हिमालय क्षेत्र में विकास की सोच को बदलना होगा
हिमालय को नुकसान पहुंचा तो भारत, नेपाल, भूटान, तिब्बत ही नहीं, चीन पाकिस्तान को भी भारी जन धन और संसाधन की हानि होगी। नेपाल, भूटान, उत्तर और पूर्वोत्तर भारत तो पूरा ही बर्बाद हो जाएगा। हिमालय हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है। सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी, बल्कि यह है कि अगली आपदा आने से पहले हम चेतावनी को कितना गंभीरता से लेते हैं।
हिमालय दुनिया की सबसे नई और अस्थिर पर्वत श्रृंखला है। यहां भूकंप, भूस्खलन और हिमनद पिघलने की घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं। 26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई ग्लेशियर जनित तबाही में जलवायु परिवर्तन एक मुख्य कारक है। जलवायु परिवर्तन, बढता तापमान और बदलता मानसून ने हिमालयी भू-तंत्र को अस्थिर करने वाली परिस्थितियां पैदा या मजबूत की है, जबकि तत्काल ट्रिगर ग्लेशियर का टूटना या बर्फ-चट्टान का हिमस्खलन और उसके बाद मलबे का बहाव था।
एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है की जलवायु परिवर्तन जरूरी नहीं है कि हर बार सीधे “बाढ़” पैदा करे। वह पहले जोखिम की पूरी संरचना बदलता है। 26 अगस्त को नेपाल के रसुवा क्षेत्र में ल्हेन्दे खोला नदी के ऊपरी हिस्से में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई से करीब 1,200 मीटर नीचे गिरा। इसके साथ बर्फ, चट्टान और मलबा आया और उसने नदी में अचानक अत्यंत शक्तिशाली प्रवाह पैदा किया। इसके बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में बाढ़ आई। कुछ स्थानों पर जलस्तर लगभग 30 मिनट में 9 मीटर तक बढ़ा।
इस बाढ़ ने नदी किनारे बसे शहरों को तहस-नहस कर दिया, अपने रास्ते में आने वाली 10 से अधिक पनबिजली परियोजनाओं को नष्ट कर दिया और 50 किलोमीटर से अधिक राजमार्गों और 30 पुलों को बहा ले गई। शुरुआत में भूकंप को संभावित कारण माना गया था, लेकिन बाद के उपग्रह और भूकंपीय विश्लेषण से संकेत मिला कि जिसे भूकंप समझा गया था, वह ग्लेशियर या चट्टान के बड़े पैमाने पर टूटने से उत्पन्न भूकंपीय सिंग्नल थी।
यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे, अमेरिका (यूएसजीएस) ने इसे ग्लेशियर का एकाएक गिरना और मलबा प्रवाह से जुड़ी घटना बताया है।हिमालय में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और बर्फ का द्रव्यमान घट रहा है। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के नुकसान की गति बढ़ी है। नेपाल के ग्लेशियरों ने पिछले लगभग तीन दशकों में अपने बर्फीले आयतन का लगभग एक-तिहाई खो दिया है। इसका मतलब यह नहीं कि हर ग्लेशियर टूटेगा। लेकिन इससे ग्लेशियरों की संरचना और उनके आसपास का पर्वतीय भूगोल बदल रहा है।
बर्फ पिघलने से सिर्फ पानी नहीं बढ़ता, पहाड़ भी कमजोर होता है। ऊंचे हिमालय में चट्टानों और मिट्टी के बीच जमी बर्फ यानी पर्माफ्राॅस्ट एक तरह का प्राकृतिक “सीमेंट” का काम करती है। इसे केवल “प्राकृतिक आपदा” कहना भी अधूरा है। खतरा प्राकृतिक हो सकता है, लेकिन आपदा की भयावहता अक्सर जलवायु परिवर्तन, कमजोर भू-तंत्र और नदी घाटियों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों का परिणाम होती है। उत्तराखंड को बर्फीली चोटियों, घने जंगलों और नदियों के राज्य के रूप में देखा जाता है, लेकिन पिछले 30 साल में इसकी जमीन की तस्वीर तेजी से बदली है।
