सवाल पूछने की आजादी बनाम सोशल मीडिया की अराजकता

पेशेवर पत्रकारिता की एक आचार संहिता होती है। इसमें तीखे से तीखे सवाल भी पूरी शालीनता, संयम और बिना किसी शारीरिक या मानसिक दबाव के पूछे जाते हैं। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सवाल पूछने की आजादी जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी सवाल पूछने की मर्यादा भी है।

Updated: Sep 15, 2026, 03:17 PM IST

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को मध्य प्रदेश के बालाघाट में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा घेरे जाने और उनके साथ तीखी बहस करने की घटना इंटरनेट पर एक बड़ी बहस का विषय बनी हुई है। इस व्यवहार के जायज होने या न होने को लेकर सोशल मीडिया और आम जनता के बीच दो बेहद अलग और स्पष्ट दृष्टि देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर एक वर्ग का मानना है कि इन्फ्लुएंसर्स का सवाल पूछना गलत नहीं था।

बालाघाट के गांवों में संक्रामक बीमारियों से आदिवासी बच्चों की दुखद मौत हुई थी। दीपके जब पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे, तो महिला इन्फ्लुएंसर ने माइक लगाकर उनसे पूछा कि वे इतनी देरी से क्यों आए हैं, जिस पर खुद दीपके ने भी देरी के लिए माफी मांगी थी। वीडियो में इन्फ्लुएंसर्स को यह कहते भी सुना गया कि "यहां अच्छी सड़कें बनी हैं, क्या आपको दिखाई नहीं दे रहा है?" 

समर्थकों का मानना है कि केवल राजनीतिक नैरेटिव बनाने के बजाय क्षेत्र में हुए विकास और हकीकत पर सवाल पूछना जायज है। इन्फ्लुएंसर्स ने उन पर "लाशों पर राजनीति" करने का आरोप लगाया। कुछ लोगों का कहना है कि जब कोई सार्वजनिक हस्ती या राजनीतिक आंदोलन का नेता किसी संवेदनशील मुद्दे को समझने आता है, तो जनता या कंटेंट क्रिएटर्स को उनसे तीखे सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। दूसरी ओर, एक बड़ा वर्ग इस व्यवहार को पूरी तरह से गलत और परेशान करने वाला मान रहा है। 

स्थानीय मीडिया कर्मियों और पत्रकारों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि इतनी दूरदराज के आदिवासी इलाकों में अचानक बाहर से आए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स का यह समूह कैसे पहुंच गया। कुछ लोगों ने आशंका जताई कि यह दीपके के दौरे में बाधा डालने के लिए एक सुनियोजित प्रयास हो सकता है। वीडियो में जिस तरह कार को घेरकर आक्रामक अंदाज में तीखे सवाल पूछे गए और बाद में उनके जाने पर "वह भाग गया, वह भाग गया" कहकर हूटिंग की गई, उसे कई विश्लेषक पत्रकारिता या स्वतंत्र राय नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना और 'कंटेंट' के लिए हंगामा खड़ा करना मान रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि इन्फ्लुएंसर्स ने सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष या आंदोलनकारी नेताओं को घेरकर मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने का काम किया है।किसी संवेदनशील मुद्दे पर राजनेताओं या सामाजिक कार्यकर्ताओं से सवाल पूछना लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है, लेकिन सवाल पूछने का तरीका, मंशा और उसकी भाषा मर्यादित होनी चाहिए। इसमें अक्सर वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होने के बजाय हंगामा, तीखी बहस और व्यक्तिगत हमले हावी हो जाते हैं।  जब किसी को अचानक आक्रामक तरीके से घेरा जाता है, तो वह आत्मरक्षा में आ जाता है। ऐसे माहौल में किसी भी गंभीर या प्रशासनिक समस्या का तार्किक समाधान या सही जवाब निकलना नामुमकिन हो जाता है। कई बार यह तरीका केवल सोशल मीडिया पर व्यूज और ध्यान खींचने के लिए अपनाया जाता है। 

यही वजह है कि जहां एक पक्ष इसे नेताओं की जवाबदेही तय करने वाला 'रियलिटी चेक' कह रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे केवल पब्लिसिटी के लिए की गई हूटिंग और एक गंभीर मुद्दे को दबाने का प्रयास मान रहा है।एक पेशेवर पत्रकार और केवल कैमरा लेकर सड़क पर उतरे किसी व्यक्ति में कुछ बुनियादी फर्क होते हैं, जो मर्यादित पत्रकारिता को जरूरी बनाते हैं। मर्यादित पत्रकारिता में सवाल पूछने से पहले पूरी रिसर्च की जाती है। वहां केवल आरोप नहीं लगाए जाते, बल्कि सबूतों और आंकड़ों के साथ बात की जाती है।

पेशेवर पत्रकारिता की एक आचार संहिता होती है। इसमें तीखे से तीखे सवाल भी पूरी शालीनता, संयम और बिना किसी शारीरिक या मानसिक दबाव के पूछे जाते हैं। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सवाल पूछने की आजादी जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी सवाल पूछने की मर्यादा भी है। बिना मर्यादा के की गई पत्रकारिता केवल अराजकता को जन्म देती है, समाधान को नहीं। बालाघाट जैसी घटना में, जहां बच्चों की मौत एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है, वहां मर्यादित पत्रकारिता का काम प्रशासन की कमियों को उजागर करना है। जब पत्रकारिता मर्यादित नहीं होती, तो पूरा मामला "किसने किससे क्या कहा" के व्यक्तिगत झगड़े में बदल जाता है और मुख्य पीड़ित  गरीब परिवार जिन्होंने बच्चे खोए हैं वो हाशिए पर चले जाते हैं। सोशल मीडिया  प्लेटफॉर्म पर जिस सामग्री को अधिक लोग देखते, साझा करते और उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, उसे एल्गोरिदम अधिक लोगों तक पहुंचाता है। 

