शंकराचार्य को गंगा स्नान से रोकना सनातन परंपरा के खिलाफ, भोपाल में कांग्रेस का एकदिवसीय उपवास
भोपाल के रोशनपुरा चौराहे पर शुक्रवार को कांग्रेस ने उपवास-धरना दिया। जीतू पटवारी और पीसी शर्मा ने भाजपा सरकार पर सनातन परंपराओं, साधु-संतों और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के अपमान का आरोप लगाया।
भोपाल। राजधानी भोपाल में शुक्रवार को सनातन परंपराओं, साधु-संतों और धार्मिक आस्थाओं के मुद्दे पर सियासी और सामाजिक सरगर्मी बढ़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कांग्रेस नेताओं ने शहर के रोशनपुरा चौराहे पर उपवास और धरना प्रदर्शन किया। यह उपवास-धरना पूर्व मंत्री पीसी शर्मा के नेतृत्व में आयोजित किया गया। इसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी समेत बड़ी संख्या में कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए थे। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में सनातन परंपराओं, साधु-संतों और धार्मिक संस्थाओं का अपमान हो रहा है।
धरना स्थल पर कांग्रेस नेताओं ने ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्यों के कथित अपमान, साधु-संतों पर कार्रवाई और काशी के मणिकर्णिका घाट जैसे पवित्र स्थलों से जुड़ी गतिविधियों के विरोध में भाजपा सरकार की तीखी निंदा की। नेताओं का कहना था कि हिंदू आस्था और परंपराओं की रक्षा का दावा करने वाली सरकार ही आज सनातन मूल्यों को आहत कर रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने अपने संबोधन में कहा कि हजारों सालों से सनातन परंपराओं में जगतगुरु शंकराचार्य की मान्यता स्वतः सिद्ध रही है लेकिन आज उनसे प्रमाण पत्र मांगे जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में शंकराचार्य को गंगा स्नान से रोका गया। यह न केवल परंपराओं के खिलाफ है बल्कि भारत की धार्मिक अस्मिता पर सीधा आघात है। पटवारी ने कहा कि भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी शंकराचार्य को गंगा स्नान से रोका गया हो।
पटवारी ने यह भी कहा कि यह मुद्दा किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का नहीं बल्कि आस्था, सम्मान और भारत की आत्मा से जुड़ा हुआ है। उन्होंने साधु-संतों और बटुकों के साथ कथित दुर्व्यवहार का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे दृश्य सामने आए हैं जिनमें उन्हें शारीरिक और मानसिक पीड़ा दी गई। उन्होंने चेतावनी दी कि सत्ता में रहते हुए भले ही दोषियों को सजा न मिले लेकिन कर्मों का फल तय होता है।
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यह विरोध प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रयागराज माघ मेला प्रशासन के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है। मौनी अमावस्या से बसंत पंचमी तक पांच दिनों के अनशन के दौरान शंकराचार्य की तबीयत बिगड़ गई थी। उन्हें तेज बुखार आय गया था। जिसके बाद डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें दवा लेकर वैनिटी वैन में आराम करना पड़ा था। वसंत पंचमी के अवसर पर बड़ी संख्या में शिष्य उनका आशीर्वाद लेने पहुंचे थे लेकिन तबीयत खराब होने के कारण वे लंबे समय तक बाहर नहीं आ सके थे। बाद में वे पालकी पर बैठकर श्रद्धालुओं के सामने आए थे। हालांकि, उन्होंने प्रशासन से माफी की मांग पूरी न होने के कारण संगम स्नान नहीं किया।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट कहा था कि जब तक मेला प्रशासन माफी नहीं मांगता वे स्नान नहीं करेंगे। उनका कहना था कि प्रशासन नोटिस-नोटिस का खेल खेल रहा है और मौनी अमावस्या का स्नान ही नहीं होने दिया गया। ऐसे में बसंत पंचमी का स्नान कैसे संभव है। इस पूरे विवाद के बीच माघ मेला प्रशासन ने उन्हें 48 घंटे के भीतर दूसरा नोटिस जारी किया जिसमें मौनी अमावस्या के दिन बैरियर तोड़ने और जबरन भीड़ में बग्घी घुसाने जैसे आरोप लगाए गए और माघ मेले से स्थायी प्रतिबंध तक की चेतावनी दी गई।
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इस नोटिस के जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद ने तीन पेज का लिखित स्पष्टीकरण भेजकर सभी आरोपों को गलत और भ्रामक बताया था। उनके मीडिया प्रभारी के अनुसार, नोटिस की प्रक्रिया और तारीखों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इस टकराव के बाद देशभर के संत समाज में नाराजगी देखी जा रही है। द्वारका पीठ और गोवर्धन पीठ के शंकराचार्यों ने भी सरकार के रुख की आलोचना की है। द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज ने मेला प्रशासन से सार्वजनिक माफी की मांग करते हुए ब्राह्मणों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार को शासन का अहंकार बताया। वहीं, गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि सरकार धार्मिक नेतृत्व को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है।
इन घटनाक्रमों के बीच अविमुक्तेश्वरानंद गो-प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा पर भी निकले हुए हैं। जिसमें बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु उनके साथ चल रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यही कारण है कि राजधानी में उपवास और धरना कर सरकार का ध्यान सनातन परंपराओं और संत समाज की पीड़ा की ओर खींचने की कोशिश की गई है। कांग्रेस ने साफ किया है कि जब तक आस्था और परंपराओं के सम्मान का भरोसा नहीं दिया जाता तब तक वह इस मुद्दे को उठाती रहेगी।
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