BJP के दलित महापौर को नितिन नबीन के रथ से उतारा गया, 20 को आंबेडकर प्रतिमा के सामने आंदोलन की चेतावनी
उज्जैन में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड-शो के दौरान महापौर मुकेश टटवाल को रथ से उतार दिया गया। इसे लेकर दलित वर्ग के लोगों में आक्रोश है।
उज्जैन। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उज्जैन आगमन पर पार्टी की अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। यहां आयोजित रथ यात्रा के दौरान महापौर मुकेश टटवाल को रथ से उतार दिया गया। नितिन नवीन के स्वागत में आयोजित रथ यात्रा में सवार होने के लिए तय सूची में महापौर मुकेश टटवाल का नाम भी शामिल था। आरोप है कि दलित होने की वजह से उन्हें रथ से उतार दिया गया। इसे लेकर दलित वर्ग के लोगों में आक्रोश है।
महापौर टटवाल के मुताबिक वे राष्ट्रीय अध्यक्ष की अगवानी के लिए हेलीपैड पहुंचे थे। उनका कहना है कि भाजपा जिला प्रभारी बजरंग पुरोहित और कार्यक्रम प्रभारी जयपाल सिंह चावड़ा ने उन्हें रथ में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ बैठने के लिए कहा था। इसके बाद वे विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा के साथ रथ पर सवार हुए। कुछ देर बाद उन्हें रथ से नीचे उतार दिया गया।
टटवाल ने कहा कि उज्जैन में होने वाले किसी भी बड़े कार्यक्रम में शहर के प्रथम नागरिक के रूप में उनकी जिम्मेदारी बनती है। वे राष्ट्रीय अध्यक्ष की अगवानी के लिए ही हेलीपैड पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने घटनाक्रम की जानकारी स्थानीय पार्टी पदाधिकारियों को दी है और मुख्यमंत्री को भी पूरे मामले से अवगत कराने की बात कही है। उन्होंने 20 सितंबर को फ्रीगंज स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के पास बैठकर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।
महापौर ने कहा कि वे 20 सितंबर को सुबह 11 बजे बाबा साहेब की प्रतिमा के पास बैठकर प्रार्थना करेंगे। उनके मुताबिक, वे अपमान सहन करने की शक्ति और जनता की ओर से मिली जिम्मेदारी को निष्ठा से निभाने की प्रार्थना करेंगे। इस घटनाक्रम को लेकर दलित वर्ग के लोगों में आक्रोश है। संत बालीनाथ मंदिर बागपुर में शुक्रवार को बेरवा समाज की बैठक हुई, जिसमें टटवाल के साथ हुए इस व्यवहार की निंदा की गई।
मामले पर तराना से कांग्रेस विधायक महेश परमार ने कहा कि महापौर निर्वाचित जनप्रतिनिधि और शहर के प्रथम नागरिक हैं। यदि उन्हें रथ से नीचे उतारा गया, तो यह सवाल उठता है कि भाजपा अपने ही दलित जनप्रतिनिधि के सम्मान को कितनी गंभीरता से लेती है। भाजपा मंचों से समरसता, सामाजिक सम्मान और ‘सबका साथ’ की बातें करती है, लेकिन जब अपने ही दल के दलित महापौर के सम्मान की बात आई तो यह सम्मान कहां चला गया। भाजपा को उज्जैन और बैरवा समाज से इस अपमान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।




