विकास के दौर में घुटता शहर का दम

शहरों के विकास को रोकना समाधान नहीं है। समस्या विकास की दिशा और उसके नियोजन में है। जिस शहर में नई सड़क तो बन जाए लेकिन बरसात का पानी निकलने का रास्ता न बचे, जिस शहर में हजारों नए मकान बन जाएं लेकिन पेड़ और खुले मैदान खत्म हो जाएं, जिस शहर में मॉल और पार्किंग तो बढ़ जाएं लेकिन सार्वजनिक परिवहन कमजोर हो जाए, वहां विकास का मॉडल अधूरा ही माना जाएगा।

Updated: Oct 29, 2026, 10:17 AM IST

विकास के दौर में घुटता शहर का दम आज के शहरीकरण की सबसे कड़वी सच्चाई बन चुका है। आधुनिकता की दौड़ में हम कंक्रीट के जंगल तो खड़े कर रहे हैं, लेकिन उस खुली हवा को खो रहे हैं जिसमें हम सांस लेते हैं। हरी-भरी जमीनों और पेड़ों को काटकर बहुमंजिला इमारतें और मॉल बनाए जा रहे हैं। हर घर में कई गाड़ियां होने के कारण सड़कों पर ट्रैफिक जाम और जहरीला धुआं (कार्बन मोनोऑक्साइड) आम बात हो गई है। शहरों के आस-पास लगी फैक्ट्रियों से निकलने वाला केमिकल युक्त धुआं और कचरा हवा-पानी को जहरीला बना रहा है। 

प्लास्टिक और ठोस कचरे को सही तरीके से नष्ट न करके खुले में जलाया जाता है, जिससे हवा में प्रदूषण फैलता है। इससे शहरों में सांस के मरीज, अस्थमा, दिल की बीमारियां और फेफड़ों का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ रहा है। पेड़ न होने के कारण शहर 'हीट आइलैंड' बन रहा है, जिससे गर्मियों में तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है। हर समय का शोर, ट्रैफिक और हरियाली की कमी इंसानों में चिड़चिड़ापन और अवसाद (डिप्रेशन) बढ़ा रही है। 

वायु प्रदूषण के कारण व्यक्ति में तनाव पैदा करने वाले हार्मोनों का स्तर बढ़ जाता है और वह अवसाद का शिकार हो जाता है। बुजुर्गों में समझने की क्षमता में गिरावट संबंधी डिमेंशिया रोग हो जाता है। गर्भवती महिलाओं को गर्भपात जैसी समस्याओं का सामना करना होता है और गर्भस्थ शिशु का जन्म समय से पूर्व ही हो जाता है। दूसरी ओर जब शहर बिना किसी सही योजना के तेजी से फैलते हैं, तो वे पानी के प्राकृतिक बहाव को रोक देते हैं, जिससे भारी बारिश के दौरान पूरा शहर पानी में डूब जाता है। 

शहरों में जमीनों की बढ़ती कीमतों के कारण पुराने तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों (वेटलेंड) को पाटकर उन पर इमारतें बना दी गई हैं। इससे बारिश के पानी को इकट्ठा होने की प्राकृतिक जगह नहीं मिलती है। सड़कों, फुटपाथों और इमारतों के निर्माण के कारण जमीन कंक्रीट से ढक जाती है। मिट्टी न होने के कारण बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता। इसके परिणामस्वरूप 100 प्रतिशत पानी सतह पर बहने लगता है, जो जलभराव का रूप ले लेता है। 

नालों में प्लास्टिक, सॉलिड वेस्ट और निर्माण का मलबा फेंक दिया जाता है। इससे नाले जाम हो जाते हैं और मामूली बारिश में भी पानी सड़कों पर आ जाता है। भारत में शहरों के अनियोजित विस्तार को रोकने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए पहले से ही कई नियम और दिशानिर्देश मौजूद हैं। केंद्र सरकार की अर्बन एंड रीजनल डवलपमेंट प्लान्स फोर्मुलेशन एंड इम्पलिमेंटेशन (यूआरडीपीएफआई) गाइडलाइन्स, 2014 शहरों और क्षेत्रों की योजनाबद्ध विकास प्रक्रिया के लिए एक व्यापक ढांचा देती हैं। इनमें शहर की सीमा से बाहर के क्षेत्र और आसपास के बसाहटों को भी क्षेत्रीय योजना में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।‌