1992 से 2022 के बीच बर्फ का क्षेत्र घटा, प्राकृतिक वनस्पति कम हुई और निर्माण क्षेत्र करीब 13 गुना बढ़ गया। अनुचित और अवैज्ञानिक विकास गतिविधियों के कारण जलवायु संबंधी संवेदनशीलता और भी बढ़ रही है। पहाड़ों की ढलानों के निचले हिस्सों को काटकर बनाई जा रही जरूरत से अधिक चौड़ी सड़कें, बड़े पैमाने पर बन रही जलविद्युत परियोजनाएं, तेजी से बढ़ता सैन्य ढांचा, बस्तियां तथा अन्य बुनियादी ढांचे अत्यंत नाजुक हिमालयी घाटियों और नदी-गलियारों में तेजी से निर्मित किए जा रहे हैं।
ये वही क्षेत्र हैं जो विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है। इसी दौरान बारिश और तापमान के पैटर्न में भी बदलाव दिखाई देता है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों के विशेषकर उत्तराखंड और सिक्किम में पिछले कुछ वर्षों में ग्लेशियर झील के फटने की मुख्य तौर पर 3 बड़ी और विनाशकारी घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें सैंकड़ों लोगों की जान गई थी।
इसे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के संदर्भ में एक उदाहरण से समझा जा सकता है। 2013 में, भारत के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी ) के वैज्ञानिकों ने दक्षिण ल्होनक झील को लेकर जोखिम का आकलन किया था और उनके निष्कर्ष चिंताजनक थे। अध्ययन के अनुसार, झील के फटने की 42 प्रतिशत संभावना थी।
खतरा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज था और घटना से करीब एक दशक पहले ही इसकी जानकारी सामने आ चुकी थी।इसके बावजूद भी झील के ठीक नीचे सिक्किम की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक 1,200 मेगावाट की तीस्ता-3 परियोजना थी, जिसे चुंगथांग में बनाया गया था। अगले दस वर्षों तक झील लगातार बढ़ती रही और बांध का काम सामान्य रूप से संचालित होता रहा।
ज्ञात जोखिम को ध्यान में रखते हुए न तो लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की कोई ठोस योजना बनाई गई, न बांध की संरचना में आवश्यक बदलाव किए गए और न ही इस खतरे के अनुरूप कोई पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की गई। फिर 3 और 4 अक्टूबर 2023 की दरम्यानी रात झील उसी तरह फट गई, जैसी आशंका अध्ययन में व्यक्त की गई थी। अचानक आई बाढ़ ने कुछ ही घंटों में बांध को तबाह कर दिया। इस आपदा में 55 लोगों की मौत हुई और 74 लोग लापता हो गए। सिक्किम में 1,756 परिवारों के 7,000 से अधिक लोग बेघर हो गए, जबकि मंगन, गंगटोक, नामची और पाकयोंग जिलों में 2,000 से अधिक मकान पूरी तरह नष्ट हो गए।
इसके करीब 14 महीने बाद यह मामला एक और चौंकाने वाले मोड़ पर पहुंचा। नियामकों ने उसी स्थान पर बांध के पुनर्निर्माण को मंजूरी दे दी। इस बार प्रस्तावित बांध की ऊंचाई 118.64 मीटर रखी गई है, जो मूल बांध की ऊंचाई से लगभग दोगुनी है। हालांकि, परियोजना से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी मंजूरियां अभी लंबित हैं और निर्माण कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई है। इसलिए जलविद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के दौरान जोखिमों को अनदेखा करना जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन नहीं है। यह आपदा में योगदान देना है।
