जी भाईसाहब जी: बीजेपी की जीत से सदमे में हैं बीजेपी नेता

MP Politics: मध्य प्रदेश में जो हुआ वह इतिहास बन गया। इस जीत के बाद कांग्रेस विरोध का मोर्चा खोल चुकी है लेकिन बीजेपी नेता भी अंदर ही अंदर नाखुश हैं। वे सदमे में है और इस दु.ख की वजह भी राजनीतिक रूप से काफी अहम् है।

Updated: Jun 16, 2026, 02:31 PM IST

यह सुनने में अटपटा जरूर है मगर सच यही है कि मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीसरी सीट पर जो कुछ भी हुआ उससे बीजेपी में सतह पर तो खुशी दिखाई दे रही है मगर अंदर कई नेता खासे सदमे में है। बीजेपी ने एक सीट तो जीत ली लेकिन उसके तौर तरीकों पर कई नेताओं को आपत्ति है, खासकर वे नेता जो शुचिता के लिए पार्टी में लड़ाइयां लड़ते रहे हैं।  

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के सांसद टूटे और एक गुमनाम सी पार्टी में चले गए। इस पार्टी में जा कर वे एनडीए को समर्थन देने की घोषणा कर चुके हैं। देश में जारी इस राजनीति का एक अलग ही चेहरा मध्य प्रदेश में दिखाई दिया जब कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त हुआ। नामांकन निरस्त करने के कारणों पर कांग्रेस खासी खफा है। कांग्रेस का तर्क है कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि फार्म में जो जानकारी पूछी ही नहीं गई है उसके आधार पर नामांकन निरस्त कर दिया गया। कांग्रेस नेताओं ने ऐसे मामले भी प्रस्तुत कर दिए जब रिटर्निंग ऑफिसर ने ऐसे समान मामलों पर नामांकन निरस्त नहीं किया।

कांग्रेस ने राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया मगर बात नहीं बनी। यहां तक कि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का वह बयान भी वायरल हुआ जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि रिटर्निंग अफसर ने बीजेपी के दबाव में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त किया। उमंग सिंघार के अनुसार रिटर्निंग अधिकारी खुद कह चुके हैं कि मैंने गलती की लेकिन इसी सरकार की नौकरी करनी है।

मध्य प्रदेश में जो हुआ वह इतिहास बन गया। इस जीत के बाद कांग्रेस विरोध का मोर्चा खोल चुकी है लेकिन बीजेपी नेता भी अंदर ही अंदर नाखुश हैं। वे इसलिए सदमे में है कि शीर्ष नेता हर तरह से ताकतवर होते जा रहे हैं। निर्णय कुछ हाथों में हैं और उनके तरीकों पर सवाल उठाने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। यह संकेत ताकत से स्थापित हो रहा है कि बीजेपी नेतृत्व जो चाहेगा वह पा लेगा, उसे स्थानीय नेताओं के समर्थन या असहमति की कोई परवाह नहीं है। वरना एक समय ऐसा था जब रीति-नीतियों के लिए नेता अपने नेतृत्व से लड़ जाते थे और संगठन को फैसला बदलने के लिए मजबूर कर देते थे। अब जब जीतना ही लक्ष्य है तो उसके तरीकों को लेकर कोई बात करना नहीं चाहता है। यह बात और है कि ऐसे कदमों पर अंदरूनी असहमितयां बढ़ रही हैं।  

