पुणे रेप-मर्डर मामले में बड़ा फैसला, कोर्ट ने 65 वर्षीय आरोपी को सुनाई फांसी की सजा

महाराष्ट्र के पुणे में साढ़े तीन साल की बच्ची से अपहरण, दुष्कर्म और हत्या के मामले में कोर्ट ने 65 वर्षीय दोषी भीमराव कांबले को फांसी की सजा सुनाई है।

Updated: Jun 29, 2026, 04:54 PM IST

पुणे। महाराष्ट्र के पुणे जिले के भोर तहसील स्थित नसरापुर में साढ़े तीन वर्षीय बच्ची के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या के मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने सोमवार को 65 वर्षीय दोषी भीमराव प्रभाकर कांबले को फांसी की सजा सुनाई। विशेष न्यायाधीश एस.आर. सालुंखे ने इस अपराध को रेयरेस्ट ऑफ रेयर श्रेणी का बताते हुए कहा कि आरोपी ने मानवता की सभी सीमाएं लांघ दी हैं और उसके लिए मृत्युदंड ही उपयुक्त सजा है। घटना के महज 60 दिनों के भीतर फैसला आने से यह महाराष्ट्र के सबसे तेजी से निपटाए गए मृत्युदंड वाले मामलों में शामिल हो गया है।

इससे पहले 25 जून को अदालत ने भीमराव कांबले को सभी आरोपों में दोषी ठहराया था। जबकि, सजा पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। सोमवार को अंतिम फैसला सुनाते हुए अदालत ने अपराध की बर्बरता पर कड़ी टिप्पणी की। न्यायाधीश ने कहा कि आरोपी ने मासूम बच्ची को बचने का कोई अवसर नहीं दिया और उसके साथ अमानवीय अत्याचार किया। अदालत के अनुसार, मेडिकल साक्ष्यों से यह भी सामने आया कि बच्ची की मौत के बाद भी उसके शव के साथ यौन उत्पीड़न किया गया। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि ऐसे अपराधी के लिए फांसी की सजा भी कम प्रतीत होती है।

यह भी पढ़ें:भोपाल की जुड़वा बहनों ने रचा इतिहास, दुनिया की सबसे कम उम्र की फीमेल ड्रमर बनीं

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बच्ची के शरीर पर 18 गंभीर चोटों के निशान मिले थे। दम घोंटने के लिए उसकी पैंट करीब 21 सेंटीमीटर तक मुंह में ठूंस दी गई थी। जिससे उसे असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ी। न्यायालय ने आरोपी के पुराने आपराधिक व्यवहार का भी उल्लेख किया और कहा कि वह सालों पहले भी परिवार की एक बच्ची तथा एक बुजुर्ग के साथ हमला करने की कोशिश कर चुका था। अदालत ने माना कि आरोपी में सुधार की कोई संभावना नहीं बची है और समाज की सुरक्षा को देखते हुए उसे कठोरतम दंड दिया जाना आवश्यक है।

विशेष लोक अभियोजक अजय मिसार ने मृत्युदंड की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के 12 महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया। इनमें निर्भया मामला, बशार अली केस, शंकर खाड़े केस और बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य जैसे फैसले शामिल थे। अदालत ने भी अपने निर्णय में इन मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सुनियोजित हत्या, अपराध की क्रूरता और समाज पर उसके गहरे प्रभाव जैसे सभी पहलू इस मामले को मृत्युदंड के योग्य बनाते हैं। न्यायालय ने कहा कि एक असहाय बच्ची के साथ केवल अपनी हवस पूरी करने के लिए किया गया यह अपराध पूरी तरह अमानवीय है।

यह भी पढ़ें:बेन स्टोक्स ने इंटरनेशनल क्रिकेट को कहा अलविदा, न्यूजीलैंड के खिलाफ होगा आखिरी मुकाबला

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने आरोपी की 65 वर्ष की उम्र का हवाला देकर सजा में नरमी की मांग की थी लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। फैसले में कहा गया कि अपराध की गंभीरता और आरोपी का आचरण उसकी उम्र से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इससे पहले दोष सिद्ध होने के बाद न्यायाधीश ने आरोपी से सीधे पूछा था कि घटना को याद कर वह स्वयं बताए कि उसे क्या सजा मिलनी चाहिए। जवाब में आरोपी ने अपराध स्वीकारने के बजाय उसे दुर्घटना बताने की कोशिश की।

अदालत ने इस मामले की जांच और अभियोजन की भी सराहना की। न्यायाधीश ने कहा कि घटना के केवल 16 दिनों के भीतर पुलिस ने मजबूत आरोपपत्र दाखिल कर दिया। ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान भी अदालत ने लगातार सुनवाई की। मामले में 55 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए। जबकि, डॉक्टरों, फोरेंसिक विशेषज्ञों और साइबर टीम ने महत्वपूर्ण तकनीकी साक्ष्य उपलब्ध कराए। अदालत ने पुलिस और अभियोजन पक्ष के समन्वय को त्वरित न्याय का आदर्श उदाहरण बताया।

यह भी पढ़ें:सऊदी अरब में हेलिकॉप्टर और फ्रांस में प्लेन क्रैश, दोनों हादसों में 25 लोगों की मौत

यह घटना 1 मई को नसरापुर में हुई थी। आरोपी ने करीब 39 मिनट तक मासूम बच्ची के साथ दरिंदगी करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी। घटना के बाद पूरे महाराष्ट्र में व्यापक आक्रोश फैल गया था। कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए और लोगों ने आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की। गुस्साए लोगों ने मुंबई-बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग भी जाम कर आरोपी को भीड़ के हवाले करने की मांग की थी। बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए राज्य सरकार ने मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने का निर्णय लिया। सीसीटीवी फुटेज सहित तकनीकी साक्ष्यों और त्वरित जांच के आधार पर मुकदमे की सुनवाई तेजी से पूरी हुई और दो महीने के भीतर अदालत ने दोषी को फांसी की सजा सुनाकर मामले का निपटारा कर दिया।

फैसले के दौरान पुणे जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर के बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा था। जबकि, अदालत परिसर में फैसले का इंतजार कर रहे लोगों की भीड़ भी जुटी रही थी। अदालत के फैसले के बाद पीड़ित परिवार और समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे न्याय व्यवस्था पर विश्वास मजबूत करने वाला निर्णय बताया।

यह भी पढ़ें:ट्विशा शर्मा केस: जेल में बंद रिटायर्ड जज गिरिबला सिंह के सूने घर में चोरी, पुलिस से मारपीट कर भागे आरोपी