दफ्तर दरबारी: प्रदेश में छाया अंधेरा, कैसे निपटें, अफसरों की बत्ती गुल
शहरों में जरूर त्योहारी सीजन की रोशनी है मगर गांव अंधेरे में डूबे हुए हैं। फसलों की सिंचाई नहीं कर पा रहे किसान सड़क पर हैं। सरकार के निर्देश के पूरा नहीं कर पा रहे अफसरों की बत्ती गुल है।
कांग्रेस सरकार को बिजली कटौती के मुद्दे पर घेर कर सत्ता में आई बीजेपी खुद अंधेरे से घिर गई है। शिवराज सरकार ने प्रदेश को बिजली में सरप्लस बनाने को अपनी सफलता की ब्रांडिंग की। दो दशक बाद अब फिर बिजली कटौती को लेकर प्रदेश में आंदोलन हो रहे हैं। ग्रामीणों का आक्रोश है कि फसलों को सिंचाई के लिए भी बिजली नहीं मिल पा रही है जबकि शहरों में सबकुछ अच्छा है। रात में मोटर नहीं चलने से टंकियां नहीं भर पा रही हैं और पेयजल आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है।
अघोषित बिजली कटौती से परेशान ग्रामीणों और किसानों का गुस्सा सड़कों पर फूट रहा है। प्रदेश में अलग-अलग हिस् में लगातार आंदोल जारी है। बुधवार रात सीहोर-भोपाल मार्ग में बिलकिसगंज चौराहे पर चक्काजाम किया गया, वहीं दोराहा में तीन दिन कटौती बंद नहीं हुई तो बिजली बिल नहीं भरने की चेतावनी दी गई। दोराहा में ग्रामीणों का आक्रोश देख पहुंचे अधीक्षण यंत्री पूनम तुमराम ने कहा कि कटौती जिला मुख्यालय स्तर से नहीं, बल्कि पीछे से ही हो रही है।
सरकार आदेश दे रही है कि किसानों को 10 घंटे बिजली दो। अफसरों की बत्ती गुल है कि बिजली लाए कहाँ से? 2023 में सरकार बनने के बाद से लेकर अब तक मध्यप्रदेश न बिजली जुटाने में कई प्रयास किए थे। शिवराज सिंह चौहान सरकार ने सरप्लस बिजली को अपने काम की सफलता बताया था और मध्यप्रदेश बिजली बेचने वाले राज्यों में शामिल हो गया था। अब भी सरकार बीजेपी की है लेकिन बिजली का प्रबंधन करने वाले अधिकारी बदल गए हैं। तब किसी भी कीमत पर बिजली उपलब्ध करवाई गई थी। अब आर्थिक हालात पस्त है और बिजली खरीदी की क्षमता नहीं है। सवाल यही उठ रहा है कि क्या सरप्लस बिजली का दावा मात्र प्रबंधन था जो अधिकारियों के हटते ही चूक गया। जनता की तकलीफ का दोष अफसरों पर है जो बिजली सप्लाई के मैनेजमेंट में फेल हो रहे हैं।
आईएएस के तबादलों क्या भाई भतीजावाद है?
मोहन सरकार में अफसरों की अदला बदली इतनी तेजी से हो रही है कि इसका पैटर्न डिकोड करना मुश्किल है। इस सप्ताह 11 जिलों के कलेक्टर समेत 23 आईएएस अधिकारियों को नया काम दिया गया। कुछ आईएएस को कुछ ही समय में कलेक्टर पद से हटा दिया गया जबकि कुछ को मैदानी पोस्टिंग मिल गई। बालाघाट जिला आदिवासी बच्चों की मौत के कारण देशभर में चर्चा में रहा था। यहां के कलेक्टर 2017 बैच के आईएएस कुमार सत्यम को हटाया जरूर लेकिन उन्हें बालाघाट से हटाकर हरदा का कलेक्टर बनाया गया। मतलब इस तबादले को यदि बच्चों की मौत से जोड़ कर देखा जाए तो उन्हें केवल स्थान परिवर्तन करना पड़ेगा, कलेक्टरी नहीं गई है।
पन्ना कलेक्टर उषा परमार को करीब एक साल बाद ही हटा दिया गया। उन्हें कहीं कलेक्टर नहीं बनाया गया है। वे अब भोपाल में पदस्थ होंगी। इसे केन-बेतवा प्रोजेक्ट के लिए भू-अर्जन से जुड़े मामलों को ठीक से नहीं संभाल वाने की सजा माना जा रहा है। ऐसी ही सजा नर्मदापुरम के कलेक्टर सोमेश मिश्रा को मिली है। छह महीने में ही उन्हें मैदानी पोस्टिंग से हटा दिया गया है। इसका कारण मूंग उत्पादक किसानों का आंदोलन माना जा रहा है। प्रशासनिक चूक का फायदा उठा कर किसान भोपाल तक पहुंच गए थे।