इसी तरह माॅडल बिल्डिंग बाइ-लाॅज, 2016 में वर्षाजल संचयन को भवन नियोजन का हिस्सा बनाया गया है। केंद्र सरकार के अनुसार 100 वर्गमीटर या उससे अधिक के प्लॉट वाले भवनों के लिए वर्षाजल संचयन की व्यवस्था को भवन योजना में शामिल करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि शहरी विकास राज्य का विषय होने के कारण इन प्रावधानों को लागू करने की वास्तविक जिम्मेदारी राज्यों, विकास प्राधिकरणों और स्थानीय निकायों की है।

तालाबों और आर्द्रभूमियों के मामले में भी वेटलेंड (कनजर्वेशन एंड मेनेजमेंट) रूल्स, 2017 महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा उपलब्ध कराता है। इन नियमों के तहत आर्द्रभूमियों को गैर-आर्द्रभूमि उपयोग में बदलना, अतिक्रमण करना, ठोस कचरा डालना और अनुपचारित अपशिष्ट या औद्योगिक कचरा डालना प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल है। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में वेटलेंड ऑथोरिटस की व्यवस्था भी की गई है। शहरी बाढ़ को लेकर भी राष्ट्रीय स्तर पर दिशानिर्देश मौजूद हैं। 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन से जुड़े दस्तावेजों में भूमि उपयोग नियोजन को बेहतर बनाने, प्राकृतिक आर्द्रभूमियों की रक्षा करने, जल-संवेदनशील शहरी डिजाइन अपनाने तथा प्राकृतिक ढाल और जल के बहाव को ध्यान में रखकर शहरों की योजना बनाने पर जोर दिया गया है। कचरे के मामले में सोलिड वेस्ट मेनेजमेंट रुल्स, 2016 शहरी स्थानीय निकायों और कचरा पैदा करने वालों की जिम्मेदारियां निर्धारित करता है। कचरे को अलग-अलग करना और उसका निर्धारित तरीके से संग्रह एवं प्रबंधन करना नियमों का हिस्सा है। निर्माण और ध्वस्तीकरण से निकलने वाले मलबे के लिए भी अलग नियामक व्यवस्था है। 

शहरों में बढ़ते शोर को नियंत्रित करने के लिए नॉइज पालूशन (रेगुलेशन एंड कंट्रोल) रूल्स, 2000 लागू है। इन नियमों में विकास प्राधिकरणों और स्थानीय निकायों को शहर की योजना बनाते समय शोर प्रदूषण को भी गुणवत्ता-ए-जीवन के एक मानक के रूप में ध्यान में रखने की बात कही गई है। आवासीय क्षेत्रों के लिए दिन में 55 और रात में 45 डेसिबल आवाज की निर्धारित सीमा है। भविष्य में शहरों की योजना केवल कितनी सड़कें, कितनी इमारतें और कितने मॉल बनेंगे, इस आधार पर नहीं होनी चाहिए। शहर की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि वहां लोगों को कितनी स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, हरित क्षेत्र, सार्वजनिक परिवहन और जलवायु जोखिमों से सुरक्षा मिलती है। 

सबसे पहले मास्टर प्लान को जमीन की प्राकृतिक संरचना के आधार पर तैयार करना होगा। जहां से बरसाती पानी स्वाभाविक रूप से गुजरता है, उन जलधाराओं, नालों, तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों को निर्माण क्षेत्र में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। विकास की अनुमति देने से पहले यह देखना जरूरी होना चाहिए कि उस जमीन की प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था क्या है। 

दूसरा, शहरों में हरित क्षेत्र को केवल सौंदर्य का विषय नहीं बल्कि आवश्यक शहरी आधारभूत संरचना माना जाना चाहिए। पेड़ों, खुले मैदानों, पार्कों और हरित गलियारों का न्यूनतम मानक मास्टर प्लान में स्पष्ट होना चाहिए। सड़क निर्माण और भवन निर्माण के साथ वृक्षारोपण तथा वृक्ष संरक्षण को भी अनिवार्य नियोजन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। 