शिवराज सिंह चौहान के वायरल वीडियो

प्रदेश की राजनीति जहां राज्यसभा निर्वाचन को लेकर गरमाई हुई थी वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अलग ही अंदाज में दिखाई दिए। जहां पूरा राजनीतिक घटनाक्रम मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के आसपास चल रहा था वहीं शिवराज सिंह चौहान के दो वीडियो वायरल हुए। एक वीडियो केरल का है। इस वीडियो में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने चिर-परिचित कुर्ता-पायजामा और जैकेट के बजाय दक्षिण भारतीय वेशभूषा 'लुंगी' पहने नजर आ रहे हैं। केरल यात्रा के दौरान जब वे सड़क से गुजर रहे थे, तो धान के खेतों को देखकर उन्होंने तुरंत अपनी गाड़ी रुकवा दी और किसान के खेत में पहुंच गए। दूसरा वीडियो एक सभा का है जहां वे जनता को बार-बार खड़ा करने पर मंच संचालक को फटकारते दिखाई दे रहे हैं। केरल का वीडियो कुछ दिन पुराना है। मगर इन वीडियों की टाइमिंग कमाल की है। सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं में कहा जा रहा है कि मौका कोई भी हो, शिवराज सिंह चौहान छा जाने का कोई अवसर जाने नहीं देते। 

नाम के लिए बीजेपी विधायक का धरना

राजनीति में नाम न हो तो नेताओं का तनाव बढ़ जाता है। ऐसा ही कुछ डिंडोरी में हुआ जब बीजेपी विधायक ओमप्रकाश धुर्वे अन्य बीजेपी नेताओं के साथ कलेक्ट्रेट में धरने पर बैठ गए। शनिवार शाम को शुरू हुआ यह घरना देर रात तक जारी रहा। इस धरने की वजह भी दिलचस्प रही। बताया गया कि एक महाविद्यालय के कार्यक्रम के शिलालेख पर बीजेपी नेताओं का नाम न होने के विरोध में यह धरना दिया जा रहा है। बीजेपी नेता देर तक दफ्तर में बैठे रहे लेकिन कलेक्टर नहीं मिली। कहा गया कि कलेक्टर बीमार हैं।

आधी रात 11 बज गए और बीजेपी नेताओं का धरना खत्म नहीं हुआ तो उन्हें कलेक्टर निवास बुलाया गया। कलेक्टर से मुलाकात कर बीजेपी नेताओं ने उन्हें अपना दर्द कह सुनाया। हालांकि इस मुलाकात के बाद बीजेपी नेताओं के सुरबदल गए थे। उन्होंने कहा कि हितग्राही शिविरों में गरीबों के नाम नहीं जुड़ने को लेकर नाराजगी थी। यह धरना हितग्राहियों का नाम जुड़वाने को लेकर था। जबकि शाम से ही कहा जा रहा था कि धरना प्रशासन द्वारा बीजेपी नेताओं को नजरअंदाज करने के विरोध में दिया जा रहा है। 

अब यह धरना हितग्राहियों का नाम जुड़वाने को लेकर था या शिलालेखों और कार्यक्रमों में बीजेपी नेताओं का नाम जुड़वाने की कवायद, मगर आधी रात तक बीजेपी नेताओं का धरने पर बैठे रहना चर्चा में रहा। बीजेपी विधायक ओमप्रकाश धुर्वे की जिले के किसी भी कलेक्टर से पटरी नहीं बैठना भी राजनीतिक चर्चाओं में है। 

विरोध दबाने के लिए पुलिस की राजनीति

नीट परीक्षा को लेकर विद्यार्थियों में गुस्सा है। इस गुस्से का प्रदर्शन जगह-जगह किया जा रहा है। बीते दिनों केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के भोपाल आने का कार्यक्रम बना तो कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा कर दी। एनएसयूआई का यह प्रदर्शन पुलिस की राजनीति का शिकार हो गया।

पुलिस ने प्रदर्शन की तैयारी कर रहे एनएसयूआई नेताओं को उनके घर से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के भोपाल आगमन के पहले ही हिरासत में ले लिया। नेताओं के न रहने के बाद भी छात्र कार्यकर्ता प्रदर्शन करने पहुंचे तो सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी प्रदर्शन में शामिल हो गए। प्रदर्शनकारियों की भीड़ में शामिल इन पुलिस वालों ने मौका देख कर दूसरे प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। छात्र कार्यकर्ता समझ नहीं पाए कि उनके बीच में खड़े व्यक्ति समर्थक नहीं पुलिसकर्मी हैं। इस तरह एक आंदोलन को कमजोर करने में पुलिस ने सफलता पाई।