मध्य प्रदेश के दो मंत्रियों में ठनी, वित्त मंत्री ने पंचायत मंत्री को दी फ़िज़ूलख़र्ची से बचने की हिदायत

वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने पंचायतों के ऑडिट का काम 1.81 करोड़ की जगह 26.05 करोड़ रुपये में कराने को बताया फिजूलखर्ची, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री महेंद्र सिंह सिसौदिया को दी नसीहत

Updated: Mar 19, 2021, 05:25 PM IST

मध्य प्रदेश के दो मंत्रियों में ठनी, वित्त मंत्री ने पंचायत मंत्री को दी फ़िज़ूलख़र्ची से बचने की हिदायत
Photo Courtesy: mp breaking

भोपाल। मध्य प्रदेश के दो मंत्रियों के बीच पत्रों के जरिए तनातनी जारी है। मामला है प्रदेश की पंचायतों के ऑडिट का। खबर है कि शिवराज सरकार के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री महेंद्र सिंह सिसौदिया को फिजूलखर्ची न करने की नसीहत दी है। दरअसल, प्रदेश की पंचायतों के ऑडिट का जो काम पिछले वर्षों में सिर्फ 1.81 करोड़ रुपये में हुआ था, इस बार उसी काम पर 26 से 40 करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी हो रही है। जिस वित्त मंत्रालय ने एतराज़ किया है।

पंचायतों के ऑडिट का काम पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग करवाता है। विभाग ने पंचायतों को क्लस्टर में बांटकर ऑडिट करवाने की तैयारी की है। इसके लिए ई-टेंडर भी जारी किए जा चुके हैं। जिससे खर्च में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है जिस पर वित्त विभाग ने आपत्ति जताई है।

वित्त मंत्री ने क्लस्टर आधारित ऑडिट को बताया फिजूलखर्ची

मध्य प्रदेश के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने पंचायत मंत्री महेंद्र सिंह सिसौदिया से कहा है कि वे फिजूलखर्ची से बचें। वित्त मंत्री ने इस बारे में महेंद्र सिंह सिसोदिया को एक पत्र भी लिखा है। उन्होंने सुझाव दिया है कि क्लस्टर वार ऑडिट के बारे में सोच-समझ कर फैसला लें। वित्त मंत्री का कहना है कि जब कम राशि में बेहतर काम हो रहा है, तो ज्यादा खर्च वाली विवादित ऑडिट व्यवस्था को क्यों अपनाया जा रहा है। दरअसल क्लस्टर आधारित वित्तीय लेखा परीक्षा की व्यवस्था मध्य प्रदेश में 2015 से 2017 तक जारी थी। यह व्यवस्था न सिर्फ खर्चीली थी, बल्कि इसमें कई बड़ी गड़बड़ियां भी सामने आई थीं। इसी वजह से तत्कालीन एसीएस राधेश्याम जुलानिया ने क्लस्टर व्यवस्था को समाप्त कर दिया था।

ऑडिट की शर्तों पर भी आपत्ति हो रही है

इस ऑडिट के लिए जो ई-टेंडर निकाला गया है, उसकी शर्तों पर भी लोगों ने आपत्ति जताई है। इनमें एक शर्त के अनुसार साल 2015 से 2017 के बीच काम कर चुकी सीए फर्म्स ही टेंडर में शामिल हो सकती हैं। इस बारे में कई फर्म्स ने एसीएस मनोज श्रीवास्तव से शिकायत की है। मार्च के पहले दिसंबर में भी टेंडर जारी हुआ था, तब भी वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने आपत्ति की थी। तब इसे निरस्त कर दिया गया था, पर अब एक बार फिर उसी व्यवस्था के तहत ई-टेंडर मंगाए जा रहे हैं।

एमपी में हैं 17 क्लस्टर, एक क्लस्टर में हैं 1100 पंचायतें

मध्य प्रदेश में पंचायतों के 17 क्लस्टर हैं। एक क्लस्टर में एक क्लस्टर में 4 से 5 जिलों और करीब 1100 पंचायतों को शामिल किया गया है। मौजूदा ई-टेंडर की शर्तों के मुताबिक एक फर्म को दो क्लस्टर के ऑडिट का काम दिया जा सकेगा। इस साल के टेंडर  की शर्त है कि पहले काम कर चुकी संस्थाएं ही टेंडर में भाग ले सकती हैं। पिछली बार इस ऑडिट में 22.48 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। ऑडिट फर्मों पर समय पर रिपोर्ट पेश नहीं करने और केवल पंचायतों की लिस्ट थमाकर करोड़ों रुपए का पेमेंट लेने के आरोप भी लगे थे।

इस मामले में इतनी बड़ी गड़बड़ी उजागर होने के बाद तत्कालीन एसीएस आरएस जुलानिया ने इस क्लस्टर ऑडिट को खत्म करके जिलावार ऑडिट व्यवस्था लागू कर दी थी। इस नई व्यवस्था के तहत सिर्फ 2.50 करोड़ रुपए में सभी जिलों की पंचायतों का ऑडिट हो गया था। ऐसे में अब एक बार फिर से कई गुना महंगी क्लस्टर वार ऑडिट व्यवस्था लागू करने पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। देखना यह भी है कि क्या दो मंत्रियों के बीच मतभेद में उलझे इस मामले का समधान करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज चौहान दखल देते हैं या नहीं।