दफ्तर दरबारी: सब चुनाव के काम पर हैं, न सुनवाई, न राहत, सिर्फ खौफ का दम
MP News: मध्य प्रदेश में 17 नवंबर को मतदान होगा। मतदान करवाने के लिए चुने गए कर्मचारियों का प्रशिक्षण शुरू हो गया है। कर्मचारियों का बड़ा वर्ग चुनाव ड्यूटी से नाखुश है। उन्हें दर्जनों शिकायतें हैंं। कई संकट भोग रहे कर्मचारियों की पीड़ा सुनने के बदले उन्हें चुनाव ड्यूटी न करने पर सीआर बिगाड़ देने जैसे खौफ का सामना भी करना पड़ रहा है।

राजनीतिक दल टिकट घोषित कर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी कर चुके हैं लेकिन जिनके कांधों पर चुनाव करवाने की जिम्मेदारी है, वे कर्मचारी अलग-अलग तरह की समस्याओं से गुजर रहे हैं। कर्मचारियों का बड़ा वर्ग चुनाव ड्यूटी से नाखुश है। उन्हें शिकायत है कि कहीं सीनियर को जूनियर के अधीन ड्यूटी पर लगा दिया गया है तो कहीं 50 से अधिक उम्र की महिलाओं को घर से दूर दूसरे जिले में ड्यूटी सौंप दी गई है। आलम यह है कि कई बैंक इसलिए बंद रहेंगे क्योंकि उनके कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी ड्यूटी दे दी गई है। बीमार और उम्र के कारण कई संकट भोग रहे कर्मचारी नाराज है क्योंकि उनकी पीड़ा सुनने के बदले उन्हें चुनाव ड्यूटी न करने पर सीआर बिगाड़ देने की धमकी का सामना करना पड़ रहा है।
मध्य प्रदेश में 17 नवंबर को मतदान होगा। मतदान करवाने के लिए चयनित कर्मचारियों का प्रशिक्षण शुरू हो गया है। प्रदेश में सरकारी विभागों, निगम मंडल, सहकारी संस्थाओं समेत सभी उपक्रमों में 10 लाख अधिकारी कर्मचारी हैं। इनमें से 3.50 लाख की चुनाव ड्यूटी लगाई गई है।
इस ड्यूटी के कारण कई कर्मचारी अलग-अलग तरह की समस्या भोग रहे हैं। कर्मचारी संघों ने आपत्ति जताई है कि शिक्षकों को पदोन्नत कर दूसरे जिलों में पदस्थ किया गया है। उन्हें अब अपने जिले से दूर दूसरे जिले में चुनाव ड्यूटी पर लगा दिया गया है। सबसे ज्यादा परेशान महिला कर्मचारी हैं जिन्हें मतदान करवाने के लिए अपने घर से कई किलोमीटर दूर दूसरे जिलों में जाना पड़ेगा।
इतना ही नहीं, जिला निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने वरिष्ठता का ध्यान भी नहीं रखा गया है। चुनाव के दौरान सीनियरी अधिकारी को जूनियर अधिकारी के मातहत काम करना पड़ेगा। जैसे, जूनियर अधिकारी पीठासीन अधिकारी बना दिए गए हैं तो सीनियर को उनके नीचे पर्ची बनाने का काम दिया गया है। कई अधिकारियों को शिकायत है कि उन्हें उनकी पोस्ट के हिसाब से जिम्मा नहीं दिया गया है।
चुनाव में भोपाल की बैंकों के करीब 2 हजार कर्मचारियों की ड्यूटी भी लगाई गई हैं। अभी तो इन कर्मचारियों का प्रशिक्षण जारी है। कर्मचारियों के प्रशिक्षण में जाने के कारण भोपाल की कई बैंक शाखाओं में तालाबंदी की नौबत आ गई है। शाखाओं में 'कर्मचारी चुनाव ड्यूटी पर हैं, कार्य नहीं हो पाएंगे' जैसी सूचनाएं लगा दी गई हैं। इस स्थिति को देखते हुए स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी ने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर चिंता जताई है कि यदि पूरे स्टॉफ की ड्यूटी लगा दी गई तो मतदान के दौरान बैंक लगातार 4 दिन तक बंद रह सकते हैं।
कर्मचारियों की मुसीबत यह है कि वे बीमार हैं, घर में समस्याएं हैं लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। यदि ड्यूटी निरस्त करने का आवेदन दिया तो सीआर बिगड़ने तथा अन्य सजा का डर दिखा दिया जाता है। ऐसे ही लापरवाही करार देते हुए भोपाल में पांच कर्मचारी सस्पेंड किए जा चुके हैं।
सरकारी कर्मचारियों की इस परेशानी तो देखते हुए कर्मचारी संगठन आगे आए हैं। उन्होंने उपयुक्त पद के अनुसार ड्यूटी लगाने तथा कर्मचारियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने की मांग की है। इतना ही नहीं, राज्य कर्मचारी कल्याण समिति के चेयरमैन रमेशचंद्र शर्मा ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर मतदान की तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर डाली है। संगठनों का तर्क है कि चुनाव ड्यूटी के कारण कर्मचारी दीवाली, भाई दूज, छठ पूजा जैसे त्योहार नहीं मना पाएंगे।
आईएएस को मुक्ति मिली उत्सव रहा अधूरा
‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने कार्यों के लिए तारीफ पाने वाले शहडोल कमिशनर आईएएस राजीव शर्मा ने वीआरएस लिया और सरकार ने तुरंत इस्तीफा स्वीकार किया तो एक और ब्यूरोक्रेट के राजनीति में आने की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। फिर राजीव शर्मा ने खुद कहा कि नौकरी छोड़ कर वे मुक्ति का उत्सव मना रहे हैं। भिंड से टिकट के दावेदार राजीव शर्मा को नौकरी से मुक्ति तो मिल गई लेकिन टिकट नहीं मिलने से उनका उत्सव अधूरा रह गया है।
आचार संहिता लागू होने के ठीक पहले इस्तीफा और यह स्वीकार होने के बाद मीडिया से चर्चा में आईएएस राजीव शर्मा ने कहा था कि नौकरी से मुक्त हो कर वे इंसान के रूप में खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। अब भिंड के विकास का काम करना है और राजनीति इसका एक रास्ता है।
माना जा रहा था कि उन्हें कांग्रेस से टिकट मिलना तय है कि लेकिन सूची में राजीव शर्मा का नाम नहीं था। इससे पहले वे इस बात से इंकार भी नहीं कर रहे थे कि टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं। फिलहाल वे चुप हैं। समर्थक इंतजार कर रहे हैं कि भिंड की दशा बदलने का संकल्प लिए आईएएस की नौकरी छोड़ने वाले राजीव शर्मा अब अपने राजनीतिक भविष्य का क्या फैसला करते हैं।
एक रिटायर्ड आदिवासी आईएएस को दो-दो पदों का तोहफा
आदिवासियों को लुभाने के लिए बीजेपी सरकार ने चाहे जो कदम उठाए हैं लेकिन आदिवासी आईएएस अफसर को लाभ देने में जरा कंजूसी नहीं दिखाई। सरकार ने पुनर्वास का इंतजार और जुगाड़ कर रहे तमाम रिटायर्ड अफसरों को नजरअंदाज कर आदिवासी आईएएस का रिटायर होने के बाद एक के बदले दो पदों पर पुनर्वास कर दिया है। खास बात यह है कि कुछ बरस पहले तक ये अफसर सरकार की आंख की किरकिरी बने हुए थे।
बात 2017 की है। बैतूल से बीजेपी सांसद और पार्टी की राष्ट्रीय सचिव ज्योति धुर्वे का जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने पर तत्कालीन प्रमुख सचिव, अनुसूचित जनजाति विभाग अशोक शाह सरकार के कोपभाजक बन गए थे। सीएम शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें फटकारा था। बाद में विभाग ने रिव्यू में अपने फैसले को स्थगित कर दिया था। सीएम की फटकार के बाद आईएएस अशोक शाह छुट्टी पर चले गए।
यही आईएएस अशोक शाह रिटायर होने के पहले महिला एवं बाल विकास जैसे प्रमुख विभाग में एसीएस बनाए गए थे। जब रिटायर हुए तो सरकार ने तुरंत उन्हें मध्यप्रदेश कार्य गुणवत्ता परिषद का महानिदेशक बना दिया। फरवरी 2023 में उनकी नियुक्ति तीन वर्षों के लिए की गई थी। सरकार ने आईएएस को मुखिया बनाने के लिए नियम बदल कर इस परिषद और इसके महानिदेशक पद का गठन किया था।
तीन साल का कार्यकाल तो ठीक, नियुक्ति को सात माह ही हुए थे कि आचार संहिता लागू होने के ठीक पहले सरकार ने ताबड़तोड़ अशोक शाह को मध्य प्रदेश वाणिज्यिक कर अपीलीय बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। जबकि वाणिज्यिक कर अपीलीय बोर्ड का अध्यक्ष बनने के लिए कई रिटायर अफसर कतार में थे। पुनर्वास के इच्छुक ये आईएएस अफसर एक ही अधिकारी को मिले दो पदों से सकते में भी हैं और ईर्ष्या में भी।
नक्कार खाने में तूती की तरह आईपीएस की आवाज
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है... यह कहावत मध्य प्रदेश के सीनियर आईपीएस मैथिलीशरण गुप्त पर लागू होती है। वे अकेले नेतृत्व कर अपराध मुक्त भारत मिशन ऐसे नाराज युवाओं का एक ग्रुप बनाने में जुटे हुए हैं तो स्वैच्छा से संसाधन उपलब्ध करवाए और बदलाव की पहल करे।
बीते चुनाव की तरह इसबार के विधानसभा चुनाव के लिए भी कई अफसरों ने टिकट पाने के सपने बुने थे। कुछ ने तो राजनीतिक इशारा समझ कर पद से त्यागपत्र भी दे दिया है लेकिन उन्हें फिलहाल तो चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला है। स्पेशल डीजपी रहे आईपीएस मैथिलीशरण गुप्त ने सेवा के अंतिम दिनों में विवादास्पद बयान दे कर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता जाहिर कर इरादे बता दिए थे।
बीते तीन सालों से वे अपनी यही राजनीतिक जमीन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने अपराध मुक्त भारत बनाने के लिए एक अभियान आरंभ किया। वे अपराध मुक्त देश बनाने में सहयोग के इच्छुक लोगों को ब्रांड एंबेसडर नियुक्त कर रहे हैं। तीन सालों बाद भी यह मिशन एक सशक्त आवाज तो नहीं बन पाया है लेकिन आईपीएस गुप्त मायूस नहीं हुए हैं। वे देश बदलने के मिशन पर जुटे हुए हैं।