इन तबादलों में सबसे ज्यादा चर्चित निर्णय आईएएस रोहित सेसोनिया को रायसेन का कलेकटर बनाया जाना है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौत के समय आईएएस रोहित सिसोनिया इंदौर नगर निगम में एडिशनल कमिश्नर थे। इंदौर से हटाने के बाद रोहित सिसोनिया को आठ महीने में ही रायसेन का कलेक्टर बना दिया गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पटवारी ने इस पर सवाल किया है कि भागीरथपुरा के पीड़ित परिवार आज भी न्याय और दोषियों पर कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सरकार पहले यह बताए कि जांच आयोग की रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित अधिकारी को कलेक्टर बनाने से पहले किन तथ्यों पर विचार किया गया।
कलेक्टर की मनमानी, तबादले पर खुशियां
अफसरों के तबादलों की राजनीति अलग मगर शाजापुर कलेक्टर आईएएस ऋजु बाफना के ट्रांसफर पर सोशल मीडिया पर जश्न की प्रतिक्रियाएं हैं। करीब तीन साल तक शाजापुर की कलेक्टर ऋजु बाफना अपने अंदाज में कार्य करने के लिए जानी जाती हैं और इस कारण उनका कई बार विवाद भी हुआ है। इस बार जब उन्हें शाजापुर से हटा कर उज्जैन संभाग में अपर आयुक्त बनाया गया तो शाजापुर में खुशियां मनाई गई। लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कलेक्टर के रूप में उनका व्यवहार अच्छा नहीं था। अगर कलेक्टर नहीं जाती तो अगले चुनाव में बीजेपी विधायक घर बैठ जाते।
कर्मचारियों के साथ बुरे बर्ताव पर एक केस की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट इंदौर खंडपीठ के न्यायमूर्ति पिल्लई ने कहा था कि कलेक्टर शाजापुर कुछ भी पास कर देती हैं। उनको कानून कुछ मालूम नहीं है। आईएएस ऋजु बाफना का अपनी सेवाकाल के शुरुआत में भी विवाद हुआ था जिसके कारण वे चर्चा में आ गई थीं। इस बार उनकी कलेक्टरी जाने पर कुछ लोग खुश हुए तो कुछ ने उनके जाने पर बधाइयां दी।
महापौर पर आयुक्त भड़की, आयुक्त पर विधायक
सिंगरौली में नगर निगम की बैठक में हुए घमासान के वीडियो चर्चा में हैं। नगर निगम की बैठक में आयुक्त सविता दीवान का पार्षदो से कई बार विवाद हुआ लेकिन इस बार भरी मीटिंग में की गई टिप्पणी चर्चा में हैं। आयुक्त सविता दीवान ने बैठक में आम आदमी पार्टी की महापौर रानी अग्रवाल के कामकाज पर कमेंट किया। उन्होंने कहा कि महापौर या एमआईसी किसी भी फाइल को पास करे या रोके, आयुक्त को अधिकार है कि वह उस मामले को निगम की बैठक में रख सकती है। आयुक्त सविता दीवान ने अपनी टिप्पणियां तल्खी भरे स्वर में की। इसके पहले भी महापौर और आयुक्त में तकरार हो चुकी है। लेकिन बात यहीं नहीं थमी।
नगर निगम की इस बैठक में बीजेपी विधायक रामनिवास शाह भी पहुंचे। एमएलए रामनिवास शाह ने आयुक्त का नाम लिए बना अफसरों को दो टूक कहा कि काम करना पड़ेगा, वरना यहां से चले जाएं। विधायक शाह ने कहा कि पहले की बैठक में शिविर लगाकर विस्थापितों की समस्याओं को सुन कर उन्हें पट्टा देने का प्रस्ताव पास हुआ था। इस पर आज तक क्रियान्वयन क्यों नहीं हुआ है? अफसर, आम आदमी पार्टी की महापौर और बीजेपी के विधायक के तेवर के ये वीडियो प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से दबंगता के एंगल से देखे जा रहे हैं।




