जी भाईसाहब जी: दिल्ली में मुलाकातें, राजधानी में उफान
दतिया उपचुनाव के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति में बदलाव को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। इस बीच मध्य प्रदेश के प्रमुख नेताओं कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, सांसद वीडी शर्मा और विधानसभा अध्यक्ष की पीएम मोदी से मुलाकात अपनी टाइमिंग के कारण चर्चा में आ गई।
दतिया उपचुनाव के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति में बदलाव को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। इस बीच मध्य प्रदेश के प्रमुख नेताओं कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, सांसद वीडी शर्मा और विधानसभा अध्यक्ष की पीएम मोदी से मुलाकात अपनी टाइमिंग के कारण चर्चा में आ गई। इस बीच नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की गृह मंत्री अमित शाह के साथ लंबी भेंट भी हुई। दतिया उपचुनाव के के बाद ये मुलाकातें अहम हो जाती हैं। चर्चा है कि इन बैठकों में दतिया उपचुनाव में हार का फीडबैक लिया जा रहा है।
इन मुलाकातों के कारण मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें भी तेज हो गई है। मंगलवार को सीएम मोहन यादव की राज्यपाल से भेंट ने बदलावों की चर्चा को हवा दी। इस मुलाकात के बाद सीएम मोहन यादव ने एक्स पर लिखा कि आज लोक भवन, भोपाल में राज्यपाल मंगुभाई पटेल से शिष्टाचार भेंट की। इस दौरान उन्हें समान नागरिक संहिता, हर घर तिरंगा अभियान एवं आगामी स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों और विकासात्मक कार्यों के निर्णयों से अवगत कराया। मुख्यमंत्री की इस पोस्ट के बाद भी राजनीतिक कयास लगाने कम नहीं हुए। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से भी मुलाकात की थी। यह मुलाकात बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मान जा रही हैं।
अनुमान लगाने के साथ ही यह गुणा-भाग भी हो रहा है कि पार्टी किस नेता को कहां सेट कर सकती है। हालांकि, राज्यसभा चुनाव के लिए रजनीश अग्रवाल तथा दतिया उपचुनाव के लिए आशुतोष तिवारी जैसे युवा कार्यकर्ताओं का चयन कर पार्टी ने चौंकाया है। इसी तरह, राष्ट्रीय कार्यकारिणी तथा कैबिनेट विस्तार में भी संभव है कि वरिष्ठों का अब उतनी तवज्जो न मिले। इस संदर्भ में पंचायत मंत्री प्रह्लाद पटेल का एक बयान चर्चा में हैं। उमरिया में पत्रकारों द्वारा एक राजनीतिक घटनाक्रम पर सवाल पूछने पर प्रहलाद पटेल ने कहा कि "हम तो चाहते हैं मुक्त हो जाएं, हमें पद का मोह नहीं है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति में व्यक्ति पद के लिए नहीं जीता है और वे अपनी मर्जी से सेवा करने आए हैं। यह बयान बताता है कि वरिष्ठ नेताओं ने अपनी नियती को कैसे स्वीकार कर लिया है।
दिल्ली में हुई बैठकों में क्या हुआ यह तो बाहर नहीं आ सकता लेकिन इन मुलाकातों के संदर्भों के आधार पर अलग-अलग अनुमान जताए जा रहे हैं। इस तरह, दिल्ली की मुलाकातें राजधानी भोपाल में राजनीतिक अनुमानों की लहरें उठा रही हैं।
शिवराज सिंह चौहान की नाराजगी का सच
राजनीतिक अनुमानों की कड़ी में बीते सप्ताह कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मोहन सरकार से नाराजगी खासी चर्चा में रही। खबर आई कि स्वयं को नजरअंदाज करने से खफा शिवराज सिंह चौहान ने सीधे पीएमओ को आपत्ति दर्ज करवाई। मीडिया में चर्चा है कि कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पीएम मोदी के नाम एक पत्र लिखा है जिसमें 21 बिंदुओं पर राज्य सरकार के साथ अपनी असहमतियों और नाराजगी को बताया। इनमें अपने ही प्रदेश में नजरअंदाज किए जाने का मामला प्रमुख था। पत्र में लिखा गया कि कृषि वर्ष मना रही मोहन सरकार ने अपने आयोजनों में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को आमंत्रित नहीं किया। इसी तरह बजट बचने के बाद भी शिवराज सिंह चौहान के क्षेत्र में सड़क निर्माण नहीं हो रहा है।
