किसान आंदोलन: उम्मीद की वापसी का जश्न

यह आंदोलन भारतीय आजादी के बाद के आंदोलनों जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन या मल्कानगिरी में पनपे जनआंदोलनों की परंपरा को नई ऊँचाइयों पर ले गया है

Updated: Dec 12, 2021, 02:24 PM IST

किसान आंदोलन: उम्मीद की वापसी का जश्न
Photo Courtesy: amar ujala

आंदोलन न तो कभी पूरी तरह से कभी सफल होते हैं और न ही असफल! आंदोलन एक ऐसी सतत् प्रवाहमान प्रक्रिया है, जो सत्ता को पटरी पर लाने का लगातार प्रयास करती रहती है। कई बार यह प्रक्रिया सफल होती है और कई बार यह सफल होने के नए आयाम तलाशती नजर आती है। वस्तुतः आंदोलन सत्याग्रह का पर्याय है। जिन आंदोलनों में सत्य के प्रति आग्रह नहीं होता वे हुड़दंग में बदल जाते हैं। ऐसा हम तमाम मामलों में देखते हैं। परंतु वर्तमान कृषक आंदोलन इसलिए अनुकरणीय है कि 15 महीने से ज्यादा समय तक तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी निरंतरता बनाए रखते हुए यह कभी भी हुड़दंग में नहीं बदला। मालूम नहीं यह उदाहरण इस आंदोलन को समझने के लिए कितना उचित अथवा अनुकूल है? आप फैसला कीजिएगा और इसे वर्तमान संदर्भ से जोड़ने की कोशिश कीजिएगा ! मध्यकाल में राज्य पर आक्रमण होने की दशा में राज्य अपने यहां किलाबंदी कर लेते थे। विपक्षी फौजें बाहर डेरा डाल कर बैठ जाती थीं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी क्षमताओं को आंकते हुए दूसरे के हताश होने का इंतजार करते रहते थे। अपने-अपने ढंग से अपनी स्थिति को मजबूत बनाते रहते थे। किसान आंदोलन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ।  किसान दिल्ली जाना चाहते थे। सरकार ने किलाबंदी कर दी। किसान नए भारत के नए किले दिल्ली के बाहर डेरा डाल कर बैठ गए।

सरकार को लगा थोड़े दिन में ‘‘रसद’’ मिलना बंद हो जाएगी तो किसानों की वापसी हो जाएगी। परंतु हुआ इसका ठीक उल्टा ! किसानों को दुनिया भर से रसद ही नहीं ‘‘दुआएं’’ भी मिलने लगीं। धीरे-धीरे आंदोलन स्थल नए गांवों में तब्दील होने लगे! उधर सरकार की किलेबंदी भी बढ़ती गई। पहले सादी रुकावट, उसके बाद कांक्रीट की दीवार, इसके बाद खाली कंटेनर, फिर सड़क पर कीलों का गाड़ा जाना, गहरी खंदकें खोदना, विदेशी सीमा पर लगने जैसे कंटीले तार लगाना, पानी बंद कर देना, बिजली बंद कर देना, शौचालय सुविधा निरस्त करना, आदि-आदि। सरकार जैसे-जैसे किलेबंदी मजबूत करती गई किसान उतने ही निश्चित होते गए। वे समझते जा रहे थे कि सरकार में निराशा बढ़ती जा रही है, तभी वह दिनों-दिन अधिक कठोर होते जा रही है। किसान अब खालिस्तानी, नक्सली, आतंकवादी, मवाली जैसे विशेषणों से नवाजे जाने लगे थे। इसके ठीक विपरीत ऐसा हर विशेषण किसानों को नए सिरे से स्वमूल्यांकन को प्रेरित कर रहा था। हर अपशब्द उन्हें कमोवेश शिवत्व प्रदान कर रहा था। वे इस विष को ग्रहण कर देश को सत्य के आग्रह यानी सत्याग्रह का अमृत लौटा रहे थे। ये सब किसान थे। ये जमीन को जानते हैं, उससे उनका जीवंत नाता बना रहता है। उनके लिए दिल्ली की जमीन गांव की जमीन से अलग थोड़े ही है। वे वहां भी खेती करने लगे। उन्होंने बंजर जमीन को हरा बना दिया।

