धर्म, राजनीति और अर्थशास्त्र से आशंकित बापू का भारत

महात्मा गांधी की हत्या को सही ठहराने के प्रयास देश में हर दिन किये जाते हैं, बापू हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्हें भुलाने की हर कोशिश आत्मघाती है

Updated: Jan 30, 2021, 08:59 AM IST

धर्म, राजनीति और अर्थशास्त्र से आशंकित बापू का भारत
Photo Courtesy: Free Press Journal

यदि हम धर्म, राजनीति और अर्थशास्त्र से “मैं और मेरा” निकाल सकें तो हम शीघ्र ही स्वतंत्र हो जायेंगे और पृथ्वी पर स्वर्ग उतार सकेंगे,महात्मा गांधी के ये शब्द सदा प्रासंगिक नजर आते है। बापू की विचारधारा ही सर्वसमावेशी थी, इसलिए उनकी आस्था और मान्यताएं कभी नहीं डिगीं। अब किसान आंदोलन को ही लीजिये, किसानों की समस्याओं में “मैं और मेरा” अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ा मुद्दा है। यह अर्थशास्त्र पूंजीपतियों से भी जुड़ता है इसलिए किसानों की आशंकाएं निर्मूल भी नहीं है। किसानों के साथ ही अन्य हित समूह भी अपने आर्थिक फायदों के लिए “मैं और मेरा” का उद्देश्य पूरा करने के लिए कृत संकल्पित नजर आ रहे है। शीर्ष सत्ताधारियों की “मैं और मेरा” की नीति उनकी राजनीतिक सत्ता के लिए संजीवनी होती है। सत्ता साधन सम्पन्न भी होती है, अत: उसके लिए अपना लक्ष्य पाना अन्यों की अपेक्षा आसान होता है। रही सही कसर धर्म पूरी कर देता है जिसे राजनीतिक भ्रमजाल में उलझाकर इतना उद्वेलित कर दिया जाता है कि उसका प्रतीकात्मक असर लाल किले से होकर किसान आंदोलन जैसे न जाने कितने जन आंदोलनों को बेहाल और अपंग कर सकता है। इन सब कवायदों में देश को स्वर्ग बनाने के लिए धर्म, राजनीति और अर्थशास्त्र से "मैं और मेरा" को निकालने की महात्मा गांधी की सीख वैसे ही नजरअंदाज कर दी जाती है, जैसे इस देश में बापू और उनकी मान्यताओं को नजरअंदाज करने की परम्परा कायम कर दी गई है।

देश की राजधानी में गांधी की अहिंसा, स्वराज और सुशासन को तार तार होते सभी ने देखा। इसमें उन सभी की भागीदारी किसी न किसी रूप में दिखी जो इस देश में रहते हैं, जीते हैं, उपभोग करते हैं, भागीदारी और नेतृत्व करते हैं और व्यवस्था के संचालन का भार उठाए रहते हैं। भारत के लोकतंत्र को देखने की गांधी की दृष्टि बेहद सेवाभावी रही। वे इसे लोक कल्याण से जोड़ कर देखते थे। वे खांटी खादीधारी और ग्रामीण की तरह सोचते थे कि जनता की सेवा करना हम सबका कर्तव्य है। इसके लिए किसी पद या दायित्व की जरूरत नहीं है। बिना सत्तारूढ़ हुए भी जनता पर अधिकार हो सकता है और जनता में सर्वमान्य भी हो सकते हैं। महात्मा गांधी यही सिखाते हैं और भारत के नेताओं से ऐसी ही अपेक्षा किया करते थे।

राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में गांधीवाद की झलक दिखाई भी देती है, लेकिन संविधान समिति के सदस्यों में इसे लेकर गहरा मतभेद रहा। बहस, तर्क और असहमति लोकतंत्र को मजबूत रखने वाले तीन महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत का संविधान कैसा हो इस पर खूब बहस हुई, तर्क भी रखे गए और अंततः संविधान बन गया। लेकिन असहमति अभी भी खत्म न हुई। खासकर ग्राम स्वराज को लेकर संविधान समिति के विद्वान् सदस्य एक दूसरे के सामने थे। कुछ लोगों ने ग्राम परिषद के आधार पर पुनर्जीवित पंचायती राज प्रणाली और गांधीवादी संविधान की वकालत की जिसमें गांव राजनीति और प्रशासन का केंद्र बिंदु होता। वहीं डॉ. आंबेडकर गांवों में  ऊंची जातियों के प्रभुत्व को लेकर आशंकित थे। उन्होंने ग्राम स्वराज की अवधारणा को मजबूत भारत के लिए चुनौती और संकट बताया। जब संविधान लागू हुआ तो उदार और वृहत संवैधानिक प्रावधानों के बाद भी देश के महान स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी ने इसकी तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इस संविधान में कुछ भी गांधीवादी नहीं है। निडर और जाने माने स्वतंत्रता सेनानी के हनुमंतियाँ ने तो यह तक कह दिया कि उनके जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने वीणा और सितार के संगीत की कामना की थी, लेकिन बदले में उन्हें अंग्रेजी बैंड मिला।

भारत में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई गई है और ब्रिटेन की तर्ज पर ही फर्स्ट पास्ट द पोस्ट अर्थात सर्वाधिक मतप्राप्त व्यक्ति की विजय की चुनाव प्रणाली और केबिनेट प्रणाली को अपनाया गया। महात्मा गांधी बहुमत के शासन से उभरने वाले अधिनायकवादी नेतृत्व के प्रति आशंकित थे। वे इसीलिए दलविहीन लोकतांत्रिक प्रक्रिया चाहते थे। अब लोकतंत्र में सत्य और अहिंसा न तो नीतियों में है, न सत्ता इस ओर प्रतिबद्ध है और न ही जनता ऐसी प्रतिबद्धता दिखाती है। गांधी इसे लेकर सदा आशंकित रहे, लेकिन उन्होंने कभी समझौता भी नहीं किया। वे कहते थे कि जिस प्रकार मैं किसी अंधे आदमी को सुंदर दृश्यों का आनंद लेने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता, उसी प्रकार कायर को अहिंसा का पाठ नहीं पढ़ा सकता। अहिंसा तो वीरता की चरम सीमा है।

खादी के तिरंगे झंडे को स्वयं महात्मा गांधी ने चुना था। केसरिया, हरे और सफ़ेद रंग के बीच में चरखा रखा हुआ था, जो भारत की आत्मनिर्भरता और अहिंसा का प्रतीक था। आज़ादी के समय कुछ लोगों के द्वारा चरखे को गांधी का खिलौना कहकर इसे हटाने पर जोर दिया गया और अंततः इसे हटा भी दिया गया। इसकी जगह अशोक चक्र को रखा गया। यह चक्र सम्राट अशोक के विजेता सैनिकों का युद्ध चिन्ह था। इस प्रकार सख्ती तथा साहस के प्रतीक दो शेरों के बीच शक्ति तथा सत्ता का प्रतीक अशोक का धर्म चक्र नये भारत का प्रतीक बन गया। गांधी को जब इस बात का पता चला तो इस प्रकार के संदेश को लेकर उदास हुए।

किसान गदर में भी हाथों में तिरंगा ही था। गणतन्त्र दिवस होने से ऐसे सैकड़ों नन्हे हाथ होंगे जिन्होंने तिरंगा थाम रखा होगा। इन सबके बीच वीरता का प्रदर्शन भी हुआ, जो किसानों के कुछ समूहों और सुरक्षाबलों द्वारा हुआ। इन सबमें भारत की आत्मा, सत्य, अहिंसा, सुशासन और लोककल्याण लहूलुहान हुआ। गांधी की हत्या भी कुछ ऐसे ही हुई थी और उसे सही ठहराने के प्रयास भारत भूमि पर हर दिन किये जाते हैं। वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्हें भुलाने की हर कोशिश आत्मघाती नजर आती है। अंततः बापू ने ही तो कहा था कि मैं अपने देश या अपने धर्म के उद्धार के लिए सत्य और अहिंसा की नीति की बलि नहीं दूंगा। वैसे इनकी बलि देकर देश या धर्म का उद्धार नहीं किया जा सकता।