तीसरा, कंक्रीट से ढके क्षेत्र को कम करना होगा। फुटपाथों, पार्किंग और खुले स्थानों में जहां संभव हो, ऐसी सतहों का उपयोग किया जाना चाहिए जिनसे पानी जमीन में जा सके। बड़े भवन परिसरों में वर्षाजल संचयन और भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था केवल कागज पर नहीं बल्कि वास्तविक निरीक्षण के साथ लागू होनी चाहिए।  चौथा, शहरों की सड़क और परिवहन नीति को निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन केंद्रित बनाना होगा। बस, मेट्रो, पैदल मार्ग और साइकिल मार्गों का ऐसा नेटवर्क बनाया जाए कि रोजमर्रा के काम के लिए निजी वाहन पर निर्भरता कम हो। 

इससे ट्रैफिक जाम, ईंधन की खपत, वायु प्रदूषण और शोर को कम करने में मदद मिल सकती है। पांचवां, शहर के भीतर और आसपास उद्योगों के लिए भूमि उपयोग की स्पष्ट योजना होनी चाहिए। आवासीय क्षेत्रों, स्कूलों और अस्पतालों के पास प्रदूषणकारी गतिविधियों को नियंत्रित किया जाना चाहिए। वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए एअर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल आफ पालूशन) एक्ट, 1981 के तहत केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की जिम्मेदारियां निर्धारित हैं।छठा, कचरा प्रबंधन को शहर की मूलभूत सेवा माना जाना चाहिए। 

घर से लेकर बाजार और निर्माण स्थल तक कचरे का पृथक्करण, संग्रह, पुनर्चक्रण और वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित करना होगा। खुले में कचरा जलाने और नालों में कचरा डालने की प्रवृत्ति पर प्रभावी निगरानी जरूरी है।सातवां, हर शहर का अपना अर्बन फल्ड मेनेजमेंट प्लान होना चाहिए। इसमें केवल बड़े नाले बनाने के बजाय प्राकृतिक जल निकासी, तालाब, झील, आर्द्रभूमि, वर्षाजल संचयन, जल निकासी क्षमता और बाढ़ के संभावित क्षेत्रों का एक साथ अध्ययन किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर के आपदा प्रबंधन दस्तावेज भी जल-संवेदनशील शहरी नियोजन और प्राकृतिक जल प्रवाह को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। 

शहरों के विकास को रोकना समाधान नहीं है। समस्या विकास की दिशा और उसके नियोजन में है। जिस शहर में नई सड़क तो बन जाए लेकिन बरसात का पानी निकलने का रास्ता न बचे, जिस शहर में हजारों नए मकान बन जाएं लेकिन पेड़ और खुले मैदान खत्म हो जाएं, जिस शहर में मॉल और पार्किंग तो बढ़ जाएं लेकिन सार्वजनिक परिवहन कमजोर हो जाए, वहां विकास का मॉडल अधूरा ही माना जाएगा।भारत की नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल हेबिटेट भी कम कार्बन वाली शहरी विकास और जलवायु जोखिमों के प्रति शहरों की लचीलापन पर जोर देती है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में शहरी नियोजन, हरित आवरण और जैव विविधता, परिवहन एवं वायु गुणवत्ता, जल प्रबंधन और कचरा प्रबंधन शामिल हैं।

इसलिए भविष्य के शहरों का नियोजन 'पहले प्रकृति, फिर निर्माण' के सिद्धांत पर होना चाहिए। तालाब बचें, नदियों के प्राकृतिक बहाव बचें, पेड़ बचें, मिट्टी बची रहे और खुले क्षेत्र बचें इसके बाद ही भवनों और सड़कों की योजना बने। आखिर शहर केवल इमारतों का समूह नहीं होता। शहर मनुष्यों, पेड़ों, जल, मिट्टी, हवा और जैव विविधता का साझा आवास है। यदि विकास की कीमत पर हवा जहरीली, पानी दुर्लभ, जमीन अभेद्य और गर्मी असहनीय होती गई, तो हमारे पास आधुनिक शहर तो होंगे, लेकिन उनमें स्वस्थ जीवन के लिए जगह कम होती जाएगी।भविष्य का शहर वह नहीं होगा जहां सबसे ऊंची इमारत होगी, बल्कि वह होगा जहां विकास के साथ सांस लेने की जगह, पानी के बहने की जगह और प्रकृति के जीवित रहने की जगह भी बची होगी। 

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं।)