क्या आज के राजनीतिक दल चंपारन की तरह पहल के लिए तैयार हैं

कृषि संबंधित नए कानूनों ने भारतीय राजनीतिक व सामाजिक संगठनों को यह तो समझा दिया है कि आने वाले समय में भारत का आर्थिक ढांचा कैसी शक्ल लेगा। परन्तु इससे जो सामाजिक व सांस्कृतिक विषमताएं उपजेगीं उसका अंदाजा अधिकांश लोग अभी भी पूरी तरह से नहीं लगा पाए हैं। मुख्य मुद्दा यह है कि सत्ता परिवर्तन के बाद एक हद तक आर्थिक नीतियों में थोड़ा बहुत फेरबदल तो किया जा सकता है, लेकिन नष्ट हुई सामाजिक व सांस्कृतिक संरचनाएं कभी भी पूर्व स्थिति को प्राप्त नहीं हो सकतीं।

Updated: Oct 04, 2020 03:35 PM IST

क्या आज के राजनीतिक दल चंपारन की तरह पहल के लिए तैयार हैं

स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम दिनों, जून 1947 में किसी निकटस्थ ने महात्मा गांधी से कहा था, आप तो महात्मा हैं, आपको हिमालय चले जाना चाहिए। आप राजनीति के झमेले में क्यों पड़ते हैं? सरकार को सरकार की तरह चलने दीजिए! प्रार्थना सभा में इसका उत्तर देते हुए गांधी ने कहा था, "आप बिल्कुल ठीक कहते हैं। महात्मा वगैरह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं सत्य का साधक हूॅं। इस लिहाज से मुझे हिमालय ही जाना चाहिए। इसलिए फिलहाल मेरा हिमालय दिल्ली की सड़कों पर है। एक बार इस पीड़ा से सबको मुक्त कर लूॅं, उसके बाद आगे-आगे आप चलियेगा आपके पीछे मैं हिमालय चलूंगा।"

ये गांधी हैं, जो अपने सामने स्वयं एक दुर्गम हिमालय रचते हैं और फिर उसे पार करने की कोशिश करते हैं। वे अकेले उस हिमालय को भी पार नहीं करना चाहते। वे सबकी पीड़ा खत्म कर सबको हिमालय पार कराना चाहते हैं। वे जहां हैं, वहीं सबकुछ है। आज भारत के हर गांव में हिमालय जैसी विकट और दुर्गम स्थिति पैदा होती जा रही है। भारतीय कृषि पर आया संकट भारत के अस्तित्व पर मंडराता संकट है। उपमाओं और तुलनाओं का समय बीत चुका है, अब तो सबकुछ सामने है और जिस तरह से भारतीय लोकतंत्र व कृषि के सामने चुनौतियां हैं, वैसी अतीत में कभी भी सामने नहीं आई थीं।

यहां इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि भारतीय कृषि पर संकट महज इन तीन नए कानूनों से ही नहीं आया है। यह पिछले तीन दशकों से कृषि को लेकर बरती जा रही उदासीनता की अंतिम परिणिति है। इस दौरान मुकदमा चलता रहा। समय के साथ न्यायाधीश और वकील बदलते गए, और दुर्योग से निर्णायक क्षण में संसद भी मुॅंह फेर कर खड़ी हो गई। फैसला लिख दिया गया। फैसला लिखने वाली कलम टूट गई। अब विचारणीय यह है कि क्या कोई नई कलम बनाई जा सकती है? क्या कोई उचित समाधान निकल सकता है या निकाला जा सकता है? जाहिर सी बात है कि निर्णय पर स्थगन कभी भी स्थायी नहीं होता। यह तो मामले को ठंडा करने का एक जाना-पहचाना तरीका है।

क्या कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व उन परिस्थितियों का ठीक-ठीक विश्लेषण करने को तैयार है, जिसकी वजह से वर्तमान कृषि संकट इस विकरालता तक पहुंच गया है? राहुल गांधी ने कहा है कि कृषि को मृत्युदंड की सजा दे दी गई है। पर यहां यह भी जान लेना आवश्यक है कि अभी महज सजा सुनाई गई है। उस सजा का अनुपालन नहीं हुआ है। गौरतलब है भारत आज लोकतंत्र को लगातार हाशिये पर किये जाने की साजिश का शिकार भी है। तो क्या ऐसे में भारत के राजनीतिक दल और गैर दलीय संगठन महात्मा गांधी के विचारों और संघर्ष के तरीकों, खासकर कृषि व कृषक को लेकर, पर पुर्नमनन का प्रयास करेंगे?