वास्तव में, जब तक व्यापक जलवायु आकलन पूरा नहीं हो जाता, तब तक हिमालय में बड़े जलविद्युत विकास पर तत्काल रोक लगाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के अनुसार कश्मीर, लद्दाख़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की 7500 ग्लेशियर झीलों में से 189 झीलें कभी भी तबाही का बङा कारण बन सकती हैं। इन 189 में से करीब 56 बेहद खतरनाक श्रेणी में है। इससे लगभग तीन करोड़ की आबादी पर बङा संकट मंडरा रहा है। इन ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलें केवल एक पारिस्थितिक संकट नहीं हैं। इन झीलों से निकलने वाले पानी के कारण नदियों का बहाव प्रभावित होता है। इसके साथ ही, जिन झीलों का पानी पूरी तरह भर जाता है या जिनका किनारा टूटता है, वे नीचे बसे क्षेत्रों के लिए भारी तबाही का कारण बनती हैं।
अतः यह सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल और पूरे हिमालय के लिए बड़ी चेतावनी है,क्योंकि यहां सवाल केवल ग्लेशियरों के पिघलने का नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय भू-तंत्र के अस्थिर होने का है। इसलिए हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए सतत विकास और संरक्षण के प्रयासों की आवश्यकता है। भारत सरकार ने हिमालयी क्षेत्र में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और हिमनद झील का विस्फोट की निगरानी और चेतावनी के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
उत्तराखंड और अन्य उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में मौसम की सटीक जानकारी के लिए आधुनिक डॉप्लर वेदर रडार, स्वचालित मौसम केंद्र और स्वचालित वर्षा गेज स्थापित किए गए हैं। उत्तराखंड जैसे राज्यों में संवेदनशील हिमनद झीलों की पहचान कर वहां फ्लैश फ्लड को रोकने के लिए अत्याधुनिक सेंसर और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लगाने का काम तेजी से किया जा रहा है। उपग्रह आधारित निगरानी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से जलग्रहण क्षेत्रों में जलस्तर और बादलों फटने की घटनाओं पर नजर रखने के प्रयास बढ़ाए जा रहा है। अब वक्त आ गया है कि हिमालय वाले देशों को हिमालय में वास्तविक समय (रियल-टाइम) की निगरानी, ट्रैकिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित करने में मिलकर सहयोग करना चाहिए।
यह वह संदेश है जिसे और अधिक लोगों द्वारा, और ज़ोर-शोर से उठाए जाने की ज़रूरत है। बाढ़ के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान तथा भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग, और जलवायु संकट से निपटने के लिए दक्षिण एशियाई स्तर पर व्यापक सहयोग की आवश्यकता है। हिमालय किसी एक देश की सीमा में सीमित पर्वत श्रृंखला नहीं है। भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान सहित पूरे दक्षिण एशिया की नदियां और करोड़ों लोगों का जीवन इससे जुड़ा है। इसलिए ग्लेशियरों की निगरानी, मौसम और जलस्तर के वास्तविक समय के आंकड़ों का साझा उपयोग, आपदा की पूर्व चेतावनी और नदी-बाढ़ प्रबंधन के लिए क्षेत्रीय सहयोग अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है।
हिमालय को नुकसान पहुंचा तो भारत, नेपाल, भूटान, तिब्बत ही नहीं, चीन पाकिस्तान को भी भारी जन धन और संसाधन की हानि होगी। नेपाल, भूटान, उत्तर और पूर्वोत्तर भारत तो पूरा ही बर्बाद हो जाएगा। हिमालय हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है। सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी, बल्कि यह है कि अगली आपदा आने से पहले हम चेतावनी को कितना गंभीरता से लेते हैं। जलवायु परिवर्तन को रोकने के वैश्विक प्रयासों के साथ-साथ हिमालय में विकास की सोच बदलना ही इस संकट का वास्तविक समाधान है। प्रकृति को चुनौती देकर बनाया गया विकास अंततः मानव सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)