दिल्ली ने तुरंत एक्शन लिया तो मोहन सरकार सक्रिय हुई। ताबड़तोड़ जवाब तैयार कर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से भेंट की। राज्य सरकार का पक्ष है कि कृषि वर्ष के तहत हुए पांच आयोजनों में से तीन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तथा कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान शामिल हुए थे। एक कार्यक्रम में शिवराज सिंह चौहान प्रतिनिधि शामिल हुए थे। राज्य सरकार ने विदिशा में सड़क निर्माण पर भी पक्ष रखा।
अंदर खाने की खबर है कि शिवराज सिंह चौहान की असली नाराजगी की वजह मूंग की खरीद की लेकर किसान आंदोलन के समय हुआ पत्राचार है। मोहन सरकार के कृषि मंत्री ऐंदल सिंह कंसाना ने बीच आंदोलन में शिवराज को पत्र लिख कर मुद्दा केंद्र के पालने में डालने की कोशिश की। जबकि केंद्र ने पहले ही स्थिति स्पष्ट कर दी थी। आंदोलन तथा कृषि मंत्री कंसाना के पत्र ने शिवराज सिंह चौहान की छवि खराब करने का काम किया। इसने पहले से नाराज शिवराज सिंह चौहान की नाराजगी को बढ़ा दिया था। इसके बाद वे दिल्ली शिकायत करने पर मजबूर हुए।
इंफ्लूएंसर पॉलिटिक्स का कोलारस मॉडल
सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए विभिन्न कदम उठाने वाली एमपी बीजेपी में इन दिनों कोलारस मॉडल की चर्चा है। पार्टी यूं तो अपने जिला और पेज स्तर तक के संगठन में सोशल मीडिया पर उपस्थिति को मजबूत करने की पैरवी और रणनीति बनाती रहती है लेकिन कोलारस के बीजेपी विधायक महेंद्र यादव ने एक कदम आगे जा कर टॉरगेट तय किया। कोलारस में आयोजित मंडल बैठक के दौरान विधायक महेंद्र यादव ने साफ साफ कहा है कि अगर किसी कार्यकर्ता को पद पर बने रहना हैं तो उसे अपनी सोशल मीडिया फॉलोइंग बढ़ानी होगी। विधायक यादव ने पदाधिकारियों के लिए न्यूनतम फॉलोअर्स का टारगेट सेट कर दिया है।
इस टॉरगेट के मुताबकि मंडल अध्यक्ष को न्यूनतम 25 हजार, शक्ति केंद्र प्रमुख को न्यूनतम 5 हजार फॉलोअर्स तथा बूथ अध्यक्ष को न्यूनतम एक हजार फॉलोअर्स बनाने होंगे। अब पार्टी की समीक्षा बैठकों में केवल जमीनी रिपोर्ट ही नहीं देखी जाएगी, बल्कि नेताओं की 'फॉलोअर्स ग्रोथ रेट' का बाकायदा हिसाब-किताब होगा। जिनका डिजिटल रिपोर्ट कार्ड कमजोर रहेगा, उनसे पद छीना भी जा सकता है।
दतिया के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस का पुनर्गठन
दतिया उपचुनाव में जीत के बाद कांग्रेस उत्साहित है। इस जीत को ताकत बनाने के जतन किये जा रहे हैं। पीएसी की बैठक में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन पर निर्णय हुआ है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दतिया जीत को परिवर्तन का संदेश कहा है। इस जीत के बाद पार्टी ने प्रदेश संगठन के सभी विभागों और प्रकोष्ठों की प्रदेश, जिला और ब्लॉक स्तर तक की इकाइयों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया। इस फैसले के साथ ही कांग्रेस में व्यापक संगठनात्मक पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। विश्लेषकों के अनुसार कांग्रेस ने संगठन की समीक्षा के बाद आठ जिलाध्यक्षों के प्रदर्शन को असंतोषजनक पाया है। इन जिलाध्यक्षों को जल्द ही कार्यमुक्त किया जा सकता है। कहा जा रहा है कि मैदान से लेकर प्रदेश स्तर तक संगठन को फिर से गढ़ कर मैदानी ताकत और ऊर्जा बढ़ाई जाएगी।




