जी भाईसाहब जी:  बीजेपी में टूट गया शुभंकर जोड़ियों का तिलिस्म

MP Politics: डॉ. नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देना, स्थानीय संगठन की अनदेखाी सहित बीजेपी की हार के जिम्मेदार कारणों को खोजा जा रहा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या हार के बाद बीजेपी में शुभंकर का मिथक भी टूटता जा रहा है?  

Updated: Aug 04, 2026, 03:37 PM IST

दतिया चुनाव में बीजेपी की हार पूरे देश में चर्चा में आ गई है। इस हार के कई कारण हैं। पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देना, आशुतोष तिवारी जैसा नया चेहरा उतारना, भितरघात, आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार का मैदान में होना आदि कोई कारणों बीजेपी की हार का जिम्मेदार माना जा रहा है। इस हार के बाद बीजेपी में शुभंकर का मिथक भी टूटता जा रहा है।  

बीते दो दशक से बीजेपी की हर चुनावी जीत का कारण उस वक्त में सीएम, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री की तिकड़ी को दिया जाता रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहे नरेंद्र सिंह तोमर की जोड़ी को सर्वाधिक सफल जोड़ी कहा जाता है। ऐसी जुगलबंदी की 2013 के विधानसभा चुनाव के पहले तोमर को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। प्रभात झा को छोड़ दें तो नंदकुमार सिंह चौहान, राकेश सिंह और वीडी शर्मा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ जुगलबंदी में ही कार्य किया। इनके साथ संगठन महामंत्री अरविंद मेनन सत्ता केंद्र का त्रिकोण बनाते थे। इन जोड़ियों ने मिलकर अनेक चुनाव लड़े और जीते।

पहले अरविंद मेनन हटाए गए फिर 2023 में शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाया गया। बाद में वीडी शर्मा की जगह हेमंत खंडेलवाल प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद से एमपी बीजेपी में शुभंकर जोड़ी का मिथ टूट गया। डॉ.मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए 4 विधानसभा उपचुनावों में 2 सीटों पर ही बीजेपी जीत पाई है। विजयपुर और दतिया जैसी 2 महत्वपूर्ण सीटें विपक्ष के खाते में चली गई हैं। अमरवाड़ा और बुधनी बीजेपी ने जीती जरूर लेकिन बुधनी में जीत का अंतर कम हुआ।

दतिया में हार के बाद सीएम डॉ. मोहन यादव कह रहे हैं कि दतिया की सीट कांग्रेस की थी, उपचुनाव में कांग्रेस के पास चली गई। मगर जितना सरल यह कहना है, बात उतनी सरल नहीं है। दतिया हार के बाद यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि राज्य में अब मुकाबला एकतरफा नहीं रहा है। आमतौर पर उपचुनाव में सत्ता दल की एकतरफा जीत होती है लेकिन एमपी में उपचुनावों में भी कांटे की टक्कर हो रही है। 

सिर्फ मैनेजमेंट से नहीं जीते जा सकते चुनाव

दतिया उप चुनाव के परिणाम का अपनी-अपनी तरह विश्लेषण और आकलन किया जा रहा है। इस उपचुनाव में भितरघात दोनों दलों में हुआ है। कांग्रेस ने तो भितरघात की शिकायत पर राजेंद्र भारती को मतगणना के एक दिन पहले ही पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया है। अब हारे हुए बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी भितरघात की शिकायत लेकर पार्टी कार्यालय पहुंचे हैं। बीजेपी के नेता कह रहे हैं कि दतिया में खुल कर दगा किया गया है। 

यह एक तथ्य है कि पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देना तथा मंच से डॉ. नरोत्तम मिश्रा का रो देना बीजेपी को भारी पड़ा है। डॉ. नरोत्तम मिश्रा के आंसूओं में बीजेपी बह गई। दूसरे तथ्य यह है कि नरोत्तम मिश्रा तथा समर्थकों की नाराजगी को देखते हुए बीजेपी ने स्थानीय मुद्दों, नेताओं को किनारे कर बाहरी नेताओं की फौज को मैदान में उतारा था। दतिया में 14 मंत्री, 6 सांसदों के साथ 110 वर्तमान और पूर्व विधायक डैमेज कंट्रोल का काम कर रहे थे मगर यह प्रयोग काम नहीं आया। बीजेपी ने बाहरी प्रत्याशी ही नहीं मैदान में उतारा बल्कि चुनाव प्रबंधन के लिए भी बाहरी नेताओं पर ही भरोसा किया।

