे आधिकारिक मंजूरी मिल गई। कोर्ट का कहना है कि जब कर्ज देने वाले अधिकांश बैंक खुद इस समझौते के लिए मान गए हैं, तो कोर्ट इसमें दखल नहीं देगा।
इस समझौते को पास कराने के लिए कानूनन 75% बैंकों की सहमति जरूरी थी। सुभाष चंद्रा के इस प्लान को 80% से ज्यादा क्रेडिटर (कर्जदाता) वोट मिले, जिसके बाद यह पास हो गया। हालांकि एलआईसी हाउसिंग, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक और यूनियन बैंक जैसे बड़े संस्थानों ने इस प्लान का जमकर विरोध किया। लेकिन उनका कुल हिस्सा 20% से कम था, इसलिए अब कानून के मुताबिक इन बैंकों को भी न चाहते हुए भी इस घाटे वाले समझौते को स्वीकार करना ही होगा।
नाराज बैंकों ने कोर्ट में यह मुद्दा भी उठाया कि साल 2017 में सुभाष चंद्रा ने अपनी कुल संपत्ति 45,888 करोड़ रुपये बताई थी, जो आज घटकर सिर्फ 31.79 करोड़ रुपये रह गई है। बैंकों ने आरोप लगाया कि संपत्ति को कहीं छिपाया या गायब किया गया है। लेकिन कोर्ट ने बैंकों की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि संपत्ति कम होने का मतलब यह नहीं है कि कोई धोखाधड़ी हुई ही हो। वैसे भी सुभाष चंद्रा के पास अब कुछ खास बचा नहीं है, अगर बैंक इस प्लान को ठुकराते तो उन्हें यह 6.5 करोड़ रुपये भी नहीं मिलते।
इस विवादास्पद फैसले के बाद भारत की बैंकिंग व्यवस्था में छोटे और बड़े कर्जदारों के साथ अलग-अलग व्यवहार को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में आरटीआई के हवाले से बताया गया है कि सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा के बड़े डिफॉल्टरों के लिखे-बट्टे कर्ज की वसूली दर करीब 15 फीसदी रही, जबकि 1 करोड़ रुपये से कम के छोटे कर्जदारों के मामले में यह दर करीब 74 फीसदी रही।