पाश ने लिखा है, ‘‘मैं घास हूँ। मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा/बंगे को ढेर कर दो/ संगरूर को मिटा डालो/ धूल में मिटा दो लुधियाना का जिला / मेरी हरियाली अपना काम करेगी / दो साल, दस साल बाद / सवारियां फिर किसी कंडक्टर से पूछेंगी / ‘‘यह कौन सी जगह है ?/ मुझे बरनाला उतार देना जहाँ हरे घास का जंगल है।’’ (बंगे, संगरूर, लुधियाना व बरनाला, पंजाब के कस्बे/शहर) याद रखिए किसान की जड़ें कभी सूखती नहीं। जरा सी नमी मिलेगी वह फिर से पनप जाएगा। इक्कीसवीं शताब्दी में एक साल से ज्यादा खुले आसमान के नीचे अपनी शर्तों पर और अपने सिद्धान्तों पर जीना कोई आसान कार्य नहीं था। यह आंदोलन आजादी के आंदोलन की निरंतरता ही है। गांधी जी ने कहा भी था, कि आजादी के बाद के आंदोलन ज्यादा कठिन होंगे क्योंकि तब हमें अपनी ही चुनी हुई सरकार से निपटना होगा। किसानों ने यह दिखला दिया कि भारत द्वारा अहिंसात्मक तरीकों से प्राप्त आजादी कितनी विश्वसनीय और शाश्वत प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को नहीं व्यक्ति के दंभ को तोड़ने में विश्वास रखती है। सरकार का संचालन करने वालों का दंभ टूट गया। आंदोलन का, संविधान का व लोकतंत्र का प्राथमिक उद्देश्य भी साथ ही साथ प्राप्त हो गया।

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गौरतलब है किसान सबके हित की बात कर रहे थे। परंतु इसे एक नई तरह की जिद ने समझने से इंकार कर दिया। भगवान सिंह भारतीय सभ्यता की निर्मिति में लिखते हैं, ‘‘विकास का यह विचित्र तर्क है कि जो सबके हित की बात करते हैं, वे पिछड़े समझे जाते हैं। उनको पिछड़ा सिद्ध करके उसी समाज का अपने हित में दोहन करने वाले सभ्यता के उन्नायक मान लिए जाते हैं। समाजवाद और पूंजीवाद के टकराव में भी यही हुआ। राक्षसों/असुरों और देवों/कृषिकर्मियों के बीच टकराव में भी यही हुआ। चूक कहां थी, यह गहरे विश्लेषण की मांग करता है।’’ अभी भी किसानों को पिछड़ा समझा जा रहा है। खेती ही एकमात्र उत्पादक उद्यम है, पृथ्वी पर। यह एक दाना लेकर सौ से भी ज्यादा दाने वापस करती है। बाकी के सब तो उपभोक्ता है। जितना लेते हैं, उससे कम समाज को वापस करते हैं। वंचितों के साथ या यूं कहें कि असहमतों के साथ अन्याय कोई नई बात नहीं है। यह तो मिथक काल से ही चला रहा है। समुद्र मंथन की गाथा याद कीजिए। मंथन की प्रक्रिया में देवताओं ने सर्प को पूंछ से पकड़ा और दैत्यों (असहमतों) को मुंह की तरफ से पकड़ने को कहा। असुर/दैत्य सर्प के मुख से निकली ज्वाला से भस्म होते रहे। मंथन में जो 14 वस्तुएं निकलीं उसमें विष और अमृत दोनों ही थे। विष शिव के हिस्से में आया और अमृत सहित अन्य सभी रत्न देवताओं ने हड़प लिए। यही सब आज नहीं हो रहा ? देश का आधार कृषि है। मौसम और ऋण की ज्वाला में जलता किसान हमेशा खाली हाथ ही रह जाता है। अभी भी बहुत वर्षों बाद यह साथ में कुछ घर तो ले नहीं जा पा रहा है लेकिन खुशी इस बात की है कि जो उससे लूटा गया था वह उसने वापस पा लिया है। अमृत अभी भी उससे बहुत दूर है।

