राम और उदारवाद

पता नहीं एक समाज के रूप में हम राम को कितना जान सके हैं, लेकिन राम के ऊपर लिखी किसी भी कृति में राम कट्टरपंथी नहीं हैं, बल्कि अपनी सोच के खुलेपन के साथ विश्लेषण और आकलन में विश्वास रखने वाले जन नायक हैं, जिन्हें मनुष्यता का हर गुण स्वीकार है, लेकिन अंधविश्वास, कट्टरपंथ, प्रचलित मान्यताओं और रूढ़ियों से गुरेज़ है। तो फिर इतना बड़ा अंतर कैसे हो गया हमारे जाने-सुने श्री राम और अब लग रहे नारों में मौजूद श्रीराम के बीच?

Updated: Jul-26, 2020, 10:35 AM IST

राम और उदारवाद

बड़े शौक़ शौक़ में बचपन में पढ़ने की गति तीव्र रखने की उत्कंठा ने गीता प्रेस गोरखपुर की कई धार्मिक पुस्तकों को पढ़वा दिया और लगभग सात वर्ष की आयु में रामायण और महाभारत जैसे बड़े ग्रंथों के अलावा कई पुराण भी उसी धुन में पढ़ लिये। फिर आगे चलकर गूढ़ मानवीय अर्थों में महाभारत के सभी चरित्रों को समझने का प्रारम्भ कॉलेज के दिनों में तब हुआ, जब पहली बार महाभारत पर आधारित बड़े ही तार्किक लेकिन संवेदनशील रूप में  अठारह विशेष चरित्रों के मानवीय रूप को नरेंद्र कोहली की अलग अलग अठारह किताबों में हर पात्र की ओर से गढ़ी गयी महाभारत कथा पढ़ी। 

इन किताबों को पढ़ते हुए दिमाग़ में निरंतर रहा कि क्या नरेंद्र कोहली या किसी अन्य लेखक ने रामायण को भी यूँ मानवीकरण के साथ समझा है? रामायण पर आधारित लम्बे उपन्यास “अभ्युदय” के बारे में मालूम तो हुआ, बहरहाल, जीवन की आपा-धापी और जिम्मेदारियाँ यूँ पीछे पड़ीं कि फिर रामायण के मानवीकरण की इस खोज की ज़रूरत का भी ध्यान नहीं रहा। 

कुछ माह पहले अस्सी के दशक में लिखे गए “अभ्युदय” का पहला खंड पढ़ते हुए पहले पेज से ही ऐसा क्यों लगा कि ये कहानी अभी के समय में लिखी गयी है! “अभ्युदय” निस्संदेह कालजयी उपन्यास है और हर अर्थों में ‘आज’ पर भी पूरी तरह खरा उतरता है। इसके बाद अलग अलग लेखकों के संदर्भ में भी रामायण को समझने की चाह और भी बढ़ी क्योंकि आज के देश काल और परिस्थिति में, जहाँ ‘जय श्री राम” का नारा क्रूरता से सम्बद्ध होने लगा है, राम को सभी पहलुओं से जानना ज़रूरी है । तुलसी व्याख्यान से सम्बंधित चर्चा के दौरान लेखक भगवान सिंह के रामायण पर ही आधारित उपन्यास  “अपने अपने राम” का ज़िक्र आया, जिसमें रामकथा लंका-विजय के बाद अयोध्या लौटे श्रीराम के राज्याभिषेक से प्रारम्भ होती है। 

“अपने अपने राम” अपने प्रारम्भ से ही चौंकाती है, क्योंकि यहाँ जो श्रीराम हैं, उनका प्रादुर्भाव (संदर्भों के लिहाज़ से) तो वाल्मीकि रामायण से ही है, पर मनुष्यजन्य वातावरण में वे एक से ज़्यादा बार अयोध्या के राजगुरु वशिष्ठ एवं उनके दरबार सहयोगियों के रूढ़िवाद से असहमत होते दिखते हैं। वशिष्ठ जब अपनी पुरातन पंथी मान्यताओं को शास्त्रों/ पुराणों के आधार पर प्रचलन में लाना चाहते हैं, श्रीराम इसे सिरे से ख़ारिज करते हैं। जहाँ राम अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के आकलन, विश्लेषण और स्वतंत्र सोच से प्रभावित हैं, वहीं वे वशिष्ठ की जातिगत श्रेष्ठता की दृढ़ धारणाओं पर प्रश्न भी उठाते हैं। वे शास्त्रों को काल की सामयिकता के अनुसार बदलने का महत्व समझते हैं। समाज के हर तबके के नागरिकों पर नियमों का बराबरी से लागू होना राम का सिद्धांत है। वे तत्कालीन उच्चवर्गीय लोगों, जैसे ब्राम्हनों को भी उनके द्वारा किये गए अपराधों पर उचित दंड देने का समर्थन करते हैं। लम्बे समय से चली आ रही पद्धतियों और रीतियों के समय समय पर विश्लेषण पर राम ज़ोर देते दिखते हैं और ज़रूरत पड़ने पर उनमें  नवाचार (नये नियम) की आवश्यकता पर भी ज़ोर देते हैं। 

नारी को लेकर राम सदैव संवेदनशील रहे, चाहे राज-उपेक्षिता उनकी अपनी माँ कौशल्या हो या गर्विता कैकयी हों। राम ने  सम्भवतः इसी से सीख लेते हुए राजाओं में प्रचलित बहुविवाह  को नकारा और अपने जीवन में सीता के अलावा किसी नारी को पत्नी या मित्र के स्थान पर नहीं रखा। सीता को उन्होंने अपने जैसा इंसान मानते हुए तब के समय में सम्भव  दायित्व सौंपे, जो प्रचलन से अलग हटकर था। श्री राम ने अहिल्या को समाज-स्वीकृता बनाया और हर उस दुर्जन को दंडित किया, जिसने महिलाओं को अपमानित किया, नीयत की दृष्टि से भी और इंसानियत की दृष्टि से भी।