इसका परिणाम यह है कि शांतिपूर्ण बातचीत, दस्तावेजों के आधार पर की गई खोजी रिपोर्ट और तथ्यात्मक विश्लेषण की तुलना में टकराव, उत्तेजना, गुस्सा और विवाद अधिक तेजी से वायरल हो जाते हैं। इससे एक नया ‘कंटेंट कल्चर’ पैदा हुआ है जिसमें कई बार वास्तविक पत्रकारिता से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि वीडियो कितना वायरल हुआ है। किसी व्यक्ति को घेरना, उसकी प्रतिक्रिया को उकसाना, फिर उस प्रतिक्रिया को शीर्षक बनाकर प्रसारित करना,यह मॉडल दर्शकों का ध्यान तो खींच सकता है, लेकिन इससे जरूरी नहीं कि जनता को वास्तविक समस्या की बेहतर जानकारी मिले। फॉलोअर्स की संख्या विश्वसनीयता का प्रमाण नहीं है और वायरल वीडियो तथ्यात्मकता का प्रमाण नहीं है। 

बालाघाट की घटना को केवल अभिजीत दीपके और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बीच विवाद के रूप में देखना इस पूरे मामले को छोटा कर देना होगा। असल में यह भारत में तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य की तस्वीर है। एक तरफ सोशल मीडिया ने आम नागरिक को अपनी बात कहने का अभूतपूर्व अधिकार दिया है। दूसरी तरफ इसी माध्यम ने सूचना, राय, प्रचार, मनोरंजन और पत्रकारिता के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया है। आज हर व्यक्ति को सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन हर सवाल पत्रकारिता नहीं है। हर कैमरा समाचार माध्यम नहीं है। हर वायरल वीडियो सत्य नहीं है और हर तीखा सवाल जनहित का सवाल नहीं होता। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन हार गया। 

असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या इस पूरे विवाद के बाद उन आदिवासी बच्चों की मौत के वास्तविक कारण, प्रशासनिक जवाबदेही और पीड़ित परिवारों की समस्याएं पहले से अधिक स्पष्ट हुआ या सोशल मीडिया का शोर उन सवालों को ही निगल गया? इन्ही कारणों से भारत में डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स, सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स और पारंपरिक पत्रकारों के लिए जवाबदेही, पारदर्शिता और नैतिकता तय करने के मकसद से सरकार, सुप्रीम कोर्ट और नियामक संस्थाएं  लगातार नियमों को सख्त कर रही हैं।केवल 'व्यूज' या 'फॉलोअर्स' के दम पर कुछ भी पोस्ट करने की छूट नहीं है। 

नए नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्तिगत क्रिएटर जो पंजीकृत न्यूज चैनल नहीं है और यूट्यूब, इंस्टाग्राम या 'एक्स' पर समाचार या राजनीतिक कंटेंट पोस्ट करता है, तो वह भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय  के दायरे में आ सकता है। उन्हें पारंपरिक मीडिया की तरह ही जिम्मेदार व्यवहार करना होगा। अगर कोई क्रिएटर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)  टूल, वॉयस क्लोनिंग या फेस स्वैपिंग का उपयोग कर रहा है, तो उसे वीडियो में स्पष्ट रूप से 'एआई जनित' होने का डिस्क्लोजर देना होगा। नए नियमों के तहत, यदि किसी कोर्ट या अधिकृत सरकारी एजेंसी को कोई कंटेंट गैर-कानूनी या भड़काऊ लगता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और डिजिटल न्यूज प्रकाशकों को उसे 3 घंटे के भीतर हटाना होगा। पहले यह समय सीमा 36 घंटे की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी आर्टिकल 19(1)(ए) असीमित नहीं है। नफरत फैलाने वाले भाषण  या समाज में अराजकता फैलाने वाली ग्राउंड रिपोर्टिंग पर कानूनी कार्रवाई के रूप में जुर्माना या अकाउंट सस्पेंशन का प्रावधान है। इन सख्त गाइडलाइंस के आने से सड़क पर बिना किसी जिम्मेदारी के कैमरा लेकर किसी को भी डराने-धमकाने वाले या फर्जी खबरें फैलाने वाले 'कथित पत्रकारों' और इन्फ्लुएंसर्स पर कानूनी शिकंजा कसा जा सकता है। वैश्विक स्तर पर इसे लेकर मूल सवाल यह है कि क्या कैमरा और माइक्रोफोन किसी व्यक्ति को पत्रकार बना देता है ? सोशल मीडिया ने सूचना प्रसारित करने का अधिकार करोड़ों लोगों तक पहुंचाया है। लेकिन इसके साथ सूचना की विश्वसनीयता, तथ्य की जांच, स्रोतों की पुष्टि और जवाबदेही की समस्या भी बढ़ी है। पारंपरिक पत्रकारिता में किसी आरोप को प्रकाशित या प्रसारित करने से पहले तथ्य जुटाने, संबंधित पक्ष का जवाब लेने और संदर्भ देने की अपेक्षा होती है।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं।)