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किसान अब घर लौट रहे हैं और पुलिस आंदोलन स्थल से बेरीकेट हटा रही है। पुलिस ने किसानों पर बलप्रयोग किया परंतु किसान उन्हें लड्डू खिला रहे हैं। किसानों का ‘‘फतेह मार्च’’ (विजय यात्रा) शुरु हो चुका है। यह कुछ दिनों तक जारी रहेगा। इस फतह पर उन्हें घमंड नहीं है। उनकी भाषा में अभी भी खरे गेहूँ की खनक सुनाई दे रही है। 700 से ज्यादा साथियों की असामयिक मौत ने भी उन्हें कटु नहीं बनाया। क्या सरकार/सरकारों में भी यह भावना विकसित होगी ? एक और घटना पर गौर करिए। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी और जनरल स्मट्ज समझौते पर पहुंचे तो गांधी जी ने उन्हें अपने हाथ से बनाई एक जोड़ी सेंडल भेंट की। इसके करीब 25 साल बाद जब सन् 1939 में गांधी जी की सत्तरवीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी, तब जनरल स्मट्ज ने सेंडल वापस करते हुए लिखा था, ‘‘एक युग पहले मैं गांधी का दुश्मन था। गांधी ने बहुत परेशान किया। सत्याग्रह नई चीज थी। इसका मुकाबला कैसे किया जाए, यह पता न था। मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे ही उन जैसे महान व्यक्तित्व का विरोध करना पड़ा। लेकिन तब भी उनके मन में मेरे लिए सम्मान था। मैंने गौर किया कि गांधी हर हाल में अटल रहते हैं और विरोधी के प्रति उनके मन में कोई नफरत नहीं होती। मैंने इस चप्पल का कई साल गर्मियों में इस्तेमाल किया। फिर मैंने अनुभव किया कि ऐसे महान व्यक्ति के द्वारा निर्मित चप्पल को अपने पैरों में डालने का योग्य पात्र मैं नहीं हू।’’ यह कथन इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण है कि तब तक भारत आजाद नहीं हुआ था और अंग्रेज हुक्मरानों की निगाह में तब भी गांधी से बड़ा कोई दूसरा दुश्मन नहीं था।

जनरल स्मट्ज की स्वीकारोक्ति से हम सबको सीखना चाहिए। किसानों के इस जमावड़े में बहुतेरे किसान गांधी के वैचारिक दृष्टिकोण से शायद सहमत न भी हों, लेकिन उन्होंने अपने आचरण से गांधी को सिद्ध किया है। उनके लिए गांधी महज ध्वनित करने वाला मंत्र नहीं रहाया, दोहरा कर सिद्धी पाने का छलावा भी नहीं रहा, लेकिन इन किसानों ने गांधी मंत्र के मर्म को समझा और इसे सिद्ध किया। अब सरकार की बारी है कि वह बेहद विनम्र स्वीकारोक्ति के साथ किसानों की मांगों का बिना लाग लपेट के स्वीकार कर बड़प्पन दिखाए। जनरल स्मिट्ज को हम इसलिए शायद याद न भी रखें कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की जेल में बापू को यातनाएं दी थीं, लेकिन इसलिए जरुर याद रखेंगे कि 25 वर्षों बाद उन्होंने अपनी गलती को स्वीकारा। उन सेंडल को गांधी को वापस किया न कि उनकी नीलामी कर बेशकीमती धन कमाया। किसान आंदोलन इस हिंसा से लबालब दुनिया में सत्य और अहिंसा की ठंडी बयार की तरह हम सब उतरा। उसने संविधान और लोकतंत्र में घटती आस्था की काफी हद तक बहाली की है। वह गांधी की परिकल्पना के उस सच्चे सत्याग्रही के पैमाने पर खरा उतरा जिसमें कि इतना साहस भर गया था कि वह अपने प्राण न्योछावर करने में सक्षम हो गया। सात सौ किसानों की शहादत इसका ज्वलंत प्रमाण है और उतना ही ज्वलंत प्रमाण है कि इतनी बड़ी संख्या में साथियों की मौत के बावजूद लाखों-लाख किसानों का स्वयं पर संयम रख पाना। इस आंदोलन में भागीदारी करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का बराबरी का योगदान है, न किसी का कम और न किसी का ज्यादा।

यह आंदोलन भारतीय आजादी के बाद के आंदोलनों जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन या मल्कानगिरी में पनपा जनआंदोलनों की परंपरा को नई ऊँचाइयों पर ले गया है। इसलिए यह भी जरुरी है कि हम आजादी के पहले व बाद हुए सभी जन आंदोलनों के प्रति कृतज्ञता अर्पित करें जिन्होंने इस किसान आंदोलन को नई जमीन दी और नई राह दिखाई। पाश ने लिखा भी है, ‘‘सबसे खतरनाक होता है/ मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का सब सहन कर जाना / घर से निकलना काम पर / और काम से लौटकर घर आना/ सबसे खतरनाक होता है / हमारे सपनों का मर जाना।’’ हम ऋणी है किसानों और किसान आंदोलन के जिन्होंने हमारे सपने फिर से जिंदा कर दिए। हम इसलिए भी आभारी है किसान आंदोलन के कि उन्होंने पाश की इस अधूरी कविता को पूरा कर दिया है। उन्होंने दिखा दिया है सबसे खतरनाक से भी जीता जा सकता है।

(गांधीवादी विचारक चिन्मय मिश्रा के यह स्वतंत्र विचार हैं)