स्थानीय संगठन और नेताओं की उपेक्षा करने से मतदाताओं का भरोसा भी खो गया।  इससे यह संदेश गया कि सिर्फ मैनेजमेंट के सहारे चुनाव नहीं जीते जाते हैं। स्थानीय मुद्दों और नेताओं को शामिल करना ही चाहिए। बीजेपी की इस हार के बाद यह भी आकलन होगा कि भोपाल में हुए किसान आंदोलन, अयोध्या चढ़ावा चोरी और जेन जी आंदोलनों जैसे मुद्दों ने भी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में कितनी भूमिका निभाई है। 

अवैध व्यवसाय को बीजेपी का साथ, सड़क पर जनता

बनियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी प्रदेश की राजधानी में एक नए विवाद में घिर गई है। नए भोपाल के विभिन्न आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों पर हमेशा ही विवाद रहा है। अरेरा कॉलोनी निवासी विवेक त्रिपाठी ने 10 नंबर मार्केट में अवैध निर्माणा पर याचिका दाखिल की है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही  नगर निगम ने नए शहर के 11 सौ से ज्यादा व्यावसायक प्रतिष्ठानों को बंद किया। कुछ प्रतिष्ठानों ने नगर निगम की कार्रवाई के कुछ देर बाद ही अपनी दुकानें खोल ली। दबाव बना तो बीजेपी नेताओं ने व्यवसायियों के पक्ष में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ बैठक की। बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुद्दे के निराकरण के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाने के निर्देश दिए हैं। 

सरकार के इस फैसले के खिलाफ कॉलोनीवासी सड़क पर उतर आए हैं। रहवासी संगठनों का कहना है कि वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर की जा रही कार्रवाई का समर्थन करते हैं। आवासीय क्षेत्रों का मूल स्वरूप सुरक्षित रहना चाहिए। अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों से नागरिकों के जीवन, यातायात, पर्यावरण और सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मुख्यमंत्री के नाम दिए पत्र में कॉलोनी निवासियों ने कहा कि भूमि विकास नियम-2012 में संशोधन कर आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को अनुमति देने अनुचित है। इस प्रकार के संशोधन से भोपाल की अनेक कॉलोनियों का आवासीय चरित्र प्रभावित होगा और वर्षों से विकसित नागरिक सुविधाओं एवं जीवन-स्तर पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। रहवासी संगठन प्रस्तावित संशोधन के विरोध में जनजागरण अभियान चला रहे हैं। जनता की नाराजगी ऐसे बीजेपी नेताओं पर फूट रही है जिन पर अवैध व्यवसाय को संरक्षण देने का आरोप है।

छात्र संघ चुनाव कैसे और कब

भविष्य की राजनीति गढ़ने वाले छात्र संघ चुनाव पर सरकार ने अपना रुख साथ कर दिया है। जबलपुर हाईकोर्ट की युगलपीठ ने जनहित याचिका का निराकरण करते हुए सरकार को समय पर चुनाव प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं। जबलपुर हाईकोर्ट के समक्ष राज्य सरकार ने सितंबर 2026 में छात्रसंघ चुनाव करवाने का आश्वासन दिया है। वर्ष 2017 के बाद से प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव पर रोक लगी हुई थी। डायरेक्ट चुनाव तो तीन दशक से बंद हैं।

प्रदेश की राजनीति में वर्तमान में सक्रिय सभी बड़े नेता छात्र राजनीति से ही निकले हैं। प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव बंद होने तथा मैरिट के आधार पर छात्रसंघ का गठन होने से छात्र राजनीति का असर धीरे-धीरे खत्म हो गया। लंबे संघर्ष के बाद अब छात्र राजनेताओं को कोर्ट का साथ मिला है। छात्र संगठन सक्रिय हो गए हैं और सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है कि चुनाव समय पर और उपयुक्त प्रक्रिया से हों। उधर, जेन जी आंदोलन के बाद सरकार की कोशिश होगी कि छात्र राजनीति सशक्त आकार न ले पाए।