राम हर बार सजग हैं, स्वयं के आचरण के प्रति भी और अपने राजकीय सहयोग मंडल के आचार-व्यवहार और विचारों के प्रति भी। वे बख़ूबी समझते हैं कि राज्य के सफल  संचालन के लिये सिर्फ़ लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता, नीतियों का परिपालन और समर्थ सैन्य क्षमता काफ़ी नहीं है, उन्हें आस-पास चल रही  अपनी ही टीम के  लोगों की मंत्रणाओं और साज़िशों पर भी कड़ी निगाह रखना होगी। वे गहन प्रचारतंत्र (प्रोपोगैंडा) को सैन्य शक्ति से भी बड़ा हथियार मानते हैं और इसीलिये राज्याभिषेक के बाद से ही निरंतर चल रही साज़िशों को नापसंद भी करते हैं, और उनका ख़ात्मा करना चाहते हैं। सीता के तथाकथित निर्वासन की योजना भी सम्भवतः इसी प्रोपोगैंडा के तीख़ेपन को कम करने की कोशिश की तरह है, जिससे फ़ौरी तौर पर सीता को माध्यम बना कर उन पर हो रहे षड्यंत्त्री प्रहारों को काटा जा सके। हालाँकि श्रीराम के इस निर्णय से किसी भी महिला की व्यक्तिगत सहमति तो नहीं हो सकती है, न उस युग के काल और परिस्थिति में और न ही अन्य मानवीय प्रतीकों के दायरे में और फिर राम भी ऐसा निर्णय लेकर कभी संतुष्ट नहीं रहे। सीता के प्रति अपने अन्याय को उन्होंने स्वयं का दोष ही माना। यह काफ़ी तो नहीं है, पर फिर भी राम हैं तो उदारमना ही। राम के मन में सीता के चरित्र और अस्तित्व को लेकर कभी संदेह नहीं रहा और इस विषय पर वाल्मीकि, तुलसीदास या नरेंद्र कोहली, भगवान सिंह और अन्य लेखकों ने भी एक ही मत रखा है। कुल मिलाकर राम  लीक पर चलते हुए कुछ नहीं करते। पता नहीं एक समाज के रूप में हम राम को कितना जान सके हैं, लेकिन राम के ऊपर लिखी किसी भी कृति में राम कट्टरपंथी नहीं हैं, बल्कि अपनी सोच के खुलेपन के साथ विश्लेषण और आकलन में विश्वास रखने वाले जन नायक हैं, जिन्हें मनुष्यता का हर गुण स्वीकार है, लेकिन अंधविश्वास, कट्टरपंथ, प्रचलित मान्यताओं और रूढ़ियों से गुरेज़ है इस परिप्रेक्ष्य में अगर बचपन में दादी-नानी से सुनी रामायण की कहें, वाल्मीकि रामायण के तथ्यों को देखें या विस्तृत अनुसंधान से मानवीयकरण वाले उपन्यासीकरण को देखें, हर जगह राम न केवल अनुशासित दिखते हैं, बल्कि हर लिहाज़ से घोर उदारवादी (लिबरल), प्रोग्रेसिव और अपने समय की आधुनिकतम सोच के पैरोकार रहे हैं। तो फिर इतना बड़ा अंतर कैसे हो गया हमारे जाने - सुने श्री राम और अब लग रहे नारों में मौजूद श्रीराम के बीच?

ऐसे में बड़ा साफ़ दिखने लगा है कि जिन्होंने राम को न तो पढ़ा और न ही जाना, उन्होंने श्री राम को एक प्रोडक्ट बना कर उनकी फ़्रेंचाइज़ी ले ली है और उनकी मार्केटिंग कर रहे हैं। उन्होंने अतिविश्वास में राम को भी छद्म हिंदुत्व का चोगा पहनाया है और अस्थायी तौर पर सफल भी दिख रहे हैं, क्योंकि देश में बहुत से साठ-पैंसठ जैसी बड़ी उम्र के लेकिन कम चिन्तनशील लोग ऐसे हैं, जो जीवन के युवा वर्षों में केवल स्वयं के लिए सब कुछ सोचते-करते पद में ऊपर तो पहुँच गये, तब बड़ी देर से याद आया कि देश के लिये तो कुछ किया ही नहीं! ऐसे सभी लोगों को देश की प्राचीन संस्कृति के नाम पर जो भी परोसा जाता है, वे प्रसाद की तरह ग्रहण कर लेते हैं। अक्सर वे छद्म हिंदुत्व के उस ‘आधे सच’ की डोज़ को देशभक्त बनना या भारतीय संस्कृति जुड़ना समझते हैं. इस व्हाट्सअपीय  क्रैश कोर्स की अस्थायी रूप से अभूतपूर्व सफलता से स्वयं पर मोहित इन छद्म हिंदुत्व वादी लोगों ने सोच लिया है कि  श्रीराम की ओनरशिप उनके ही पास है। ऐसे लोगों से सिर्फ़ इतना ही कहना है कि राम तो फिर राम हैं, अभी इस आवरण में शायद कहीं उद्वेलित से भी हैं। बस, एक दिन बाहर निकल आएँगे और अपनी विनम्र, परिपक्व और आधुनिक विचारधारा से सभी को फिर सम्मोहित कर के सही दिशा भी दिखाएँगे वही उदारवादी राम - हाँ, सही अर्थों में हमारे लिबरल राम। जय श्रीराम।