गांधी सन् 1940 के दशक में समझाया था कि स्वराज्य की इमारत एक जबरदस्त चीज है, जिसे बनाने में अस्सी करोड़ हाथों को काम करना है। इसे बनाने वालों में किसानों की यानी खेती करने वालों की तादाद सबसे बड़ी है। सच तो यह है कि स्वराज्य की इमारत बनाने वालों में ज्यादातर (करीब 80 फीसदी) वही लोग हैं, इसलिए असल में किसान ही कांग्रेस हैं ऐसी हालत पैदा होना चाहिए। आज ऐसी बात नहीं है। लेकिन जब किसानों को अपनी अहिंसक ताकत का ख्याल हो जाएगा, तो दुनियां की कोई हुकूमत उनके सामने टिक नहीं सकेगी।

कृषि संबंधित नए कानूनों ने भारतीय राजनीतिक व सामाजिक संगठनों को यह तो समझा दिया है कि आने वाले समय में भारत का आर्थिक ढांचा कैसी शक्ल लेगा। परन्तु इससे जो सामाजिक व सांस्कृतिक विषमताएं उपजेगीं उसका अंदाजा अधिकांश लोग अभी भी पूरी तरह से नहीं लगा पाए हैं। मुख्य मुद्दा यह है कि सत्ता परिवर्तन के बाद एक हद तक आर्थिक नीतियों में थोड़ा बहुत फेरबदल तो किया जा सकता है, लेकिन नष्ट हुई सामाजिक व सांस्कृतिक संरचनाएं कभी भी पूर्व स्थिति को प्राप्त नहीं हो सकतीं। एक बड़े राष्ट्र को एक झटके से पूरी तरह से बदला नहीं जा सकता।

इसीलिए गांधी सचेत करते हुए कहते हैं, "हुकूमत को हथियाने के लिए खेली जाने वाली राजनीति की चालों में किसानों का कोई उपयोग न होना चाहिए। उनके ऐसे अनुचित उपयोग को मैं अहिंसक पद्धति का विरोध समझता हूॅं। जो किसानों या खेतिहरों को संगठित करने का मेरा तरीका जानना चाहते हैं, उन्हें चम्पारन के सत्याग्रह की लड़ाई का अध्ययन करने से लाभ होगा।" 

गौरतलब है भारत में सत्याग्रह का पहला प्रयोग चंपारन में ही हुआ था। उसका परिणाम भी हम सभी जानते हैं। गांधी जी के शब्दों में कहें तो उस आंदोलन से बीस लाख से भी ज्यादा किसान लाभान्वित हुए थे। उसके पहले हुए हिंसक आंदोलन तो दबा दिए गए थे। परन्तु चम्पारन आंदोलन मात्र छह महीनों के अंदर पूरी तरह सफल हुआ और इससे देष में और साथ ही साथ किसानों में असाधारण राजनीतिक चेतना का प्रसार हुआ। 

आज के राजनीतिक दल क्या इसी तरह की पहल के लिए तैयार हैं? ट्रेक्टर जलाने से कोई परिणाम सामने नहीं आएगा। संघर्ष का परिणिति अगर वैसी हो जैसी स्वदेशी आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों की होली जलाने की स्वप्रेरणा से फलीफूली हो तो परिणाममूलक हो सकती है और इसके लिए आवश्यक है कि किसानों से सीधा संपर्क हो। साथ ही लड़ाई प्रारंभ करने से पहले प्रषिक्षण तो दिया जाए कि लड़ना कैसे है? जाहिर सी बात है यह सब सोशल मीडिया के माध्यम से हो पाना संभव नहीं है। सोशल मीडिया सहायक हो सकता है, परन्तु वह मुख्य भूमिका में नहीं हो सकता।

गांधी जी ने तब के कांग्रेसियों को समझाया था कि वे चंपारन के अलावा खेड़ा, बारडोली और बोरसद के किसानों के संघर्षों का भी अध्ययन करें। वे समझाते हैं कि, "किसान संगठन की सफलता का रहस्य इस बात में है कि किसानों की अपनी जो तकलीफें हैं, जिन्हें वे समझते हैं और बुरी तरह महसूस करते हैं, उन्हें दूर कराने के सिवा दूसरे किसी राजनीतिक हेतु से उनके संगठन का दुरुपयोग न किया जाए।" क्या वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में कोई इतना साहसपूर्ण और विवेकपूर्ण कदम उठाने की हिम्मत कर सकता है?

वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा होना संभव नहीं दिखता परन्तु इसे संभव तो बनाना ही होगा। महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय राजनीतिज्ञों को दिल्ली को समस्या निवारण का एकमात्र केन्द्र मानने की अपनी आदत छोड़नी होगी। मुख्य विपक्षी दल होने के नाते सबसे अधिक जिम्मेदारी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ही है। आवश्यकता इस बात की है कि किसान संगठनों और कांग्रेस के बीच परस्पर विश्वास के आधार पर मुख्य मुद्दों पर सहमति बने। गांधी ने तब भी बेबाकी से कहा था, "मैं यह मानता हूॅं कि किसानों के संगठन का जो तरीका कुछ कांग्रेसजनों ने अपनाया है, उससे किसानों को जरा भी फायदा नहीं हुआ, उल्टे नुकसान हुआ होगा। लेकिन फायदे और नुकसान की बात को छोड़कर भी मुझे यह तो कहना ही होगा कि उनका अपनाया हुआ तरीका अहिंसा का तरीका नहीं है।"

हम सभी जानते हैं कि अहिंसा पर चलने के लिए किसी के साथ जबरदस्ती नहीं की जा सकती। अभी यह बात सामने आई है कि कांग्रेस अपने द्वारा शासित राज्यों से कह रही है कि वे नए कानूनों के खिलाफ अपने राज्य स्तरीय कानून लाए। क्या यह गांधी के सविनय कानून भंग की अवधारणा पर खरा उतरता है? महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कांग्रेस को उन राज्यों में ज्यादा तीव्रता से अपनी बात रखनी चाहिए जहां वे सत्ता में नहीं हैं। क्या कांग्रेस यह घोषणा कर सकती है कि यदि वह केन्द्र में सत्ता में आई तो विश्व व्यापार संगठन द्वारा कृषि को लेकर किए प्रावधानों को वह तभी स्वीकार करेगी जबकि वे पूर्णतया भारत के हित में होंगे और पश्चिमी देश भी कृषि की सबसिडी को सामान्य स्तर पर लाएं या भारत या अन्य देशों पर भी कोई रोक नहीं लगाएं। हमें यह समझना होगा कि किसान और किसानी पर आया संकट वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था की देन है। क्या भारत एक वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की चर्चा को मूर्त रूप दे सकता है।

यह तय है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भारतीय कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को समझना ही नहीं चाहती। कांग्रेस समझती थी परन्तु उसने उससे मुंह मोड़ा और परिणाम सामने हैं। हमें यह समझना होगा कि भारत में बढ़ती सांप्रदायिकता, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, बढ़ती आर्थिक असमानता के पीछे कहीं न कहीं कृषि के प्रति बढ़ती उदासीनता ही है। रोजगार विहीन आर्थिक वृद्धि से जो जो हो सकता है वह सब हमारे देशमें हो रहा है। गांधी कहते थे कि मुझे अपने कार्यक्रमों में खादी से सर्वाधिक लगाव है, परन्तु मैं कृषि के लिए उसे भी न्योछावर कर सकता हूॅं। भारतीय राजनीति में दखल रखने वाले यदि भारत को बचाना चाहते हैं तो उन्हें अपनी अन्य प्राथमिकताओं को पीछे रखकर, कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी और इसे अधिक विकेन्द्रित बनाना होगा।

नारायण भाई महात्मा गांधी के आंदोलनों की विवेचना करते हुए बड़ी रोचक बात सामने रखते हैं। वे बताते हैं, "तीनों बड़े आंदोलन असहयोग आंदोलन, सविनय कानून भंग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन, अगर इनके तात्कालिक परिणाम देखें तो इन तीनों आंदोलनों को अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली। लेकिन उनके बीच के जितने आंदोलन हुए उसमें उद्देश्य छोटे थे, लेकिन उन सारे उद्देश्यों में सफलता मिली और उस सफलता के कारण जनता का उत्साह बराबर बना रहा।" भारतीय लोकतंत्र के ऊपर मंडराते खतरे से निपटने के लिए जनता को पुनः उत्साहित करना अनिवार्य है। क्या विपक्षी दल गांधी जी की रणनीति को समझने का प्रयास करेंगे। गौरतलब है युद्ध जीतने के लिए कई मोर्चों पर छोटी-छोटी लड़ाईयां एकसाथ लड़नी पड़ती हैं। महात्मा गांधी को नमन।